तबलावादक राकेश साहू संग विजय मिश्रा ‘अमित’ के गोठ बात

कला जगत म नइ चलय कोताही : राकेश साहू

Rakesh Sahuसुबह होती है, शाम होती है-जिन्दगी यूं तमाम होती हैं’। ये लाइन हर हाथ म हाथ धरे बैठे ठलहा बइठोइया आम मनखे मन बर सही बइठते। फेर अपन जिनगी म कुछु खास करे खातिर ठान लेवइया मनखे मन ऐला खारिज करत अपन परिवार के भरण-पोषण के संगे संग कला संस्कृति बर घलो समर्पित जीवन जीथे। आम अउ खास मनखे के अइसनेहे अंतर ल अपन तबला वादन के बल म सिध्द करोइया एक लोकवादक कलाकार के नाव आय श्री राकेश साहू। जेखर दोनों हाथ के अंगठी मन आसमान म चमकत बिजली कस तबला-डग्गा म थिरकथे। अउ राकेश के तबला वादन ल सुन-सुन के बरबस केहे लागथे- वाह राकेश वाह! राकेश के कलायात्रा ल कलमबध्द करे के मौका मोला दुर्ग जिला में स्थित राकेश के गृहग्राम गुण्डरदेही में मिलिस, जेहर सार म पढ़ोइया मन बर प्रस्तुत हें:-प्रश्न- राकेश जी आप मन के कलायात्रा के कहानी कहां से शुरू होईस?
राकेश- मोला लागथे कि जनम से ही मोर भीतर कलाकार ह समाय हे। एला अइसे भी केहे जा सकत हे कि- ‘याद नहीं वो लम्हा कब होश सम्हाला था, आंख खुली तो खुद को कला जगत में पाया था’। कलंगपुर (गुण्डरदेही) इस्कूल म पढ़त रहेंव त मेहर ‘परी’ बनव, फेर ओखर बाद धीरे-धीरे इसकूल के टेबल, टीपा, डब्बा ल तबला के लइसे बजाव। जेला देख मोर गुरुजी ह तको सबासी देवय। अउ मेहर सबासी पा पा के पंग कस कला जगत के आगास म ऊपर अउ ऊपर चढ़ते गेंव।
प्रश्न- पतंग कस ऊंचाई म चढ़े अउ तने बर परिवार ले कतेक सहायता मिलीस?
राकेश- विजय भइया! मोर पिताजी श्री रामलाल साहू शिक्षक (बटरेल) हर हारमोनियम के अउ चाचा श्री दीनानाथ साहू बेंजोवादन म पारंगत हे। इही मन के आशीर्वाद अउ संगीतमय परिवार के वातावरण ह मोला गीत-संगीत-गायन-वादन के दुनिया म रमा दीस। इही रद्दा म आगू बढ़त अब मोर जीवन संगिनी श्रीमती भगवती साहू भी शामिल हो गे हे, जो कि लोकगीतों ल दुलार देत गांव, शहर के कार्यक्रम में मोर साथ देथे।
प्रश्न- बड़े सांस्कृतिक मंच म तबलावादन करे के मौका कइसे मिलिस?
राकेश- ग्राम गाड़ाडीह सेलूद म लोक संस्था ‘सूरजमुखी’ के मंच म मोला तबला वादन करथ स्व. महासिंह चन्द्राकर जी ह सुनिस। अउ 1984 म अपन संस्था ‘सोनहा बिहान’ म ले गिस। ओखर बाद मोर कलायात्रा ल आगे बढ़ाय बर कोनो मालवाहक रेलगाड़ी म लगे डबल ईंजन के जइसे ताकत मिल गीस। उहां मोला तबला वादन के बारीकी, क्लासिकल स्टाइल के पकड़ ल सीखे के मौका गुरु श्री रामखिलावन जी से मिलिस। आज गर्व से कही सकथो कि छत्तीसगढ क़े अधिकांश लोकगीत म मोर तबलावादन समाय हावय।
प्रश्न- आप मन के तबला ल सुनके दर्शक मन हर पीठ ल थपथपाइस होही, अइसन कोई मजेदार घटना तो बतातेव?
राकेश- 25 साल पुराना बात आए। कुरूद म लोक संगीत के कार्यक्रम देखइया मन के अब्बड़ भीड़ रहिस। जब कार्यक्रम ह खतम होइस त देखइया मन ह मंच के उपर आ गीन। अउ ओमन ह मोला अपन कंधा म उठा के नाचे लागिन। गणेश जी के मूर्ति के जइसे मेहर उकर कंधा म तो बइठे-कइठे गदगद तो होए लेकिन मोर मन हर बोलिस कि ‘राकेश भैया अब लोक कला जगत म अउ अच्छा से अप जिम्मेदारी ल निभाना पड़ही। कला ल चमकाए बर अब कोताही नइ चलय।’
प्रश्न- लोक कला ल समृध्द-संरक्षित बनाय बर आप मन के उपलब्धि का का हवय?
राकेश- छत्तीसगढ़ म स्थापित लोकसंस्था जइसे- सोनहा बिहान, चंदेनी गोंदा, लोरिक चंदा, अनुराग धारा के मंच म मेहर सुआ, ददरिया, पंडवाी, कर्मा, पंथी, रिलो-रहस जइसे गीत मन ल देश के बहुत से बड़े-बड़े राय अउ महानगर म बगराय के काम करे हव। इही रद्दा म आजकल स्व. रामचन्द्र देशमुख के मार्गदर्शन में सिरजित संस्था ‘अनुराग धारा’ राजनांदगांव में जुड़ के लोककला के पताका ल जनमन के बीच लहराये बर जुटे हो।
प्रश्न- कलायात्रा म कभू कभार मिले मान-अपमान के बारे में आपके का विचार हे?
राकेश- बेजान लकड़ी चमड़ा ले बने बाजा तबला के वादन अब मोर जिनगी के आधार बनगे हावय। ऐला दरसक मन के आगू म बजाना मोर बर पूजा बरोबर आए। अइसन बेरा मे कभू-कभू अगियानी दरसक मन हूटिंग करथे त मन म पीरा होना स्वाभाविक हे। कभू-कभू तो अपन गांव, घर म कलाकार ल अपमान सहना पड़थे। तेखर पीरा म मेहर ये लाइन से बताना चाहत हो- ‘जब लगा था तीर तब इतना दर्द न हुआ साकी, जख्म का अहसास तब हुआ जब कमान देखी अपनो के हाथ में।’
प्रश्न- राय गठन के पहिली अउ बाद म कला-संस्कृति ल आपमन ह कोन रूप म पाथो?
राकेश- राय बने के पहिली साधन, सुविधा के कमी रहिस तभो ले अच्छा कार्यक्रम देहे बर कलाकार संकल्पित दिखये, फेर अब के कलाकार मन में कला बर समर्पण कम दिखथे। मूल लोकगीत, वाद्य, वेशभूषा, नृत्य में फिलमीकरण के असर साफ साफ झलकथे। जे हर चिंता का विष्ज्ञय आए। एखर से मुक्ति पाय बर संस्कृति विभाग के संग बड़े-बड़े सामाजिक-औद्योगिक संस्थान मन ल पुराना कलाकार-कला के संरक्षण खातिर आगु आना चाही।
श्री साहू के संगठन गोठ बात ल खतम करके विदा लेहे के बेरा में मोर दिल-दिमाग में गूंजत रिहिस-ये लाइन- ‘जो साज से निकली है वह सबने सुनी, जो तार पे गुजरी है, वो किस दिल को पता है।’

संग्रह के उद्देश्य से यह रचना देशबंधु के मड़ई परिशिष्ठ से साभार लिया गया है.

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One comment

  • शकुन्तला शर्मा

    राकेश भाई ल बहुत- बहुत बधाई । ” तबला ” ल संगीत के व्याकरण माने जाथे , अइसन वाद्य-यंत्र म मास्टरी होना छोटे मोटे बात नोहय अऊ ए किसम के कलाकार ल सकेले के उदिम करोइया , विजय भाई अऊ सञ्जीव भाई मन घलाव , शाबासी पाए के बुता करत हावैं ।

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