दोसती




एक गांव म आगी लगे रिहीस । चारों कोती अफरा तफरी मच गे रिहीस । जे दऊड़ सकय , तेमन दऊड़ के अपन परान बचा लीन । असक्त अऊ कमजोर मन आगी म लेसाए बर मजबूर रिहीन । फेर एक झिन अइसे मनखे घला रहय , जे कहींच अंग ले खंगे अऊ खिरे नि रहय , न कन्हो कोती ले कमजोर , फेर कतको जगा ओकर देहें म लेसाए भुंजाए के निसान रहय । पता करे गीस , तब जानिन के , ये वो मनखे आए जेहा कमजोर अऊ असक्त मनखे मनला बचाए के फेर म लेसात – भुंजात रिहिस ।

असक्त अऊ कमजोर मनखे मन ल बचा डरिस कइसनो करके । फेर एक झिन अंधरा ल बचाए बर जाबेच नि करत रहय । लोगन उहू ल बचाए के गुहार करीन , तब उही बतइस के , इही अंधरा के लगाये आगी आए , जेमा जम्मो लेसावत भुंजावत हाबन , एला बचा लेबो तंहले , फेर तपनी तप के उहीच बूता ल दोहराही ।

आगी हकन के लागे रहय । अभू अऊ भयंकर रूप ले डरिस । सहर ले गांव , मइदान ले बियारा , परसार ले घरो घर तक अमर गे वो आगी । अंधरा भागय बड़ जोर ले , फेर दिखय निही तेकर सेती आगीच म झपा जाये । अंधरा जरत रहय फेर , दूसर जरत मनखे मन के अहा अऊ दरद सुन के अपन पीरा ल भुला जाये , ओहा एक्को बेर बचाये के गुहार नि करीस । काबर बचइया मनखे ओला आगी लगाये के आगू , कतको घांव मना करे रिहीस , ओकर दुसपरिनाम ल जनाबा करे रिहीस , फेर ओ अंधरा नि माने रिहीस । जब जम्मो बांच गे , तब मुहू कान ल टड़ेर के , अंधरा ल घला “ मनखे समझ “ बचा डरीस । फेर वा रे अंधरा …….. , बचइया कोने तेला पूछीस तको निही । अपन असन मुहूं करके रेंग दीस दूसर डहर ।

कुछेच दिन पाछू , अंधरा फेर तियार होके पदोये लागीस । ए दारी आगी लगाना त बड़ चाहे , फेर बीते समे म , ले दे के अपन बांचे के कहिनी ओकर देहें ल पूस कस जाड़ कंपकंपा अऊ थरथरा देवय । बने मनखे संग दोसती करे के कोसिस करीस । कन्हो भाव नि दीस । तभे ओला अंधरा अऊ खोरवा के दोसती के कहिनी सुरता आगीस के , कइसे खोरवा ल , अंधरा ह अपन खांध म बइठार के मड़ई देखाये बर लेगे रिहीस । मजा पाये के साध अऊ दूसर ल परेसान करे के ओकर तिरिस्ना जोर मारे लागिस । तभू एक दिन , मऊका पाके एक झिन बने मनखे ल खोरवा बना दीस । बने मनखे ओला जान नि पइस । अंधरा ओकर इलाज घला करा दीस , बइसाखी धरा दीस । दूनो संगवारी बनगे । अभू ओ मनखे ह , मने मन अंधरा के धनबाद करत , गुन गावत , ओकरे बिसाये बइसाखी ल धरके रेंगे लागीस । अभू खोरवा हा , अंधरा के पिछलग्गू बनगे । अंधरा जइसे कहय , खोरवा तइसने देखय , तइसने सुनय अऊ तइसनेच कहय घला । अंधरा , कहूंच करा असानी ले आगी लगा देवय , कतको झिन ओ आगी म लेसा भुंजा जाये फेर , अंधरा ल कहींच नि होये , ओहा इही खोरवा ल खांध म बइठार के ओकर बताये रद्दा म निकल भागे , अऊ बांच जाये ।




कुछ बछर अऊ नहाकगे । अभू अंधरा देस के बड़ जिनीस मनखे बनगे । अंधरा मन अंधराच लइका पइदा करे लागीस । इंकर लइका बाला मनला , आगी लगाये के गुन विरासत म मिले रहय । उही ल अपन बूता अऊ करतब समझ , जगा जगा , समे कुसमे आगी लगा के टरक देंवय , फेर अपन बांचे बर केवल खोरवाच के तलास करय । ओकर सेती खोरवा के लइका मन घला अपन आप ल खोरवा बनाना सुरू कर दीन । यहूमन , अभू सरी मरम ल जान डरीन । अंधरा के खांध म चढ़हे के सुख के कलपना अऊ बइसाखी म रेंगे के इकछा इंकरो मन म पनपे लागीस । एमन जान डरीन के , जे खोरवा होके रिही , तिही ल अंधरा अपन खांध के सवारी कराही , अऊ कतको कस सुख जइसे बड़े जिनीस पद , पुरुसकार , पइसा सबेच दिहीं । एक गोठ अऊ , खोरवा मन के कन्हो सभा समागम बर साधन सुभित्ता घला इही अंधराच ह मुहइया कराही । आखिरी सोंच ये , के , बरचस्व अऊ नाम घला अंधराच के खांध म बइठने वाला पाहीं ।

आगी लगते रहय । जरत , लेसात , भुंजात मनखे मन , आगी लगइया ल जान घला डरे रहय । फेर अभू कती गोहारे ? ओमन ल बचा सकइया मनखे मन , खोरवा बन के अंधरा के हाथ बेंचा के , ओखर खांध म बइठके , मजा लेवत घूमत हे । जेन बने हे , तेमन खोरवा हो जाये के जुगाड़ करत हे , या खोरवा हो जाये के अगोरा । आघू चलके इही अंधरा मन राजनीति ( रजनीति ) के नाव ले अऊ खोरवा मन साहित्य ( साहित ) के नाव ले जनाबा होगिन दुनिया म , जेकर दोसती वाजिम म जबर हे ।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा



Related posts:

One comment

Leave a Reply