नंदावत पुतरा-पुतरी – सुधा वर्मा

अक्ती (अक्षय तृतीया) बैसाख महिना के तीज ल कहिथें, तीज अंजोरी पाख के होथे। ये दिन ल अब्बड़ पवित्र माने गे हे। अक्षय तृतीय के कहानी सुनव:
एक राजा के सन्तान नई रहिस हे। रानी बहुत उदास राहय। रानी ह कखरो घर भी बिहाव होवय त एक झांपी समान भेजय। एक दिन के भात रानी डाहर ले राहय। रानी ह रंग-रंग के पुतरा-पुतरी रखे राहय, अपन समय ल उही म बितावय। रंग-रंग के कपड़ा जेवर पहिरावय। एक दिन ओखर मन म विचार आथे के मैं ह अपन पुतरी के बिहाव करहूँ, अपन मन के मुराद ल पूरा करहूँ। अपन विचार ल रानी ह राजा ल बताथे। राजा सोच म पर जथे। बहुत जुवर के बाद म कहिथे- देख रानी लइकामन खेल-खेल म पुतरा-पुतरी के बिहाव करथें तेन ह ठीक हे फेर, हमन करबो त परजा मन हाँसही। रानी कहिथे नहीं काबर हाँसहीं ये पुतरी ल मैं ह आज बीस साल ले मया करत हंव अउ रोजे ओला सजाथंव, संवारथंव, इही ह मोर बेटी आय।:
‘ठीक हे’ काहत राजा ह उठ के चल देथे। अपन सिंहासन म उदास बइठ जथे। द्वारपाल मन मंत्री ल खबर करथे। मंत्री ह दऊंड़त आथे अउ राजा ले ओखर चिंता के कारन पूछथे। राजा ह सब बात ल बताथे। मंत्री घलो सोचथे। मंत्री ह सोच के कहिथे के ”राजा हमन रानी के इच्छा ल पूरा करबो अउ रीति-रिवाज के साथ रानी के पुतरी के बिहाव करबो।” दूनो झन जा के रानी ल बताथें के हमन पुतरी के बिहाव करबो। रानी कहिथे मोर घर के दुवारी म बरात घलो आना चाही। पुतरा बर एक घर खोज लव। राजा कहिथे मंत्री पुतरा तोर रहिही अउ अब दूनो झन समधी बनबो, चल अब दूनो डाहर के बिहाव के जिम्मेदारी तोर आय। मंत्री ह सिर नवा के जी हुजूर कहिस अउ रेंग दीस। अक्ती के दिन बिहाव तय होईस। जम्मो राज के मनखे मन बराती अउ घराती बनीन। मंत्री ह राजा घर डोला म पुतरा ल लेके बरात लानीस पुतरा-पुतरी के पानी गरहन संस्कार होईस, राजा-रानी गांठ जोर के कन्यादान करीन अउ साकोचार पढ़े गीस। रात के खाना खाके बरात लहुटीस। पहट के बेटी बिदा होईस, रानी ह अपन पुतरी के बिदा करत सिसक-सिसक के रोईस। रानी के सखी मन घलो अब्बड़ रोईन। बीस साल ले पुतरी के जतन करे म लगे रहिन हे। अब महल सुन्ना होगे। राज भर में ये बिहाव के चर्चा चलते राहय।
एक महीना के बाद पता चलिस के रानी गर्भ म हावय। ये बात ल महल म लुका के रखिन। नौ महिना के बाद रानी एक सुग्घर बेटी ल जनम दीस। राजमहल म नंगाड़ा बाजे ले लगगे। तब सब ल पता चलिस के राजा घर बेटी के जनम होय हे, राजभर म सोहर गाय ले धरलीन। पुतरी के बिहाव के गोठ ह थिरा नइ पाय रहिस हे के रानी के गोद भरे महिमा गाय ले धर लीन। छट्ठी के नेवता म राज भर के मन उमड़ परीन। अक्ती के दिन रानी ह ऐलान कर दीस के गरीब बेटी-बेटा के बिहाव अउ अनाथ लइका मन के बर-बिहाव के जिम्मेदारी ओखर आय। अक्ती के तिहार म पुतरा-पुतरी के बिहाव बर घर-घर म होय ले धर लीस। घर के सुख-शांति बर अउ सुन्ना गोद ल भरे बर ये तिहार ह एक वरदान आय।
छत्तीसगढ़ के कई घर म तेलमाटी-चुलमाटी, भांवर सबो रस्म ल करथे। कई झन मन कारड घलो छपवाथें। घरोघर मड़वा गड़ियाथें आमापत्ता ले घर ल सजाथें। अउ चौंसेला, पूड़ी ले सबके नेवता करथे। टीकावन होथे सब झन खा पी के हँसी-खुशी घर लहुंटथे। ये पुतरा-पुतरी के बिहाव ह लइका सियान सबके आय।

-सुधा वर्मा

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