लोक रंजनी लोक नाट्य : नाचा

कोनो भी प्रदेश के लोक नाट्य म हमर बीच के बोली अउ अपन बीच के कलाकार संग सिंगार के सहजता अउ सामाजिक संदेस होथे, जेखर भीतरी गीत-संगीत, नाच अउ अभिनय होथे। लोक नाट्य बर कोनो पोथी पतरा, किताब सिताब के नित-नियम के बंधेज नई रहय काबर कि लोकनाट्य ह हमर पुरखा मन मेर ले पीढ़ी उप्‍पर पीढ़ी होवत आघू बढ़थे। लोक नाट्य ह हमर जम्‍मो समाज के उमंग उछाह के संघरा रूप होथे। लोकनाट्य अपन-अपन जघा म अलग-अलग होथे अलग-अलग प्रदेस म अलग अलग नाम के लोकनाट्य प्रचलित हावय। बिहार म येला छउ अउ बिदेसिया के नाव ले जाने जाथे त उत्‍तर प्रदेश म नौटंकी, राजस्‍थान म ख्‍याल, गुजरात म भवाई, महाराष्ट्र में तमाशा, कर्नाटक म येखर नाव यक्षगान, आंध्र प्रदेश म भागकलापम, केरल म कुरियट्टम, तामिलनाडु म तेरुक्कट्टु, बंगाल म जात्रा, मालवा अंचल म माच, काश्‍मीर म जश्‍न, हिमांचल म करियाड, असम म अंकिया नाट वइसनेहे हमर छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर अंचल म येला भथरा नाट, रहस, तारे नारे (घोड़वा नाच) अउ नाचा के नाव ले जाने जाथे।
नाचा लोक जीवन के बड़का अउ पोठहर अभिव्‍यक्ति आय। जीवन के अनुभव, सपना, कलपना, जीवन जीये खातिर मिहनत, लड़ई के संग उछाह अउ उमंग ये। येमा जनता के कलपना के संगें संग ओखर विरोध अउ ओखर हिरदे ले निकले खखनई ये जउन ह बियंग के सोंटा संग चलथे। जनता के मनोरंजन अउ लोक शिक्‍छा नाचा के गुन ये, हांसी-ठठ्ठा अउ बियंग के संग गीत-संगीत अउ नाच के संगम ये नाचा। रात-रात भर थिरकत पांव में बाजत घुंघरू के नाव ये नाचा।
सरगुजा के सीताबोंगरा अउ जोजोमारा के गुफा ले उबजे हमर लोक नाट्य नाचा ल डॉ. बलदेव दू भाग म बाटथे, पहीली महिला मन के लोकनाट्य डिडवा अउ दूसर पुरूस मन के नाट्य रहस अउ दहिकां दो, पंडवानी, चनैनी, ढोलामारू, घोड़वा नाच, अउ गम्‍मत नाचा। निरंजन महावर जी हा छत्‍तीसगढ़ के मैदानी इलाका म सिरिफ दू ठन लोकनाट्य के बारे म बताथे एक नाचा अउ दूसर रहस। रहस हर भगवान कृष्‍ण के बाल गोलपाल रूप के हमर भासा म सुन्‍दर लीला ये। नाचा ह जम्‍मा छत्‍तीसगढ़ी समाज के लोक रंजनी आयोजन ये जेखर उदगम गांव के समाज म होये हे संगे संग येमा हमर कई ठन परंपरा अउ विधा ह जुरियावत गे हे। नाचा के बारे म रामचंद्र देशमुख जी हा लिखे रहिस कि नाचा के जउन समे विकास होना सुरू होइस ओ समे के बारे म जानना जरूरी हे काबर कि ओ समे म छत्‍तीसगढ़ म शिक्‍छा के अभाव रहिस अउ जन रंजन के कोनो साधन नइ रहिस अइसन समे मा गांव के मनोरंजक कलाकार मन मसाल के अंजोर मा हांसी ठठ्ठा करके छोटे छोटे प्रहसन ले अपन अउ गांव वाले मन के मन म उछाह भरत रहिन इही माध्‍यम ले जन शिक्‍छा के काम घलव होवत रहिस। धीरे धीरे गांव के जमीदार, मालगुजार, गौंटिया मन छट्ठी-छेवारी म ये कलाकार मन ला जोर के अउ जनता ला सकेल के लोक नाटृय ये आयोजन करे लागिन होही जउन हा नाच के रूप धरीस। खड़े साज के नाच हमर पहिली सामूहिक प्रयास रहिस जउन म चिकारा, तबला, मजीरा, खंझरी बजावत अउ नारी के रूप म पुरूष कलाकार मन मसाल के अंजोर म चार बांस ला गडिया के ओखर उपर चद्दर ओढ़ना ला छा के ओखर तरी म ये कलाकार मन नाचा करय। समे के संगें संग लोकनाट्य के रूप म बदलाव आवत रहिथे तइसेहे हमरो लोकनाट्य के रूप म बदलाव आये हे। लोकनाट्य नाचा के खड़े साज के उदगरे के समे के बारे म कहे जाथे कि ये ह हमर प्रदेस म अंदाजन सौ बरिस के पहिली अपन रूप ला धरिस। ओ समे भीमाजीराव भोंसले ह रतनपुर मा कब्‍जा कर ले रहिस अउ छत्‍तीसगढ़ के जम्‍मो गढ़ मन म मराठा गढ़पति मन अपन अधिकार जमाये खातिर अपन बोली बात अउ संस्‍कृति ल लेके छत्‍तीसगढ़ म दमक गीन। राजा अउ गढ़पति मन के आसरय ले सार्वजनिक तीज-तिहार म राजसी आयोजन म महाराष्ट्र अउ विदर्भ के पारंपरिक खडी गम्मत अउ तमासा के प्रस्‍तुति होये लागिस, खड़ी गम्‍मत संग रतनपुर राज म हमर पारंपरिक लोकनाट्य ह मिल के तारे नारे के रूप धरिस त बाकी मैदानी इलाका मन म पहिली खड़े साज नाचा फेर नाचा अपन छत्‍तीसगढ़ी स्‍वरूप म आइस। बाद म गैस लाइट आइस अउ तहां ले माइक घलो आगे, दाउ मन के संग हबीब तनवीर हा ये नाचा ला विस्‍व मंच तक लेगे।
ओ समे म जेखर भाखा दूरिहा तक जावय तउन ला अच्‍छा नाचा कलाकार माने जावय काबर कि ओ समे म माइक रहिस नइ ये त देखइया जम्‍मो जनता तक आवाज जावय तभे गम्‍मत के मजा बने रहय। पहिली ब्रम्‍हानंद के भजन, लावनी गीत, कबीर के निरगुनिहा भजन के संग करमा-ददरिया के छत्‍तीसगढिया माटी के महक संग म होवत रहिसे। बाजा म चिकारा, सारंगी, दफड़ा, मंजीरा, मोहरी, हरमुनियम। कुरथा म महिला पात्र ह लुगरा अउ पुरूस ह धोती कुरथा पहिरय। धीरे-धीरे सिनेमा अउ टीबी के आये ले नाचा म ओखर नकल उतरगे। नाचा के भीतर गम्‍मत होथे जउन म छोटे-छोटे समाज के गलत नीत उपर गंभीर वार करत सहज-सरल भासा म मनोरंजनी कहिनी रहिथे। कलाकार मन के संवाद म देखइया हाससत हांसत लोटपोट हो जाथे। बिना कोनो लिखित पाठ के कलाकार मन अपन मन ले उबजाए पाठ ला बोलथें। पाठ म गोठ ला तोर-मरोर के हांसी उबजाथें। बड़का बड़का समस्‍या ला ये कलाकार मन हांसी ठठ्ठा म हल कर देथें। कलाकार मन गम्‍मत के चलतेच चलत देखइया मन के बीच ले अपन स्‍वरूप अउ पाठ उठा लेथें देखइया मन अपने बीच के आदमी के कहिनी अउ नकल ला देख के अड़बड़ खुस होथें अउ जब दुख के पाठ आथे त आंखी ले आंसू तको ढरकथे। वो समे म नाचा म पांच ले सात कलाकार रहंय।
नाचा के सुरू म गवइया गीत – गंगा ला लाने भागीरथी वो, गंगा ला लाने भागीरथी। राजा सगर के नाती वो गंगा ला लाने भागीरथी ….। बीच भंवर मोरी नइया बूड़त हे माता, आके बचा लेबे लाज वो ….। ठाकुर भला बिराजे हो जग्‍गन्‍नाथ पुरी मा भले बिराजे ….। कोने जंगल कोने झाड़ी ओ… अवो अवो दीदी मोर….
नाचा के बिकास अउ संजोये खातिर होये काम – सन् 1927-28 म दाउ दुलार सिंह मंदराजी ह छत्‍तीसगढ़ के बगरे नाच पार्टी मन ला सकेलिस अउ ओमा ले नामी कलाकार मन ला जोर के रवेली नाच पार्टी बनाइस। जउन म परी नारद निर्मलकर, गम्‍मतिहा सुकालू ठाकुर, नोहरदास, तबलची राम गुलाल निर्मलकर, चिकरहा दाउ मंदराजी ये पांच झिन रहिन। दूये साल म दाउ मंदराजी ह रवेली साज के नाच म चिकारा के बलदा हारमोनियम अउ मसाल के जघा म गैस बत्‍ती बउरे ला सुरू कर दीन। दाउ मंदराजी ह नाचा के बिगड़त रूप ला तको संवारिन अउ सिरावत नाचा के छाती म परान डारिन। मदन निषाद, नोहरदास मानिकपुरी, लालूराम साहू, बुधराम देवदास संग फीता बाई अउ माला बाई ला अपन नाच पार्टी म जोरिस येखर पहिली नाचा म महिला के पाठ घलव पुरूस कलाकार मन हर करयं। दाउ मंदराजी ह नाचा बर अपन सरबर होम कर दीस, रवेली नाचा पार्टी के गांवो-गांव प्रदसन करे लागिस। वो समे म उत्‍तर प्रदेस – बिहार, दरभंगा ले गाड़ी भरभर के छत्‍तीसगढ़ म लीला नाटक करे बर उंहा के मनखे मन आवय अउ टिकट लगा के अपन नाटक लीला करयं जेखरे देखा सीखी दाउ मंदराजी ह 1960 म रायपुर म एक महीना ले रोजे नवा नवा गम्‍मत संगा नाचा के टिकिट वाले आयोजन करिस तउन म हमर ये लोकनाट्य नाचा के प्रसिद्धी हा अड़बड़ बाढिस अउ सभ्रांत लोगन के मन म नाचा बर परेम उमडिस। नाचा के सोर तब के हमर राजधानी भोपाल तक घलो पहुंचिस अउ आदिवासी लोक कला परिसद मध्‍य प्रदेश हा जनवरी 1964 म दुर्ग म तीन दिन के नाचा महोत्‍सव के आयोजन करिस जेन मा छत्‍तीसगढ़ के पंदरा नामी नाचा पार्टी ला बलाये गीस। इही बीच म दिल्‍ली के हिन्‍दूस्‍तानी थियेटर जेखर अधियक्‍छ इंदिरा गांधी रहिसे अउ निदेसक हबीब तनवीर तउन म रवेली साज के कलाकार मन काम करिन इंखर प्रदसन ला देखे बर तबके प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू तको आये रहिसे। इही समे म दाउ रामचंद्र देसमुख ह छत्‍तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल पिनकापार बना के नाचा के पारंपरिक स्‍वरूप ला बढ़ा के ‘काली माटी’ के रूप म रायपुर म प्रस्‍तुत करिन जउन हा नाचा के आघू जा के बड़का लोकमंच म बदले के पहिली सुरसुरी रहिस। लोकमंच के पहिली संगठित रूप म 1971 म चंदैनी गोंदा के रूप म परगट होइस जउन ह दाउ महासिंग संचाकर के सोनहा बिहान, रामहृदय तिवारी के लोरिक चंदा, कारी, लक्ष्‍मण चंद्राकर के हरेली, प्रेम सइमन के दसमत कइना, दीपक चंद्राकर के गम्‍मतिहा फेर लोकरंग अरजुन्‍दा के रूप म आइस। एखर बाद रायपुर म नाचा कार्यसाला सन् 1973 म होइस तउन ह हबीब तनवीर ला मोहे डारिस तेखर बाद हबीब तनवीर ह नाचा के नागर रूप के अपन सोंच ला नया थियेटर के रूप म परगट कर के देस बिदेस तक हमर नाचा के महमहई ला बगरा दीस। इही समें मा डॉ. विमल कुमार पाठक के अघुवई म भिलाई स्‍टील प्‍लांट ह हर साल लोक कला महोत्‍सव चालू करिस तउन म नामी नाचा पार्टी मन के प्रदरसन होये लागिस। रायपुर म 17-18 जनवरी, 1992 उतई, दुर्ग म पहिली बार बड़का आयोजन होइस येमा दिन रात एक से एक नाच पार्टी मन अपन प्रस्‍तुति दीन। ब्रम्‍हा बिसनू नाच पार्टी लखना, छत्‍तीसगढ़ी लोककला मंच बेलसोड़ा, जय संतोषी नाच पार्टी बरही सांकरा, जय बजरंग नाच पार्टी सेलूद, चरनदास चोर नाच पार्टी मन सामिल होइन।

संजीव तिवारी
बिलासपुर भास्कर में पूर्व प्रकाशित

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