नान्हे कहिनी : झन फूंटय घर

खाये पीये के मामला म, माई लोगिन मन म मनमुटाव होय के संभावना रहिथे। तेखरे सेति, ददा ह घर के जम्मो कामकाज ल हम दूनो भाई म बांट देये हे, अउ तीज तिहार म, परब म, रोटी, पीठा, खई खजेनी ल अपन हाथ म राखे हे।
सब ला बरोबर बांटय ताकी झन फूटय घर, झन होवय मनमुटाव, दरार।
तिलक आत-जात राहय संतू के घर। अइसे तो संतू के कुछ रिस्तेदार नई लगे तिलक, फेर जिहां परेम, तिहां का नेम, का जरूरत कोनो रिस्ता के। परेम तो खुद सबले बड़े अउ पबरित रिस्ता ये। अइसे भी, जरूरी नइहे के जेखर संग नता हे, ओखर संग परेम होय। सही परेम होय सहि कहिबे त, नता तो अउपचारिकता अउ मरयादा म छंदा जाथे।
खैर, गरमी म दही के लबोद्दा सरबत अउ सरदी म बटुरा-मरीज, तुलसी के चाय पियाय बिना कभू नई निकलन धकय धर ले संतू अउ ओखर घरवाले। तिलक परब-परब म पेज पसईया खाय-पीयय घलो, अउ कोचई पता के कड़ही के तो सुवादे अड़बड़, अंगुरी चांट-चांट के खाय।
एक दिन सांझ के तिलक ल रोक लिस संतू के बाबू। परब कुसलाये राहय गाय। रात होही कहिके, घर जाये के बात करिस तिलक, संतू के बाबू कहि दिस- ‘हम ल अभी तक पराया समझथस का धन इहां कोनो भांठा म बइठे हस जेन घर जाहू कहिके…।’ रूकगे तिलक। तइयारी करत-करत, आठ नौ बजगे रात। बड़ सुग्घर छटई-पिढ़वा। बइठ गंय सब। फेर ये का? संतू के बबा पोरसत हे पेउस। पैंसठ सत्तर बरिस के सियान। अटपटा लगिस तिलक ल। माली भर पेउस अउ थारीभर दार-भात साग। तिलक के ससन बूतागे। फेर सियनहा के परोसना, समझ नई आईस तिलक ल, अतेक माई लोग, मावा लोग रहिके।
हाथ पोंछत, गली पार निकल के पूछि परिस तिलक संतू के बाबू ल- ‘अतेक मनखे रहे के बाद घलो कका! बबा ल परसान करथव। बिचारा सियान सामरत आदमी। विचित्र हे तुहरो घर के नियम ह ग कका।’ बताइस संतू के बाबू- ‘बाबू! हमर ददा ह अपन सउक ले अइसन करय न पोगरी खाये बर। बल्कि घर चलाये बर करथे अइसन।’
‘घर चलाये बर?’ तिलक समझ नई पाइस।
‘हां घर चलाये बर! तैं तो जानथस, हमन दुनों भाई अभी तक के, एके म हन। हमर मन के नाती नतुरा होगे हे तभो ले। फेर खाये पीये के मामला म, माई लोगिन मन म मनमुटाव होय के संभावना रहिथे। तेखरे सेति, ददा ह घर के जम्मो काम काज ल हम दुनो भाई म बांट देये हे, अउ तीज-तिहार म, परब म, रोटी, पीठा,र् खई खजेनी ल अपन हाथ म राखे हे। सब ला बरोबर बांटय ताकी झन फूटय घर, झन होवय मनमुटाव, दरार। अपन जीयत-जीयत अपन बेटा मन ल लड़त बंटत देखे के बात सोंचके घलो थर्रा जाथे ददा। ओखर हिसाब से एकता म बल हे, अउ मिलके खाये से चिबरी चाउर घलो, महापरसाद लगथे।’ ‘बड़ बिचित्र अउ गजब तरीका हे कका, सियान के घर ल बांधे के, बनाये राखे के।’ तिलक खुश हो जाथे।
तेजनाथ
बरदुली, पिपरिया
जिला- कबीरधाम

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