नान्हे कहिनी : सिसटाचार

गियारह बजे के बेरा आय। मिथलेस अपन संगवारी मनसन गोठियात जात राहे, त परकास कथे-कइसे रे मिथलेस !
तेंहा अड़बड़ दिन बाद कॉलेज आय हाबस। आजकल तोर दरसन दुरलभ होगे हाबे। कहां जाथस दिखस निही। त मिथलेस कथे- बहुत बियस्त होगे हाबों यार, सबो डाहर ल देखे ल पड़थे घर डाहर घलो अड़बड़ बूता रथे।
सबो झन पढ़इया लइका मन अपन-अपन किलास म जात रथे। ओतकीच बेर कॉलेज के प्रिंसपल ह आ जथे, अउ मिथलेस ल देखके कथे- ‘आप मेरे आफिस में आइए।’ मिथलेस ह कोन ल काहत हे कहिके पाछू डाहर ल देखथे त पाछू म कोनो नई राहे। रामलाल कहिथे- अबे, सर तो तोला बलइस हाबे। मिथलेस डर्रागे मेह तो फाइनल ल प्राइवेट करत हाबो अऊ कुछु गलती घलो नई करे हाबो फेर मोला काबर बलावत हे। सोचत-सोचत पछीना-पछीना हो जथे। ले-दे के आफिस के मंझोत म जा के कथे- ‘मे आई कम इन सर’ त भीतर डाहर ले आवाज आथे- ‘यस कम इन।’ जइसे भीतरी म जाथे प्रिंसपल अपन कुर्सी ले उठ के मिथलेस के तीर म आ जथे अउ वोला कथे- अपना कमीज का बटन लगाओ। मिथलेस लकर-धकर लगाथे। प्रिंसपल ह मिथलेस के पीठ म हाथ ल फेरत कहिस अब जाओ बेटा।
जितेन्द्र कुमार साहू ‘सुकुमार’
चौबेबांधा राजिम

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