निषाद राज के दोहा

माने ना दिन रात वो, मानुष काय कहाय।
ओखर ले वो पशु बने, हात-हूत मा जाय।।

भव ले होबे पार तँय, भज ले तँय हरि नाम।
राम नाम के नाव मा, चढ़ तँय जाबे धाम।।

झटकुन बिहना जाग के, नहा धोय तइयार।
घूमव थोकन बाग में, बन जाहू हुशियार।।

कहय बबा के रीत हा, काम करौ सब कोय।
करहू जाँगर टोर के, सुफल जनम हा होय।।

जिनगी में सुख पायबर, पहली करलौ काम।
कर पूजा तँय काम के, फिर मिलही आराम।।

रात जाग के का करे, फोकट नींद गँवाय।
दिन होवत ले नींद हा, परही चेत हराय।।

सुघ्घर लय तुक बन्द ले, बनथे सुघ्घर गीत।
भजन लिखव या लिख गज़ल, बढ़िया हो संगीत।।

जनम गँवा झन फोकटे, मिलथे एके बार।
काम कुछू अइसन करव, होवय नाम तुंहार।।

मनखे अइसन जात तँय, हो उपकार सहाय।
काम करव परमार्थ के, दुनिया तोला भाय।।

बिरथा मानुष नाम ला, झन करबे बदनाम।
जनम धरे हस सोच ले, सोच समझ कर काम।।

बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता पंचायत “वाणिज्य”
सहसपुर लोहारा, कबीरधाम (छ.ग.)


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