प्रकृति के नवा सिंगार अउ नवा बछर

सुशील भोले भईया ला सुनव यूट्यूब मा –
 

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भारतीय नव वर्ष माने चैत महीना के अंजोरी पाख के पहिली तिथि। मोला लगथे हमर ऋषि-मुनि मन प्रकृति के नवा सिंगार ल आधार मानके ए तिथि ल जोंगिन होहीं तइसे लागथे। काबर ते इही बखत प्रकृति ह पतझड़ के बाद नवा सिंगार करथे। जम्मो रूख-राई म नवा-नवा कोंवर पान बड़ मयारूक दिखथे। हरर-हरर झांझ के बड़ोरा चारों खुंट नाचे ले धरले रहिथे। तभो ले उल्हवा पान के छांव जम्मो जीव-जंत मनला अपन कोरा बिसराम देथे, दुलार करथे, जुड़ छांव देथे। हमर संस्कृति म प्रकृति के ही पूजा होथे। रूख-राई, तरिया-नंदिया, डोंगरी-पहार, धरती-अगास, सुरुज-चंदा। ए बहुत अच्छा बात आय काबर ते अइसन दृष्टिकोण ले जम्मो जिनिस ल अपन माने अउ जाने के बोध होथे, सबके संरक्षण अउ सम्मान के भावना पैदा होथे। परमात्मा के हर एक कृति ल वोकरे रूप माने के सोच उपजथे। हमर इहां बहुदेव पूजा पद्धति के जेन रिवाज हे, उहू हर इही सोच के उपज आय। अइसन किसम के बात मनखे के मन म सबला अपन माने के संस्कार उपजाथे, जबकि एकेठन देवता ल माने, जाने अउ पूजे के उपदेश ले लोगन म संकीर्णता के सोच उपजथे। अपन ईष्ट के छोड़ दूसर मन बर ईरखा के भाव पनपथे अउ ये बात ल तो सबो जानथें के जेकर मन म ईरखा के भाव पैदा होगे, तेन मनखे दुनिया म कोनो काम के लाइक नइ रह जाय। दुनिया म जिहां कहूं भी धरम या देवी-देवता के नांव म मार-काट या लड़ई-झगरा होए हे सबो म अइसने एक्के ठन भर ल माने अउ जाने के संस्कार म पगे मनखे मनके सेती होए हे।
हमर इहां जतका भी पूजा के विधि हे सब्बो म सबले पहिली गौरी-गणेश के पूजा के रिवाज हे, उहू ह इही संदेश देथे के ठकठक ले एके ठन देवता भर के पूजा मत करौ, संग म मातृशक्ति अउ गणशक्ति के घलोक पूजा करौ तब जाके पितृशक्ति के उपासना ह पूरा होही। चैत नवरात ले नवा बछर के शुरूवात माने के आध्यात्मिक कारण घलोक हे। हमर इहां जतका भी धर्मग्रंथ हे जम्मो म सृष्टिक्रम प्रारंभ होए के तिथि इही ल माने गे हवय। हर साधक ल साधना काल म ए बात के ज्ञान करवाए जाथे। साधना के अंतर्गत जतका भी नवा काम होथे सब इहें ले चालू होथे। देवारी माने के बाद कोनो भी नवा काम के भूमिका बने ले धर लेथे, फेर चालू होथे वोहा चैत नवरात ले , तहांले वोला पूरा एक बछर के चक्र म पूरा करे जाथे। नवा बछर अउ नवरात के चरचा होवत हे त महतारी के घलोक नव आगमन के चरचा होना चाही। काबर ते महतारी के नवा रूप म आगमन घलोक चैत नवरात के नवमीं तिथि म होए रिहिसे।
हमर इहां नवरात माने माता के उपासना पर्व ल साल म दू पइत काबर मनाए जाथे? सब देवता के तो साल म एके पइत बार-परब आथे, तब फेर महतारी के परब ह साल म दू पइत काबर आथे? एकर असल कारन ए आय के महतारी के आगमन ह दू बार दू अलग-अलग रूप म होए हे। पहिली बार वो हर सती के रूप म आये रिहिसे अउ दूसरइया बेर पारवती के रूप म । सती के रूप म कुंवार नवरात के नवमीं तिथि म अउ नवा रूप म पारवती बनके जब आइस त चैत नवरात के नवमीं तिथि म। इही असल कारन आय के माता के साल म दू बेर जनम के परब ल नवरात के रूप म मनाये जाथे। आप मन धरमग्रंथ के माध्यम ले ये बात ल सुने होहू के भगवान भोलेनाथ के पहिली पत्नी सती के द्वारा अपन पिता दक्षराज के यज्ञ कुंड म आत्मदाह करे के बाद, जब शिवजी महासाधना म चले जाथें अउ एती बर दैत्यराज ताड़कासुर के उत्पात ले त्राहि-त्राहि करत देवता मनला वोकर संहार खातिर शिवपुत्र के आवश्यकता होथे, तब कामदेव के माध्यम ले तपस्यारत शिव के तपस्या ल भंग करे के उदिम रचे जाथे, तेमा वोहर हिमालयराज के पुत्री पारवती संग बिहाव करय। ए तरह भगवान भोलेनाथ के दू पत्नी के अवतरन के किस्सा हमला मिलथे, जेकर मनके जनम के तिथि ल दू अलग-अलग बेर नवरात्र के रूप म मनाये जाथे।

सुशील भोले
सहायक संपादक – इतवारी अखबार

41191, डॉ. बघेल गली

संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर

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