प्रशासनिक शब्‍दकोश बनइया मन ल आदर दव, हिनव झन

छत्‍तीसगढ़ राजभाषा आयोग दुवारा छपवाय हिन्‍दी-छत्‍तीसगढ़ी प्रशासनिक शब्‍दकोश भाग एक के बारे में कुछ लेखक मन के बिचार पढ़े के मउका लगिस। खुसी होइस के छत्‍तीसगढ़ी भाषा खातिर जागरिति हवय। दू चार बात मोरो मन म उठिस, तोन ल बताना जरूरी समझत हँव।

ए शब्‍दकोश ल राजभाषा आयोग ह नइ बनाय हे। विधानसभा सचिवालय ह साहित्‍यकार मन के कार्यशाला लगा के ऐला तइयार करिस अउ राजभाषा ल छापे बर भेज दिस। आयोग ह बहुत झन साहित्‍यकार अउ भाषा विशेषज्ञ मन ले एला जँचवाइस अउ उँकर सहमति होय के बाद छपवाइस। डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा, डॉ. चितरंजन कर, डॉ. विमल पाठक, डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्र, डॉ. जे. आर. सोनी, सुशील यदु आदि लगभग 15 साहित्‍यकार अउ भाषा विशेषज्ञ मन के योगदान ए शब्‍दकोश म हवय। ए प्रशासनिक कोश आय, सामाजिक अउ पारिवारिक नहि। ते पाय के, घर गाँव के गुरतुर अउ मिट्ठ् शब्‍द नइ मिलय।

ए शब्‍द कोश ल छपवाय के असली मनसा हवय के प्रशासन के काम काज छत्‍तीसगढ़ी में शुरू करे बर मदद मिलय अउ जरूरत पड़े ले सरकारी अधिकारी-कर्मचारी मन ल छत्‍तीसगढ़ी म टिप्‍पणी, चिट्ठी, ज्ञापन आदि लिखे के प्रशिक्षण अयोग दुवारा दिए जा सकय।

एक ठन मनसा अउ हे के शब्‍दकोश म सरगुजिया, हल्बी, गोंड़ी, सादरी, भतरी आदि बोली के समानार्थी शब्‍द घलो जुडँव ताकि बड़े शब्‍दकोश बना सकन अउ छत्‍तीसगढ़ी जादा धनी हो जाय।

प्रशासनिक शटद कोश म उर्दू भाषा के शब्‍द रहना स्वाभाविक है। मुगल कालीन शासन म प्रचलित उर्दू ह अंग्रेजी शासन के तीन सौ ले जादा साल के बाद घलो बने रहिगे अउ आजो हावय। गवाही खातिर समन जारी होही, त लिखाय रहिथे के ‘‘हमें जानकारी मिली है कि तुम इस मामले में गवाही दे सकते हो लिहाजा अमुक तारीख को इतने बजे मेरी अदालत में हाजिर हो ’’ – वगैरह। अइसने बिक्रीनामा म लिखाथे-मन के मैं- वल्द-उमर-निवासी-साकिन-तहसील व जिला-तसदीक करता हूँ कि मुझे अपनी जरूरत के लिए रकम की जरूरत है लिहाजा अपने हक की जमीन खसरा नं., रकबा, फलाना के पास बेचता हूँ । होशो हवाश के साथ यह बिक्रीनामा लिख दिया कि सनद रहे और वक्‍त जरूरत पर काम आए, वगैरह।

अगर कोनो शब्‍द के दूसर उपयुय्त समानार्थी शब्‍द हो सकत हे, त जानकार मन आयोग ल चिट्ठी लिख के सुझावँव ताकि विशेषज्ञ मन ल बता के शब्‍दकोश म संसोधन हो सकय। जब भारतीय संविधान म अभी तक संसोधन होवत हे, त प्रारंभिक शब्‍द कोश म काबर नइ चाही। छत्‍तीसगढ़ी के बढ़ोत्‍तरी खातिर देवेंद्र वर्मा, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, के.डी.पी.राव आदि गैर छत्‍तीसगढ़ी मन के उछाह सराहनीय हे। छत्‍तीसगढ़ी मन के उछाह उँकर ले जादा होना चाही।

एकझन लेखक ह लिख दिस के ए शब्‍द कोश म ‘कोढिय़ा’ शब्‍द के अरथ ‘सुस्त’ लिखाय हे जोन गलत हे, सही अरथ ‘काचोर’ होही। मैं ह शब्‍द कोश म खोजेंव, तब पता लगिस के एमे न ‘कोढिय़ा’ शब्‍द लिखाय हे, न ओकर कोनो अरथ। ओ लेखक के अधरे अधर लबारी मारना बने नइ लागिस। कोनो केकरा ह आगू बढ़े के उदिम करथे, त दूसर केकरा ह ओकर गोड़ ल तिर के गिरा देथे। हमर छत्‍तीसगढ़ म घलो कोनो-कोनो अइसने करथें। एक झन छत्‍तीसगढिय़ा आगू बढ़ही त दूसर हर ओकर गोंड़ तिरथें। अनख होथे के ए ह काबर आगू बढ़त हे। मैं ह ओकर ले आगू बढ़ जाँव, अइसे नइ सोंचय।

अभी शब्‍दकोश के भाग दो अउ भाग तीन छपना हे। मैं हर साहित्‍यकार मन से बिनती कर हूँ के आयोग के कार्यालय म आके ओ शब्‍द कोश ल देख लँय अउ सुधारे के लइक हे, तो अपन सुझाव लिख के दे दँय ताकि छपे के पहिली विशेषज्ञ न ल बता के संसोधन करे जाय।

आखिर म अतके कहना हे के छत्‍तीसगढ़ी भाषा अउ ओकर शब्‍दकोश के बढ़ोतरी खातिर पौधा म खातू डालना चाही, टँगिया नइ मारना चाही। ककरो गलती निकालना सरल हे। गलती निकलइया के घलोक गलती निकल सकत हे। गलती दिखय त ओकर बलदा सही विकल्प सुझावव। हमर सोच धनात्‍मक होना चाही, ऋणात्‍मक नहि। मिहनत करके शब्‍द कोश बनइया मन ल आदर दव, ओमन ल हिनव झन।
मया करइया देवता होथे, क्षमा करइया मनखे तन
घिना करइया रक्‍सा होथें, जइसे चाहस, वइसे बन

दानेश्वर शर्मा
(अध्‍यक्ष, छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा आयोग)

छत्‍तीसगढ़ी प्रशासनिक शब्‍दकोश उपर राजभाषा आयोग के अधियक्‍छ सिरी पं.दानेश्‍वर शर्मा जी के बिचार सुनव-

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One comment

  • अरुण कुमार निगम

    शब्दकोश के बढ़ोतरी खातिर पौधा म खातू डारना चाही, टंगिया नइ मारना चाही, सुग्घर विचार, सुग्घर गोठ.

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