बंटवारा

बुधारु अऊ समारु दूनों भाई के प्रेम ह गांव भर में जग जाहिर राहे ।दूनों कोई एके संघरा खेत जाय अऊ मन भर कमा के एके संघरा घर आय । कहुंचो भी जाना राहे दूनों के दोस्ती नइ छूटत रिहिसे ।ओकर मन के परेम ल देख के गाँव वाला मन भी खुस राहे अऊ बोले के एकर मन के जोड़ी तो जींयत ले नइ छूटे ।
बिचारा बुधारु अऊ समारु के बाप तो नानपन में ही मर गे रिहिसे ।बाप के सुख ल तो जानबे नइ करत रिहिसे ।ओकर दाई बिचारी ह बनीभूती करके लइका मन ल पालीस पोसीस अऊ बड़े करीस । महतारी के दुख ल दूनों भाई समझत रिहिसे एकरे पाय अब दूनों संघरा कमाय ल जाय अऊ जतका पइसा मिले ओला अपन दाई ल दे देवे । ओकर दाई बिचारी ह आधा पइसा ल बचाय अऊ आधा ल घर के खरचा चलाय ।
कुछ दिन में ओकर महतारी ह दूनों भाई के बिहाव कर दीस । बिहाव के होय ले दूनों भाई के जिम्मेदारी अऊ जादा बाढगे।
आदत के मुताबिक दूनों भाई रोज कमाय ल जाय अऊ पइसा ल लानके अपन महतारी ल धराय । ए बात ह दूनों बहू के अंतस में हजम नइ होवत रिहिसे । फेर मने मन में मसोस के रहि जाय।नवा नवा बहू आय हन जादा बोलना उचित नइहे कहिके चुपेचाप राहय ।
समय ह बीतत गीस बहू मन के मुँहू ह खुलत गीस ।अब वो मन ह अपन अपन गोसइया ल बोले के सुरु कर दीस ।तुमन ह एके संघरा कमाय बर जाथव त बने करथव ।फेर पइसा ल अपन दाई ल काबर देथो हमला धराय करो ।का हम ह घर के खरचा ल नइ चलाय सकबो । बुधारु अऊ समारु अपन – अपन बाई ल बहुत समझाय फेर ओकर मन में समझ नइ आय ।
बात ल ओकर महतारी ह सुन डरिस त ओहा बोलथे – बहू मन ह सही काहत हे बेटा ।मेंहा तो अब डोकरी होगे हंव ।घर ल तो अब बहू मन ही चलाही । पइसा ल मोला नइ देके उही मन ल दे दे करो।
अब दूनों भाई अपन अपन कमई ल लानके उही मन ल धराये। तभो ले बहू मन ल संतुष्टि नइ मिलत राहे ।थोर थोर बात में लड़ई झगरा सुरु हो जाय । झगरा ह बाढ़त गीस अऊ बात ह बंटवारा करे तक उतरगिस। गाँव के दू चार आदमी मन समझाइस के रोज रोज के लड़ई झगरा से अच्छा हे दूनों भाई बंटवारा हो जाव अऊ सुख से कमाव खावव।
एक दिन दूनों भाई गाँव के दू चार सीयान मन ल सकेलीस अऊ बंटवारा करे बर कहिस।गाँव के सीयान मन घर दुवार बरतन भाड़ा सबो के दू हिस्सा कर दिस । अब बात ह महतारी उपर अटक गे। महतारी ल कोन राखही । दूनों बहू सोज सोज सुनादीस के डोकरी ल हम नइ राख सकन ।महतारी ह फूट फूट के रोय ल धरलीस के कतका दुख पीरा ल सहिके एमन ल पाले पोसेंव। अपन पेट ल मार के एमन ल खवायेंव ।फेर दूदी झन मिलके मोला एक मूठा खाय बर नइ दे सकत हे , धन्न हे मोर भाग, का करम करेंव तेकर सजा भोगत हों। दूनों बेटा तक ह महतारी के दरद ल भुलागे अऊ नावा नावा बहू के फेर में मोहागे।बिचारी डोकरी जोर जोर से रोय लागीस ।फेर कोनों ओकर दुख ल नइ समझत राहे ।
तब गाँव के सीयान मन बोलीस के महतारी ल तो दूनों भाई ल राखे बर परही । छै महीना बुधारु राखही अऊ छै महीना समारु ह ।
दूनों भाई ह बेमन से तैयार होगे।
एती महतारी के सुसकई ह बंद नइ होवत राहे अऊ सुसक सुसक के बेहोस होके गिरगे ।
सब कोई हड़बड़ा गे । डाक्टर ल बलाइस।डाक्टर ह हाथ नाड़ी ल देखीस अऊ बोलथे अब दूनों भाई आराम से बंटवारा कर सकत हो।
जादा हे त एकर शरीर के भी आधा आधा बंटवारा कर लो ।

महेन्द्र देवांगन “माटी”
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला — कबीरधाम (छ ग )
पिन – 491559
मो नं — 8602407353
Email – mahendradewanganmati@gmail.com

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