बजरहा होवत हमर तीज तिहार




छत्तीसगढ़ म आठोकाल बारो महिना कोई न कोई तिहार आते रथे। चइत, बइसाख , जेठ, अषाढ़, सावन ,भादो, कुंवार, कातिक, अग्घन ,पूस ,मांग, फागुन सबो महिना हमन तीज तिहार मनाथन। हमर पुरखा मन काम काज ले फुरसुद अऊ मगन होके इरखा द्वेस ल भुलाय खातिर तिहार ल सिरजाय रहिन।मया-पीरा, सुख-दुख भुलाय बर अऊ घर-परिवार, गांव-समाज म मेल जोल नाना परकार के बाहना ओला उही मन जानय ।फेर ऊंखर बनाय तीज तिहार ल अब हमन बजरहा बना डारेन।पुरखा मन देश, काल, इस्थिति-परिस्थिति अऊ बेरा कुबेरा ल देख ताक के तिहार बनाय रहीन। फेर सेठ साहूकार, बेपारी मन अपन मुनाफा बर हमर तिहार ल बजरहा के रंग म पोत डारिन। पुरखा मन तिहारबार के रोटी पीठा, मीठ पकवान ल अपन बारी बखरी तीर तखार में उपजे जिनीस ले परिवार संग मिलके बनात रहीस।अब तिहार के जम्मो जिनीस बजार ले बिसा के लानथे अऊ तिहार मनाथे।कोन जिनिस के जरूरत हे एहू ल नई जानय। जेन जिनीस ल हाथ म दुकानवाला सेठ धरादिस उही ल घर लानथन अऊ तिहार मनातन। बहिनी, बेटी, महतारी मन तिहार के दु-चार दिन पहिली ले चना,ऊरीद दरे, चाऊंर गहूं ल जांवता म पीसय। समे बदलिस आज येमन पढ़ लिख बरिन अऊ नउकरी करत हे।ऊंकर करा समय नई हे। तिहार के दिन होटल के मिठई, बरा-भजिया, मिच्चर, केरा, अंगूर, सेव , ठंडई पानी बिसा लेन खाइन अऊ तिहार मनागे। चइत महिना के नवरात्रि म गांव के माता देवाला म जवांरा बोवय, येमा बेपारी ल कुछु नई मिलय तब ओमन जोत जलाय के आदत बनवाईन।अब छोटे ले बड़े सबो मंदिर, सबो भगवान म जोत जलत हे। टीपा टीपा तेल सिरात हे बेपारी घर पईसा बरसत हे परियावरन ल जब्बर नकसान होत हे तौन अलग। रामनम्मी ल छत्तीसगढ़ म पावन दिन माने हे, बर बिहाव बर सुघ्घर मुहुरत फेर यहू दिन ल बेपारी मन अपन फायदा के दिन बना बारिन,चंदा उगाह के भंडारा करायबर सीखादिन।अइसने बैइसाख के अक्ति तिहार काबर मनाय जाथे डाक्टर, इंजीनियर एमबीए पढ़े छत्तीसगढ़िया नई बता सकय।चलत बच्छर म सरगसिधारे परिवार मन ल मिलाय के दिन आवय ।पांच पसर पानी देयबर भुलागे।किसान मन खेती सिरजाय बर धरथे वहू भुलागे।पुतरा पुतरी बिहाव नई होवय।जिहां होवत हे उहां दाईज डोल। यहू ल बाजार ह लील डारिस। बिहाव के सवांगा दुकान म बेचावत हे। मऊर , झांपी, पतरी, गिलास, मड़वा, रंधईया सब बजार म मिलथे।चिकचिकी लगे टोपी,आलमारी, दीवान,पलंग,सोन-चांदी। असाढ़ के दुजडोल के रथ खिचईया मन एक रंग के अंगरखा पहिरही ,डीजे धुन म मोटियारा मन बिधुन होके नाचथे।छत्तीसगढ़ के पहिली तिहार हरेली ल कहे जाथे। फेर आज हरेली के लोंदी, जड़ीबूटी सब नंदावत हे। घर घर म लीम डारा, मोहाटी म खीला ठोंकना सब भठत हे।अब हरेली ह सरकारी “हरेली परब” होगे। बड़का बड़का पोसटर, पंडाल, करोड़ो के खरचा म लाखो पेड़ पऊधा कागद म लगथे। राखी गिफट तिहार होगे। रेसम के डोरी ह सोना चांदी के ब्रेसलेट बनगे। तीजा ,कमरछट ह लुगरा तिहार होगे। पोरा के बईला दुकान दुकान म किंदरत हे। आठे कन्हैया म झांकी मरकीफोर, सोभायातरा म लाखो रुपया देखावा के नांव लेके बजार मे फूंकावत हे। भादो के गनेस चऊत, बीसकरमा म रंगारंग कार्यक्रम ,मूरती, पंडाल ,सजावट,बिजली के अंजोर, डीजे, सब बजरहा होगे।पीतरपाख के पन्दरा दिन बफर पार्टी होथे। कुंवार के नवरात, दसरहा के रुप ल देखबे त मने मन बर गारी गुप्तार निकल जाथे ।कातिक महिना के तिहार देवारी, जेठौनी, मातर म कमईया के घेंच ल बजार ह चमचम ले चपकथे। लिपई-पोतई,घर के सजई, रऊत के सोहई, सब बजरहा होगे। देवारी में कपड़ा-लत्ता, फटाका, दिया-चुकी, पकवान-मिठई सब दुकान म मिलथे।बजार म रंग बिरंग के जिनिस बेचाथे।अगहन, पूस,मांग अऊ फागुन के तिहार घलाव नई बाचिस ईन बेपारी मन ले।नाना परकार के रंग गुलाल बजार म बेचावत हे।सब ले बड़का अऊ बढ़िया बेपार मंद दारु के चलथे। आठोकाल बारो महिना, दुख-सुख, गनेस,दुरगा, बीसकरमा बिसरजन ,बर-बिहाव,छट्ठी -बरही, मड़ई मेला ये सब बिना दारू के नई निभय। गांव गांव म भागवत, रामायण के आयोजन घलाव बजरहा होगे हावय।कुछ हद तक टीवी, मोबाइल ल एकर दोसी मान सकत हन। अब येकर ले ऊबरे के उदिम करेबर परही। कब तक अईसने फंदाय रबो। दू सौ बच्छर हमर देस ह बेपारी मन के बंधना म बंधाय रहीस।अपन ऊपजाय अनपानी के मान करेबर सीखे परही। पढ़े लिखे भाई बहनी मनला नव रद्दा बनाय पर परही तभे बजरहा बने ले बांचबो अऊ गरीबी रेखा ले ऊपर ऊठबो।महंगाई ल काबू करबो।

हीरालाल गुरुजी”समय”
छुरा-जिला गरियाबंद
9575604169







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