बरसै अंगरा जरै भोंभरा

चढ़के सरग निसेनी सुरूज के मति छरियागे
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
बढ़े हावे मंझनिया संकलाए हे गरूआ अमरैया तरी
हर-हर डोलत हे पीयर धुंकतहे रे बैहर घेरी-बेरी
बुढ़गा ठाड़े हे बमरी पाना मन सबो मुरझागे
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
भरे तरिया अंटागे रे कइसे थिरागे बोहत नरवा
बिन पानी के चटका बरत हे मनखे मन के तरूआ
चटका बरगे मनखे मन के तरूआ।
नदिया घाट घलो जाके मंझधार म संकलागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
घर के रांपा कुदारी खनत हावे माटी रे कि सान हर
बोहे झौंहा किसानीन देवतहे ढेलवानी रे मेंढ़ ऊपर
हां देवत हे ढेलवाती रे मेंढ़ ऊपर।
मेहनत बन के पसीना माथा ले बोहावत लागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
कहै भौजी कइसे जावौं तरिया रेंगत मैं जरै भोंभरा
पानी नइये खवइया बर रीता परे हे जमो गघरा
रीता परे हावै रे जमो गघरा
ढरकै कबले रे बेरा हर झटकुन कइसे रतियागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।
नई सुमावै अब कोइली के तान हर आमा के डारा म न
गूंजत रहिथे रे झेंगुरा मंझनिया भर खार अऊ ब्यांरा म न
हां मंझनिया भर खार अऊ ब्यारां म न
लागै कबलै आशाढ़ रे भुइंया गजब अकुलागे।
हाय रे रद्दा रेंगोइया के पांव घलो ललियागे।

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    हां मंझनिया भर खार अऊ ब्यारां म न
    लागै कबलै आशाढ़ रे भुइंया गजब अकुलागे।

    मोर गाँव के तपती मंझनिया के सबो जिनिस संग सुरता, मन के चलचित्र में आगू -पाछू हो हो के आनंद ले गदगदा डारिस. दीप दीदी ला परनाम.

  • @Vivek Gupta

    आपने ‘गुरतुर गोठ’ छत्तीसगढ़ भाषा के ब्लॉग में आकर रचना पढ़, उसे भाव के रूप में समझाने का आग्रह किया है..आपकी इस लालसा के सम्मान के साथ…..प्रस्तुत है.
    प्रस्तुत रचना में में रचियता श्रीमती दीप ‘दुर्गवी’ ने छत्तीसगढ़ के एक गाँव में ज्येष्ठ माह [ गर्मी के समय ] के एक दोपहर में जो स्थिति होती है, उसका अद्भुत सूक्ष्मता से चित्रमय झांकी खींचा है. उन्होंने एक-एक कर यह बताया है कि किसान, खेत, ग्रामीण, नदी, तलब, वृक्ष, पशु..[गाय], पक्षी [कोयल] इन सबका इस मौसम से क्या सरोकार है. और किस आकुलता से सभी आषाढ़ याने बारिश की प्रतीक्षा कर रहें हैं.

  • बहुत बढिया समीर भाई ………..

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