बरीवाला के कहिनी : बंटवारा

‘मोर बंटवारा के कमती जमीन हे। बंटवारा में मिले घर-दुवार ह टूटत-फुटत हे। बड़े भइया सदाराम जेठासी काबर देबो। दूनों बरोबर-बरोबर बांटबो। मोर बंटवारा नीरस हे। सदाराम के बंटवारा सरस हे। बंटवारा दुवारा होना चाही। सरपंच ह कहिस कस खेदूराम, तुंहर बंटवारा होय सात आठ बरस बीतगे। ये सब बात ल बंटवारा के दिन गोठियाना रिहिस। अब पछताय का होत हे जब चिड़िया चुगगे खेत।’ तइहा के गोठ ल बइहा लेग गे।’
बंटवारा सुनके सब के जी हर कांपे बर धर ले थे। बंटवारा दु:खद पल आय। बंटवारा मं, एक कोख म जनम धरे भाई ह बांटे भाई परोसी हो जाथे। एक-दूसर घर के हंडिया के बासी ल हेर के खाय नई सकय। बंटवारा म खेत-खार, घर-दुवार के टुकड़ा-टुकड़ा हो जाथे। अरदा-परदा मरई के मारे, घर-दुवार के नाक-नक्शा बिगड़ जाथे। खेत खार, चुरकी-भुरकी बन जाथे। फेर भाई भंटवारा कहां लुकाही आज नहीं काली होबेच करही। येहा करूहा सच आय।
आज काल, बहू आइस के बेटा बंटवारा मांगे के शुरू कर देथे। वोमन संयुक्त परिवार म नई रहना चाहें। अलग, सुतंत्र घरघुंदिया बनाना चाहथे। फेर बबा, डोकरी दाई, कका-काकी, भइया-भउजी के लाड़-प्यार, आचार-विचार, मार्गदर्शन, आशिरबाद, ह कहां ले मिल पाहीं।
गनेशपुर गांव म एक बड़े किसान राहय। ओकर तिर तकरीबन चालीस एकड़ नंगर जोत्ता खेती राहय। महादेव मंडल काहत लागे। यथा नांव तथा गुन। वोहा व्यवहार म एकदम सिधवा। गांव के कोनो मनखे मंडल कका घर कुछु जिनिस मुंहू फुटकार के मांगे ते खाली हाथ कभू नई आवे। मंडलिन काकी ह घला अब्बड देवतारिन राहय। ऊंकर घर नौकर-चाकर, धन दोगानी के कोई कमी नई राहय हां काहत हूं होवे। कमी राहय ते बस एक संतान के। दू देवी-देवता अपन दुवारी म बइठ के सोंचय-गुनयं संतान प्राप्ति के इच्छा दूनो ल अब्बड़ सतावे। दूनो के माथा म चिंता के लकीर खिंचा जावे। दूनों परानी अपन मन म पक्का निश्चय कर लिन अब हम दूनो छोटे भांचा ल अपन घर राख के पालन-पोषन करबो। ओकर बर-बिहाव करबो अउ घर बसा देबो।
कुछ समे बीते के बाद-वोमन ल भांचा के जस मिलिस। एक नहीं दू पुत्र के प्राप्ति होइस। बड़े बेटा के नांव सदाराम अउ छोटका के नांव खेदूराम। मंडल-मंडलिन के जीतेजी दोनों भाई अलग-बिलग होगे। कोई किसिम के लड़ई-झगरा, वाद-विवाद नई होइन। आपसी समझौता देखे के काबिल रिहिसे। ऊंकर बंटवारा ल परोसी गम नइ पाइन। सुख-दु:ख में एक-दूसर घर आना-जाना, खाना-पीना, नेवता-हिकारी, अच्छा चलत रिहिसे। बंधुत्व के भावना देखते बनत रिहिसे। मंडल-मंडलिन बीतगें।
लगभग सात-आठ बरस बीते के बाद छोटका खेदूराम के मन म लालच समागे। खेदूराम ह एक दिन गांव भर ल बइठका सकेल डरीस। चम-चम ले बइठका सकलागे। गांव के सरपंच ह खेदू ल बइठका के कारन पूछिस। खेदू ह दबे स्वर बोलिस- मोर बंटवारा के कमती जमीन हे। बंटवारा में मिले घर-दुवार ह टूटत-फूटत हे। बड़े भइया सदाराम जेठासी काबर देबो। दूनो बरोबर-बरोबर बांटबो। मोर बंटवारा नीरस हे। सदाराम के बंटवारा सरस हे। बंटवारा दुवारा होना चाही। सरपंच ह कहिस, कस खेदूराम, तुंहर बंटवारा होय सात आठ बरस बीतगे। ये सब बात ल बंटवारा के दिन गोठियाना रिहिस। अब पछताय का होत हे जब चिड़िया चुगगे खेत।’ तइहा के गोठ ल बइहा लेग गे। तें अतेक साल ले कान मं तेल डार के सुते रेहेस। तें आज जागत हस। खेदूराम ह किहिस- जभे जागे तभे सबेरा सरपंच जी। खेदूराम के गोठ ल सुनके सब ठहाका मार के हांसे बर धर लिन। पूरा सकलाय समाज सरपंच के दूध के दूध, पानी के पानी नियाव ल सुनके सब हामी भर दिन। गांव के कुछ सियान मन किहिन- देख खेदूराम, ये जेठासी देना हमर सभ्य समाज के बड़-बढ़िया दस्तूर आवय। सदाराम ह तो जेठासी थोरे मांगे हे। वोला तो हमन सबे मिलके देय हावन। येमा समाराम के थोरको दोस नइए। तेंहा सोंच विचार के गोठियाय कर। गांव के एक झन जवनहा मनखे ह चुटकी बजावत किहिस- खेदूराम तेंहा थूंके ल चाटत हावस। कोनों दू-चार काठा के ऊंच-नींच होइचगे होही ते वोला आपस में पी जाव, सवांस लव। झगरा-लड़ई, मन-मुटाव मं मजा नई आवे गा खेदूराम। खेदूराम अपन जिद में अड़ेच राहय। सदाराम किहिस- तूंहर पंचाइत के फैसला मोला सोला आना मंजूर हे। पंच मन ल परमेश्वर कहिथे। फेर एक बात जरूर बतावत हंव- जब हमर सियनहा ह जीयत रिहिस तब ये खेदूराम के अड़ियल रवइया ल देखके मोला घेरी-बेरी काहय। ये खेदूराम ल बंटवारा दे के अलग-बिलग कर दव येहा ये परिवार ल खेदेच के लाइक होगे हावे। फेर मेंहा ददा ल समझावंव – कइसे करबे ग सबो अंगरी बरोबर नई होवय। येकर का दु:ख ल गोठियावंव- ये हा मोर बड़का बेटा के बिहाव करेंव तब ओकर बरात नइ गीस। छट्ठी के नेवता म घलव नइ आईस। उल्टा अपन लइका मन ल मोर विरोध करे बर भड़काथे। सोसाइटी में खातु-कचरा, करजा लेवत रहेंव तहूं ल अडंग़ा डार के बंद करवा दिस। मेंहा येकर अब्बड़ दु:ख भोगत हंव। सरपंच साहेब, कतेक ल गोठियावंव। भाई बरोबर हितवा नहीं अऊ भाई बरोबर बैरी कहिथें। सब मनखे खुसुर-फुसुर गोठियाये बर धर लिन- ये खेदूराम ह लालची प्रवृत्ति के हे। येकर बात पतियाय के लाइक नइए अऊ येकर व्यवहार घला ठीक नइए। खेदूराम अपन बात मं अड़ेच हे। पंचाइत के बात नइ मानत हे। चलव सब अपन-अपन घर कहिके बइठका ले उठगे। सब आदमी भिरभिरागे। सब अपन-अपन घर चल दिन। फागुन महीना में खेदूराम के बड़े लड़की के बिहाव माढ़गे। खेदूराम के साढ़ू भाई मिलन ह एक दिन किहिस- तेंहा अपन लड़की के बिहाव में दुनिया-दुनिया के सगा मन ल खोज-खोज के नेवतत हावस, फेर अपन सग भाई ल नेवता नइ डारे हावस। तोला दुनिया म कोन अच्छा कही। ये दुनिया तोर करतूत ल देख के हांसही। मोर मानबे ते चल मोर संग सदाराम भाई ल नेवता देके आबो। येमा का लाज-शरम के बात हे जी। साढ़ू भाई के बात ल सुनके खेदूराम निरूत्तर होगे। फेर अनमनहा कस किहिस- का होही भई। मेंहा तोर संग मं चल देहूं। दूनों झन सदाराम घर गइन।
चौरा में ढेरा आटत सदाराम बइठे राहय। वोमन ल देख के घर भीतरी बइठारे बर लेगे। मिलन ह किहिस- भइया सदाराम, खेदूराम घर लकड़ी के शादी माढ़गे हावे, तोला नेवता देय बर आय हावन। सदाराम किहिस- भाई के मुंहू मं लाड़ू गोंजाय हे का जेमा कुछु नई बोलत हे। ये उही खेदूराम आय जेन हा इकर घर नेवता देय बर गे रेहेंव तब बइठ तक नइ किहिस। अब जाना, ले आने समधी संग समधी भेंट होय बर किराया के टट्टू। जेहा हला-हला के समधी भेंट होही। हमर असन के का जरूरत परगे। अब पीछू के आंखी आगू डाहर आवत हे। ऊंट ह जब तक पहाड़ नइ चढ़य तब तक भरभस नई टूटे कहिथे। ये लड़की के शादी ह तोला नवा दिसा दिस हे। में हा बिहाव के निमंत्रण स्वीकार करहूं फेर एक शर्त में। बिहाव के पहिली हमर परचा फूटना चाही। भाई-भाई के खाता अलग होय बिना में काकरो शादी म शामिल नइ हो सकंव। ये मोर दृढ़ विचार हे।
आखिर में खेदूराम ल झुकना परगे, बड़े भाई सदाराम के डंडासरन पांव परके किहिस- मोर ले बहुत बड़े गलती होगे रिहिसे। मोला अब्बड़ पछतावा होवत हे। परचा फोराय म मोरो रजामंदी हे। फेर मोर अंगना में आके ये शादी के भार ल उठा लेबे। सदाराम ल खेदूराम के अनुनय-बिनय ल सुनके भाई बर दया आगे। पीछू के बात ल भुला के बिहाव के नेता ल मान लिस।
मकसूदन राम साहू ‘बरीवाला’

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