बांझ के पीरा-बांझ के सुख

लघुकथा
‘तें मोला टूरा-टूरी नइ देस ना सुन्दरी, मे दूसर बिहाव करहूं तें मोला दोसदार मत कबे, काबर नी देत हस मोला तेंहा टूरा-टूरी।

दू बच्छर ले जादा होगे फेर तोर पांव भारी नी होवत हे।’ भुलऊ ह अपन सुन्दरी नाम के गोसइन ल धमका के काहत राहय।
‘मोर किस्मते मा नइ हे तेला का करहूं, तोला भारी पांव वाली गोसइन लाना हे ते ले आ, मोला कुछु नी कहना हे।’ सुन्दरी ताना ल सुन के फैसला सुना दीस।
‘भुलऊ ल मौउका मिलिस। तहां ले राम्हीन ला बना के ले अइस जेन साल भर मा दू झन जुड़वा लइका दे के भुलऊ ल खुस कर दीस।’
सुन्दरी ल अपन जीवन ह ए घर मा पहाड़ सही भारी लागत रीहीस त उहू ह हाथ लमा के दूसर घर चल दीस। सुन्दरी के नवा गोसइंया के घरवाली ह एक झन टूरा जनम के बीमारी मा खतम होगे रीहीस हे। टूरा ल सुन्दरी ह अपन बेटा कस पाले पोसे रामाधीन सुन्दरी सही घरवाली पा के बड़ खुस राहय। सुन्दरी ल ढंग ले पियार मिलत गिस। तहां ले पहिले के पीरा ह भुलागे। सुन्दरी के कोख ले आज ले लइका नइ जन्मीस फेर रामधीन सही प्रेम करने वाला पा के सुन्दरी खुस हे। खुसी अपने-अपन टपकत राहय सुन्दरी के मुंहूं मा अऊ रामाधीन ल देखे बर तरसत राहय। लइका ह बांझ के पीरा ल भर-भर ले गिरा के सुन्दरी के कोख मा सुखे-सुख भर दीस।

मोहन लाल घिवरिया
सिर्री कुरूद

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