भुईया दाई करत हे गोहार

भुईया दाई करत हे गोहार
भुईया दाई करत हे गोहार
छोड़ के झन जा भैईया शहर के द्वार
ये नदिया-नरवा, ये रूखराई
तोला पुकारत हे मोर भाई
चिरई-चिरबुन मया के बोली बोलत हे
तुरह जवई जा देख जिहाँ खऊलत हे
गाँव के बईला-भैईसा, गया-गरूवामन
मया के आसु रोवत हे
हमर जतन कराईया हा
शहर मा जाके बसत हे

भुईया दाई ला छोड़के
मनखे हा शहर डहर रेगत हे
आज के लईकामन खेती-खार ल छोड़त हे
पढ़-लिख के शहरिया बाबू बने के सपना देखत हे
गाँव ला छोड़ शहर मा जाके बसत हे
नौकरी पाये के खातीर भुईया दाई ला बेचत हे
जम्मो मनखे हा शहर के सपना देखत हे
येला देख भुईया दाई करत हे गोहार
छोड़ के झन जा भैईया शहर के द्वार
Hemlal photo
हेमलाल साहू

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8 comments

  • Mahendra Dewangan Maati

    बहुत बढिया कविता लिखे हो हेमलाल साहू जी | एकर बर आप ल बहुत बहुत बधाई |

    • Hemlal Sahu

      आप ल बहुत बहुत धन्यवाद भैया जोन हमार रचना ल पसंद करेव । जय जोहर

    • Hemlal sahu

      आपको भी बहुत बहुत ​धन्यवाद महेन्द्र देवागन जी।

  • sunil sharma

    छत्तीसगढ़ के सिरतोन पीरा ल लिखे हच संगवारी …बढ़िया रचना हे…गाड़ा-गाड़ा बधाई…..जय जोहार

  • sunil sharma

    हेमलाल भाई अपन whatsapp के नंबर ल दुहु का

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