भूमिका : कथात्मकता से अनुप्राणित कहानियाँ

आज या वर्तमान आधुनिकता के अर्थ में अंगीकृत है। आज जो है वह ‘अतीत-कल’ का अगला चरण है और जो ‘भविष्‍य-कल’ में ‘अतीत-कल’ बन जायेगा, इसलिए आज का अस्तित्व समसामयिक संदर्भों तक सीमित है। परंपरा का अगला चरण आधुनिकता है लेकिन यही रूढ़ हो जाता है तब युग के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पाता। जब हम दाहिना चरण बढ़ाते हैं तब वह आधुनिकता या विकास का सूचक है। बायाँ चरण परंपरा का प्रतीक है, लेकिन जब पुनः बायाँ चरण बढ़ाते हैं तब यह आधुनिकता को अंगीकार करती है और दाहिना चरण परंपरा का स्थान ग्रहण करती है। इस तरह परंपरा आधुनिकता विरोधी नहीं है, परस्पर पूरक है। परंपरा का बीज परिपक्व होकर आधुनिकता का फल सिद्ध होता है और इसी आधुनिकता के फल से परंपरा का बीज जन्म लेता है। युग का सूप परंपराओं को फटक कर सार-सार को ग्रहण करता है और थोथे को उड़ा देता है। यह सार ही आधुनिकता या प्रगति का उद्भास है और असार तत्व रूढ़ परंपरा का प्रतीक है। इस तरह परंपरा और रूढ़-परंपरा को पृथक-पृथक समझना आवश्यक है।
छत्‍तीसगढ़ी कहानियाँ लोककथा की संस्कृति और हिन्दी कथा की सभ्यता का समन्वित स्वरूप है। हीरालाल काव्योपाध्याय की कहानियाँ लोककथात्मक ( और लोकगाथात्मक भी ) धारा से उद्भूत हैं और यह परंपरा पालेश्‍वर प्रसाद शर्मा, पंडित श्‍यामलाल चतुर्वेदी, श्री शिवशंकर शुक्ल, डॉ. विनय कुमार पाठक, से सरला शर्मा की सद्यः प्रकाशित कथा-कृति में विकसित है। संवेदना के स्तर पर आँचलिकता और भाषा -शैली की दृष्टि से किस्सा-गो के वैशिष्‍ठ को संधारण करके यह छत्‍तीसगढ़ी पन को अक्षुण्ण रखे हुए है। समीक्षक इसे ठहराव कह सकते हैं लेकिन यह अस्मिता को अक्षुण्ण रखने का उद्यम ही कहा जावेगा। ‘भोला भोलवा राम बनिस’ की प्रायः सभी कहानियाँ लोककथात्मक ही हैं। पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी की कहानी ‘पतिबरता के पानी’ में ‘ये बात तइहा-तइहा के आय’ से सुरू होकर ‘दार-भात चूर गे मोर किसा पूर गे’ से संपन्न होता है। इसी तरह इनकी ‘रतनपुरहिन सियानिन’ – शीर्षक की नायिका ही लोककथक्कड़ है। डॉ. पालेश्‍वर प्रसाद शर्मा की ‘सुसक झन कुररी! सुरता ले!!’ की कहानियाँ लोककथा के ‘कच्चा’ माल को ‘पक्का’ बनाने की प्रविधि है। शिवशंकर शुक्ल की ‘डोकरी के कहिनी’ हो या फिर इन पंक्तियों के लेखक की ‘छत्‍तीसगढ़ी लोककथा’ हो, लोककथा को ही शिष्‍ट स्वरूप में प्रस्तुति का प्रयास कहा जवेगा। जब इनके विषय सीमत और लगभग मध्यकालीन जीवन को विवेचित करने, रूढ़ि, परंपरा और लोकविश्‍वास को प्रोन्नत करने, संयुक्त परिवार को पोशित करने, बुद्धि की जगह हृदय से सोचने के आग्रही होते हैं, सीमित संसाधनों में प्रसन्न रहना और ‘संतोशम् परम सुखम’ को अंगीकार करना गंतव्य हो जाता है, तब कथा की डोर जीवन में न होकर नियति के हाथों सौंप दी जाती है। लोक कथात्मकता से असंपृक्त होकर आज की कहानियाँ सामाजिक यथार्थ से सरोकार रखती हैं।
यदि आधुनिक कथा के विकास पर दृष्टि डालें तो वह स्थूल से सूक्ष्म, निर्जीव से सजीव, तथा सरल से जटिल शिल्‍प की ओर बढ़ती जा रही है। वस्तु पशु से मनुज की ओर और फिर से मनुज से मन और अंतर्मन के अंतराल तक पहुँच गयी है। अब कथाकार जीवन की ही कथा कहता है। छत्‍तीसगढ़ी कथा-साहित्य भी वर्णनात्मकता को तज कर विष्लेशण की ओर जा रहा है। लोककथा में जो अलौकिक तत्व रहता है, वह अब सर्वदा अविष्वसनीय और अस्वाभाविक माना गया। इसी से आधुनिक छत्‍तीसगढ़ी का मूलाधार यथार्थ का कठोर धरातल है, विपन्न जीवन की विवषेता है, आँसुओं का अर्ध्‍य देने वाली व्यथा-कथा है, करूण-कातर मन का क्रंदन है और अकाल पीड़ित धरती-पुत्र की आत्मा की पुकार। धर्म के प्रति आस्था कृषक की बेबस आस्था है। उसकी आस्था खूँटे में बँधे उस गाय की तरह है जो कहीं नहीं जा सकती। छत्‍तीसगढ़ी साहित्य अभी भी धर्म और समाज के नाम पर घुट रहा है, रूंध रहा है फिर भी इस तड़प से उसे मुक्ति नहीं। संभवतः नई पीढ़ी इस घुटन से मुक्त हो सकेगी।
छत्‍तीसगढ़ी कहानियाँ लोककथात्मक और सामाजिक, इस तरह दो भागों में वर्गीकृत की जा सकती है। लोककथात्मक कहानी के अंतर्गत कथाकार अपनी कहानियाँ उसी तरह सुनाता है जिस प्रकार ज्ञानवृद्ध-वयोवृद्ध बाबा अंगीठी के चारों ओर बैठे हुए नाती-पोतों को सुनाते है। यह इतिवृत्‍तात्मकता इन कथाओं की प्राण-शक्ति है। इस किस्सागोई में कुछ ख्वाब हैं, कुछ असल हैं, कुछ तर्जे-बयाँ भी – ‘दलहा पठार के तराई म नानकुन गाँव म बंधवा पार ………. जहाँ एक ठन गोंड़ किसान रहिस। किसान के चार बेटवा …………..अउ एक्के ठिन बेटी रिहिस। किसान बने पोट्ठ खात-पियत किसान रहिस।’
‘एक गाँव म पैली अउ पैला रहँय। उन दूनों में बड़ मया। फेर एक दिन गोठ-गोठ म बात बढ़ गे अउ नउबत इहाँ तक आ गे के पैली ल पैला ह मार दिहिस………….. पैली ल मारिन पैला, तौ पैली चलिन रिसाय।’
छत्‍तीसगढ़ी कहानियों का विकास एक ओर यदि लोककथात्मकता से कथात्मकता की ओर केंद्रत हुआ तो दूसरी ओर वह लोकतत्व उससे छूटता रहा जो लोक जीवन का अंग, संस्कृति का रंग और अध्यात्म का ढंग बना हुआ था। किस्सा-गो से छूटने से अलौकिकता, रहस्यात्मकता, रोमांच, एय्यारी और इहलोक का इतिवृत्‍त तिरोहित होने लगा। कुलीन, संभ्रांत और आभिजात्य की जगह मध्यवर्ग का जीवन-संघर्ष और आर्थिक ढंग से पिछड़े और निम्न वर्ग से निर्दिश्ट दलितों, आदिवासियों, कृशक-मजदूरों का जीवन केंद्रिय बनने लगा। नारी जो युगों-युगों से पीड़ित-शोशित , उपेक्षित, तिरस्कृत थी, उसकी अस्मिता पर अन्वेशण का आरंभ औरतों के द्वारा ही आयोजित हुआ। शिक्षा के प्रचार व यातायात के साधनों की अभिवृद्धि से संकुचित दृष्टि उदार होने लगी, परिणामतः छत्‍तीसगढ़ी कथाकार संवेदना की जगह तथ्याश्रित होने लगे। कृशक-मजदूर, शोशित -दमित-दलित वर्ग में चेतना का संचार दृष्टि गत हुआ। स्त्रियाँ पढ़ने लगीं और अधिकारों के प्रति सजग-सचेश्ट भी होने लगीं। सती-प्रथा, पर्दा-प्रथा, वैधव्य, बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, बहुविवाह पुराने जमाने के साधन रह गये। स्त्रियों ने समाज को अपने पक्ष में करके एक ओर सकारात्मक सोच को अभिव्यक्ति दी तो दूसरी ओर क्रांति और आंदोलन के पथ पर अग्रसित होकर अधिकारों की लड़ाई भी जारी रखीं। कुछ ने नकारात्मकता को महत्‍ता दी, फलतः स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता को आधार मिला। इससे अन्य प्रकार की समस्याएँ भी उभरी जो नारियों को गुलाम बनाने के नवीन अस्त्र बने। नारी केवल देह नहीं है, वह आत्मा भी है। इस आधुनिक चिंतन ने जहाँ नारी विमर्ष को उत्कर्ष दिया, वहीं ‘देह’ को साधन की तरह इस्तेमाल कर प्रगति के शीर्ष पर पहुँचने की प्रवृत्ति का भी पथ प्रशस्त किया।
इसी तरह लिंग और जाति से रहित विशुद्ध मानवतावादी दृष्टि पर केंद्रित विकलांग-विमर्ष इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के दस्तक के रूप में छत्‍तीसगढ़ी कथाकारों की जागरूकता का प्रमाण बनी।
आतंकवाद व नक्सलवाद से जूझ रहे इस नव विकसित राज्य की भीषण समस्या को भी जानने समझने का प्रयास छत्‍तीसगढ़ी कहानियों में उभरता जरूर है लेकिन विशय के संज्ञान के अभाव और गहरी पड़ताल के अलगाव के कारण यह क्षेत्र औपचारिकता बन कर रह जाता है। केयूर भूशण की कहानी ‘हाय तोला नइ बचाए सकेंव’ में सांप्रदायिक सद्भाव का समावेश है जबकि आतंकवाद पर इनकी एक उल्लेखनीय कहानी भी ‘कालू भगत’ संग्रह में समावेशित है। ‘बन बीच ठाढ़े हवेली’ शीर्षक कहानी में उर्मिला शुक्ल छत्‍तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या को उठाती तो है लेकिन उसका निर्वाह नहीं कर पातीं। केवल सपना दिखाकर नव विहान की प्रतीक्षा के लिये नेताओं की मुद्रा में एक आस भर जगा देती हैं।
छत्‍तीसगढ़ में जाति-पाँति की कट्टरता के अभाव और एक पारिवारिक इकाई की तरह समन्वित सद्भाव के कारण यहाँ दलित-विमर्ष की आवश्‍यकता ही महसूस नहीं की गयी, फिर भी राजनीति के चलते इक्की-दुक्की कहानियाँ लिखी जाती रही हैं। भारतीय सेस्कृति की मर्यादा और त्यागमय जीवन पर आधारित नारियों के आदर्ष पर जहाँ छत्‍तीसगढ़ी के अनेक कथाकारों ने लेखनी चलाई हैं, ठहराव की इस स्थिति के मध्य डॉ. उर्मिला षुक्ल की एक कहानी ‘गोदना के फूल’ को उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया जाता है। यह खानाबदोश देवार जाति की स्त्री की व्यथा-कथा है जो धर्म-परिवर्तन के द्वारा देवरनिन से करीमन बनती है और फिर न सामंत की सुध लेती है और न करीम के घर जाती है। इस कहानी के संदर्भ में श्री नंदकिषोर तिवारी लिखते हैं – ‘यह कहानी सिर्फ नारी के अस्तित्व पर ही ऊंगली नहीं उठाती अपितु धर्म के ठेकेदारों पर भी ऊंगली उठाती है। धर्म में बँटे लोग करीम और गौंटिया दोनों को वह त्यागती है और अकेले निकल जाती है – एक नयी जिंदगी को तलासने ।’
एक नई जिंदगी की तलाश क्या देह तक ही सीमित होगी? इस संदर्भ में श्री कुबेर द्वारा प्रकाशित द्वितीय कथा संग्रह ’कहा नहीं’ में उत्‍तर देने की कोशिश की गई है। ‘कहा नहीं’ शीर्षक नायिका प्रधान कहानी है जिसमें चंपा छरहरे बदन की कोमलांगी नायिका है जिसे नवा बाबू परी समझने का भ्रम पाल लेता है। आँचलिक उपमानों और प्रतीकों का प्रयोग उसके सौंदर्य निरूपण में हुआ है –
‘चिरौंजी के बीजा कस दांत हे, लाल खोखमा फूल के पंखुरी कस ओंठ हे। कनिहा के आवत ले बेनी झूलत हे, भुरवा-भुरवा चुंदी ह जब खुलथे तब अइसे लगथे कि अगास गंगा के धार ह लहर-लहर करत धरती म उतर आय हो। सतरा-अठारा साल के जवानी के का पूछना हे? चोली म समात नइ हे, उछल-उछल जावत हे; देख के काकर नीयत ह नइ डोल जाही? दिन भर घाम-प्यास, सर्दी-गर्मी, पानी बरसात म रांय-रांय रोजी-मजूरी करथे चंपा ह, फेर बदन ह बिहने-बिहने फूले खोखमा के फूल कस, ताजा के ताजा।’
चंपा बर्तन मांजकर गुजारा करती है। उसकी माँ भी यही काम करती थी। जवानी में एक परदेसी बाबू को दिल दे बैठी जो चंपा और उसे छोड़ कर चला गया। चम्पा की माँ को डर है कि कहीं चम्पा भी नवा बाबू के जाल में पड़ कर जिंदगी बर्बाद न कर बैठे। चम्पा को अपने पर पूरा विश्‍वास है और वह चौकस भी है। नवा बाबू उसे अन्य आदमियों की तरह नहीं लगते जो नारियों को मात्र मादा मानें। उस पर भी उसे विश्‍वास है लेकिन एक दिन जब वह उसका रास्ता रोक कर हाथ पकड़ लेता है तब वह चंडी रूप दिखाती है जिससे भयभीत नवा बाबू रास्ता छोड़ देता है। उसे पष्चाताप होता है और कई दिनों तक चम्पा का सामना नहीं कर पाता। चंपा उसके घर का काम करना छोड़ती नहीं लेकिन गुमसुम-गुमसुम रहती है। चम्पा का विवाह एक जगह नियत हो जाता है। वह नवा बाबू को प्यार की अहमियत सिखा कर नये जीवन की ओर अग्रसर हो जाती है। ‘शिवनाथ -सतवंती’ की किवदंती के आधार पर लोक कथात्मकता से अनुप्राणित यह कहानी यहाँ की नारी की अस्मिता से साक्षात्कार कराती है।
‘बसंती’ शीर्षक कहानी में बर्तन मांज कर गुजारा करने वाले परिवार का प्रसंग है। बसंती मास्टरिन बनकर माँ को चाकरी से मुक्ति दिलाने का जो महत् कार्य करती है, वह गाँव की सीमित-संकुचित दृष्टि , पारंपरिक दृष्टि पर एक महिला की जीत साबित होती है। शिक्षा के द्वारा एक महिला स्वाभिमान के साथ आत्म-निर्भर जीवन-व्यतीत कर सकती है, इस उद्देश्‍य को यहाँ उपस्थित किया गया है।
‘आज के सतवन्तिन: मोंगरा’ शीर्षक कहानी में ‘बाम्हन चिरई’ गौरैया की उपस्थिति कथा के विकास के साथ कथाकार की आत्मा की उपस्थिति भी कही जा सकती है। डोकरी दाई के बेटा ( छोटे भाई बच्चन सिंह गँउटिया के बेटा ) बिसु का व्याह हुआ – मोंगरा की तरह सुवासित गौरवर्णी अनिद्य सुंदरी कन्या मोंगरा से। विवाह के तुरंत बाद बिसु परदेस प्रस्थित हो गया। पारंपरिक सास का षडयंत्र सुरू हो गया। जिसकी इजाजत के बिना साँस न ली जा सके, वही तो सास की अहमियत का तकाजा है। कथाकार सतवंतिन की लोककथा से बिसु के घटनाक्रम को समीकृत करता है। इधर मोंगरा रूपवती है तो उधर सतवंती रूप और गुणों की खान है। दोनों को क्रमषः सास और जेठानी का कोप-भाजन बनना पड़ता है। इस संघर्ष से नारी का जीवन नारकीय हो जाता है। नारी ही नारी की दुष्मन बनी बैठी है, यह विडंबना आज की इक्कीसवीं सदी में भी लोग भोग रहे हैं। सतवंती का पति तो उसे चाहता है लेकिन मोंगरा को, सास की राह पर पति भी प्रताड़ित करने से बाज नहीं आता। आज भी दहेज के नाम पर बहुओं को जलाने या आत्महत्या के लिये प्रेरित करने के अनेकानेक उदाहरण मिल जायेंगे। मोंगरा की दुर्दशा देख कर माँ-बाप भी मुँह मोड़ लेते है क्योंकि एक बार कन्या किसी के घर की बहू बनी तो फिर ससुराल से ही उसकी अर्थी उठती है। नारी अस्मिता के लिये यह स्थिति भी चिंतनीय है।
‘बाम्हन चिरई’ शीर्षक एक अन्य कहानी पृथक होकर भी पूरक प्रतीत होता है। कथाकार ने प्रस्तुत कहानी में पक्षी-मनोविज्ञान का जो आश्रय लिया है, वह सामान्य घटना होकर भी असामान्य बन गयी है। आज जब बाम्हन चिरई की प्रजाति विलुप्ति के कगार पर है, कथाकार ने उसे अंतरंग निर्दिश्ट कर लोकजीवन के अंग के रूप में आत्मीयता के साथ अनावृत्‍त किया है।
‘फूलो’ शीर्षक कहानी की नायिका फूल जैसी कोमल कमनीय है जो गरीब के आँगन में सुवासित है। गाँव में सामंत का साम्राज्य है जो मालिक के नाम से सब के मर्ज की इलाज है। फूलो के माँ-बाप काले हैं लेकिन मालिक की कृपा के कारण फूलो गौर वर्ण की है। फुलो की सुंदरता के रूप-गुण की चर्चा सुनकर विवाह के लिये उसे मांगने हेतु रिष्ता आता है और विवाह की तिथि सुनिष्चित भी हो जाती है लेकिन गरीब माँ-बाप के पास लड़की की बिदाई के लिये कपड़े-गहने व नेग का सामान तक नहीं है। मालिक की कृपा बरसती है और फूलो को सब सामान मिल जाता है। गरीबों की विवषता का लाभ उठाने वाले, कृपालु और मालिक के रूप में सम्मानित है, यह विडंबना इस कहानी की केंद्रीयता है।
‘दू रूपिया के चाँउर अउ घींसू-माधव: जगन’ शीर्षक कहानी एक शिक्षित रिक्षे वाले की व्यथा-कथा है जो विवषता के कारण इस व्यवसाय से जुड़ जाता है क्योंकि गलत काम करना उसे मयस्सर नहीं। वह गरीबों और मेहनत मजदूरी करने वालों के प्रति भ्रश्ट अधिकारियों-कर्मचारियों की घटिया सोच को भी उजागर करता है और शिक्षित होने के कारण स्वाभिमान की रक्षा भी करता है। इस स्थिति में समाज के प्रति उसका आक्रोश अभिव्यक्त होता है।
आँचलिक तत्वों के अनायास आगमन से कहानियों में आँचलिकता का सहजाभास हो जाता है। आधुनिक छत्‍तीसगढ़ी कथाकारों में इसकी अल्पता या नगण्यता के निर्दिश्ट होने से केवल भाषा यी रूपांतरण वाली समक्ष प्रस्तुत हो रही हैं। इसी तरह लोककथात्मकता से असंपृक्ति के कारण कथा-रस का अभाव भी चिंता का विशय बना हुआ है। इस दृष्टि से कुबेर की कहानियाँ उल्लेखनीय प्रमाणित होती हैं। भाषा सहज-सरल और संप्रेशणीयता को संधारण करती हैं। मुहावरे-कहावतों का यथावसर प्रयोग भाषा को भावोत्पादक बनाती है। इसके अतिरिक्त ठेठ सांस्कृतिक शब्दों और ध्वन्यात्मक प्रयोगों से भाषा सजीव-सार्थक प्रतीत होती है, यथा – उकुल-बुकुल, ( उभुक-चुभुक ), सइमों-सइमों, कोल्लर-कोल्लर, सुटुर-सुटुर, लकलक-लकलक, कलर-बिलिर, रिगबिग-रिगबिग, टुप-टुप, टुकुर-टुकुर, उलांडबाटी, लिबलिब ( टिपटिप ), चोचन-चोचन, दंदर-दंदर, छटका-छटका के, डिगडिग-डिगडिग, लिचलिच-लिचलिच, र्छिहीं-भिहीं, तनतिन-तनतिन आदि। प्रलंब कहानियों में पूर्व दीप्ति-पद्धति का प्रयोग परम्परानुसार ही अनुस्यूत है, अर्थात इस शैली से रोचकता की वृद्धि हो जाती है जो कथा का वैशिष्‍ठ कहा जा सकता है।
कुबेर का प्रस्तुत संग्रह उनके पूर्व के संग्रह के विकास का अगला चरण ही कहा जाना चाहिए। कथाकार कुबेर इस संग्रह से पृथक पहचान प्रस्थापित करेंगे, इसमें दो मत नहीं।
षुभकामनाओं सहित –
1. सुसक झन कुररी! सुरता ले!! – डॉ. पालेश्‍वर प्रसाद शर्मा, पृष्‍ठ 26.
2. छत्‍तीसगढ़ी लोककथा, – डॉ. विनय कुमार पाठक, पृष्‍ठ 11.
3. छत्‍तीसगढ़ी साहित्य: दशा और दिशा – नंदकिशोर तिवारी, पृष्‍ठ 97.

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डॉ. विनय कुमार पाठक
एम.ए., पी.एच-डी, डी.लिट्. (हिन्दी)
पी.एच.डी., डी.लिट् (भाषा विज्ञान)
मो. 09229879898

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बिलासपुर ( छ. ग. )

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