‘भोले के गोले” म छूटत गियान के गोला

ये पुस्तक ह पंचमिझरा साग के सुवाद देथे। ये साग के अपन सुवाद होथे। हमर बारी बखरी के हर फर के मान रखे जाथे, एक-एक, दू-दी ठन फर ल मिंझार के अइसना साग बनाये जाथे के मनखे ह अंगरी चाटत रहि जाथे। इही हाल ये ‘भोले के गोले” के आय। अपन हर विधा ल सकेल के सुशील भोले ह गोला फेंके हावय। बियंग म बियंग के गोला हावय, तव लेख म सुग्घर विचार के संग-संग पीरा के गोला हावय। ‘सुरता” म अपन सुरता के गोला फेंके हावय त कहिनी म ‘मन के सुख” के गोला बांटत हावय।
ये संकलन म एके ठन कहिनी हावय फेर कहिनी के संदेश गंज अकन हावय। एक नारी के विकास यात्रा जेमा बाल-विवाह के बाद पढ़े-लिखे पति के छोडऩा अउ रेजा के काम ले जिनगी शुरू करके झाड़ू-पोंछा, फेर नर्स ओखर बाद पढ़-लिख के एक डॉक्टर बनना। ये अंजलि के कहिनी आय जेन अंजलि ल बाद म सरकार ले ‘नारी शक्ति सम्मान” मिलथे। ये कहिनी के एक पक्ष आय जिहां अंजलि मेहनत करथे। फेर अपन मन ल कइसे संतुष्ट करय? दूसर पक्ष आय के अपन संतुष्टि बर ओ ह संगीत ल चुनथे। काबर के संगीत आत्मा ल परमात्मा ले जोरथे। ये ह अंजली के दूसर पक्ष आय। कहिनी के अंत मन ल छू लेथे- ‘तन के सुख के संगे-संग वो ह लोगन ल मन के सुख घलो बांटथे।”
‘नवा बछर के नवा आस” लेख म सुशील भोले ह छत्तीसगढ़ ल दस बछर के लइका के रूप म देखत हावय अउ काहत हावय के हमर ददा-बबा मन जेन सपना देखे हावंय ओ रूप ल गढऩा हे। अपना भाखा, साहित्य, कला संस्कृति, संस्कार ल बनाना हे। लेखक अपन जिम्मेदारी के एहसास करावत हावय। ‘छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति” के माध्यम ले छत्तीसगढ़ के तीज तिहार ल छत्तीसगढ़ के संदर्भ म जेन लेखन आज होवत हावय ओखर तालमेल, हमर संस्कृति म नई दिखय। मूल संस्कृति दूरिहावत हावय। ये लेख हमर संस्कृति के पूरा जानकारी देथे।
‘अस्मिता के आत्मा संस्कृति” आज दूसर प्रदेश ले आये मनखे मन के संस्कृति ल छत्तीसगढ़ के संस्कृति के रूप म लिखत-पढ़त हावयं। ये लेख म लेखक ल एक आस हावय के इंटरनेट के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी ह चारोंखुंट पहुंचगे हावय। अवइया बेरा म छत्तीसगढ़ भासा चमकही। ये छत्तीसगढ़ी भासा के व्याकरण 125 बछर पहिली लिखागे रहिस हे। हीरालाल चन्नाहू ‘काव्योपाध्याय” के लिखे व्याकरन के अंग्रेजी अनुवाद जार्ज ग्रियर्सन ह 1890 म करे रहिस हे। फेर ये ह आठवीं अनुसूची म काबर नई आत हावय?
‘हीरा गंवा ये बनकचरा” म दू बात हावय एक तो इहां के संस्कृति सतयुग के संस्कृति आय। शिव उपासना, बूढ़ादेव के संस्कृति इहां रचे-बसे हावय न कि राम या कृष्ण। दूसर बात आय के इहां के हीरा बेटा याने जेन असल म छत्तीसगढ़ के लेखक कवि हावय, जेन ल बनकचरा म फेंके गे हावय, लुका देय गे हावय तेन ल खोज के आगू म लाना है। ‘तभे आथे निखार” म छत्तीसगढ़ी पत्र-पत्रिका के जानकारी देय गे हावय। येखर संग-संग लेखक के कहना हावय के देवनागरी लिपि के सबो वर्णमाला ल अपना के शुद्ध भासा बनाना चाही। येखर ले देवनागरी पढ़इया मनखे मन येला पढ़के समझ सकंय अउ आत्मसात कर सकयं। ये सब्बो लेख छत्तीसगढ़ी भाषा बर लिखे गे हावय। ये स्तरीय लेख ल पढ़के सब ल अपन भासा के प्रति जागरुकता आही।
सुशील भोले ह बियंग विधा म घलो कलम चलाय हावय। ‘गोल्लर ल गरुवा सम्मान” म सम्मान अऊ पुरस्कार ल चना-फुटेना असन बांटे जाथे। तेखर ऊपर बियंग हे। ‘धोंधो बाई” में कवियत्री के माध्यम ले बियंग करे गे हावय। आजकल आयोजन मन रूप-रंग अउ देह, पांव ल जादा देखथे। जेन जतका जादा फेशन करके रहिथे, वो वोत के बड़े कवियत्री। ‘सम्मान के सपना” म लेखक ह छत्तीसगढ़ के सच्चाई ल बियंग के माध्यम ले उजागर करे हावय। राज सरकार के अलंकरण ले ले के केन्द्र सरकार के पद्य सम्मान तक के सपना म बिधुन होगे हावयं। बपरा मन अपन-अपन परिचय के कागद धरे ये गली ले वो गली, सिफारिश तक किंजर-किंजर के साड़ ले सोक-सोकहा बानी के पठरू कस होगे हावय। ‘दीया तरी अंधियार” म घुघुवा के माध्यम ले बड़े-बड़े नेता व्यापारी के नौकर के सुरता आगे। आखिर उंखर देवारी कइसे होथे। ये बियंग दिल ल छू लेथे। बड़े-बड़ेे बिषय ल बियंग के माध्यम ले सुशील भोले ह आसान कर दे हावय।
‘पुरखा मन के सुरता के परब पितर पाख”, ‘पहिली सुमरनी तोर” म गनेस के जानकारी, ‘गुथौं हो मालिन माई बर फूल गजरा” म छत्तीसगढ़ के संस्कृति म जंवारा (नवरात) के पूरा जानकारी हावय। अमरित पाए के परब शरद पुन्नी म समुद्र मंथन ले निकले विष अउ अमरित के संग-संग बस्तर के दसरहा के जम्मो जानकारी हावय जेन इंहा के जुन्ना संस्कृति ल उजागर करथे। छत्तीसगढ़ म कार्तिक नहाना अउ गौरा-गौरी के बिहाव, सुवा नाच के जानकारी के संग-संग ‘एक पतरी रैनी-बैनी” म गौेरी-गौरा के बिहाव के पूरा जानकारी हावय। मेला मड़ई के जानकारी के संग-संग राजिम म कुलेश्वर महादेव के जगह राजीव लोचन के नांव ले कुंभ मेला भरना इहां के संस्कृति संग खिलवाड़ करना आय। हर लेख म लेखक के छत्तीसगढ़ के भासा, इतिहास, संस्कृति ऊपर पीरा दिखाई देथे।
‘सुरता” म नाचा के पुरोधा मदन निषाद, पंडवानी पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा, बिसंभर यादव ‘मरहा” के संग-संग सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा के जानकारी देय हावय। अंत म हमर मूल परब के जानकारी देय गे हे। येमा तीज तिहार के जतका जानकारी देय गे हावय, ओला विस्तृत समझे जा सकथे। आज हमर छत्तीसगढ़ के गांव-गांव तक करवा चौथ, संतान सप्तमी पहुंचगे हावय। हमर पूजा पाठ के तरिका बदल गे हावय। आज धान्य लक्ष्मी के पूजा के जगह सब धन लक्ष्मी के पूजा करथें। ऊंखर बर हमर परब ल जानना बहुत जरूरी हावय।
ये पुस्तक म भासा संस्कृति के जानकारी ल देय के कारन पठनीय अउ संग्रहनीय हावय। येखर भासा सुग्घर अउ सरल हावय। हाना गीत के संग लेख के प्रस्तुति रोचक बनगे हावय। मूल संस्कृति के जानकारी देय बर सुशील भोले ल बधाई।

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किताब – भोले के गोले
लेखक – सुशील भोले
समीक्षक -सुधा वर्मा
प्रकाशक- वैभव प्रकाशन, रायपुर
मूल्य- 100 रूप

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