मँहगाई

मार डारिस हमला मँहगाई, गुनेला होगे का करबो जी ।
कइसे के जिनगी ला चलाई, गुनेला होगे का करबो जी।
माहंगी के दार चाहुंर मांहगी के तेल।
माहंगी मा जिनगी हमर बनगे हे खेल।।
साग भाजी नुन मिरचा झाड़ु साबुन बट्टा।
सपना होगे पहिरे बर नवां कपड़ा लत्ता।।
जुन्ना ला कतेक ला उजराई गुनेला होगे का करबो जी।
जोंतेन फांदेन निदेन कोड़ेन परगे अंकाल।
लुयेन जुच्छा पयरा संगी होगेन कंगाल।।
कोठी जुच्छा परे हे भाई, गुने लाहोगे का करबो जी।
. कृष्ण कुमार भारतीय .
– ग्राम -चिचोली
पो.-टेमरी, जिला-दुर्ग (छ.ग.)

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4 comments

  • अच्छी रचना है। कुछ समझ आई कुछ न आई।

  • द्विवेदी जी कांई? थाने समझ नही आई,मै शब्दा को कु्छ अर्थ लिख रह्योhछुं थे एक बार-आर समझ ल्यो,

    डारिस= डाला
    गुनेला होगे=सोचना पड़ गया-चिंता
    हमला=हमको
    करबो=करेगें
    माहंगी=महंगी
    दार चाहुर=दाल चावल
    जुन्ना=पुराना
    उजराई= उजाला करना= धोकर चमकाना
    कतेक= कितना
    जोतेन=बोना
    फ़ांदेन=हल मे बैल जोड़ना
    निदेन=निंदाई करना
    परगे=पड़ गया
    लुयेन= लावणी- फ़सल-काटना
    जुच्छा= खाली हाथ-खाली
    कोठी=धान रखने का कमरा
    पयरा= धान निकालने के बाद बचा हुआ चारा

  • Surendra

    मोला अड्बड् अच्‍छा लागिस हे गा

  • शकुन्तला शर्मा

    महंगाई सुरसा कस बाढत हे सुनव देश के नेता मन ।
    कैसे जियय किसान बता दव कहव देश के नेता मन ।।

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