मंगत रविन्‍द्र के कहिनी ‘सोनहा दीया’

चारों मुड़ा लेन्टर के घर…पिछोत म नीलगिरी के ऊँचपुर रूख, दिनरात फुरहुर बइहर परोसत रहै। अंगना कती के कंगुरा म परेवा के मरकी बंधाए रहै जेमा धंवरा-धंवरा परेंवा मन ए मरकी ले ओ मरकी दउंड़-दउंड़ के घुटुर-घुटुर बोलत रहैं। बारी म पड़ोरा के पार लम्बा-लम्बा फर चुपचाप बोरमे हे। अंगना म बोरिंग के मुठिया सुरतावत अद्धर म टंगाए हे। सांझ कन अंधियारी के समाती म अघनिया के खोली म धीमिक-धीमिक दीया बरत रहै।
अघनिया के तीर ओकर औतारे दु ठो बाबू… दाई के जांघ ल पोटारे चटके रहैं। अघनिया… पलंग के पाटी म बइठे जिंदगी के सूक्खा रेगीस्तान ल अंतस ले निहारत हे। छेवरहा तिरही के तेल कस आँखी ले आँसू थप-थप थिपत रहै। दाई के अंतस के पीरा अऊ आँखी के करू आँसू ल दुनों लइका का जानै….? ओ तो अपन कोंवर-कोंवर हाथ म दाई के जाँघ ल रपोटे हें। कर के किलकारी… दाई के हिचकी-सिसकी अऊ टपकत आँसू के दु बून्द कोंवर हाथ के थपोल म परै ता ओला नानकन अंगरी म बगरावत पोंछै। दुनों लइका तो करेजा के चानी ए। बड़े दाऊ हर गोठियाए जान डारै। दाई के आँखी ले ओगरत आँसू ल देख के ननकी अंगठी ले आँखी के कोर मेर लेजा के पोंछै जेन गाल म बगर जाए फेरेच थप्प ले दु बून्द आँसू टपक जाए…।
कचरा देरानी अपन खोली म जेवन बनावत हे। कभू बरतन भांड़ा के ठिकी सुनावत हे ता कभू ओकर कोरी के लइका के किलकारी…. सास हर परोसीन गिलासा घर बइठे गय हे नंगते कन गोठियाइन तहाँ घर फिरिस। मुंहटा म समाते साद बड़े पत्तो के खोली ल झांकिस। पत्तो के आँखी ले ओरवाती कस आँसू टपकत हे। सास हर अपन छाती ल बज्जर करके खोली म समाइस। पलंग म बइठ के ओकर मुड़ी ल अपन छाती म लगा लीस। कहिस:- बेटी ! मोर करम सात चानी चनागे। बिधाता के का बिगाड़े रहेंओं। उपज के बाढ़े रहिस… लेगे….। ए उमर ! अऊ… तैं बिगर चूरी के होगे। मांग धोवागे। जिंदगी के सुघर फुलवारी उजरगे। अब सुख के भौंरा कब लुरही। मैं एक तिरिया औं… तिरिया के कलपना, मरम अऊ पीरा ल जानथौं कथें ना गऊ गोहार अऊ तिरिया गोहार एक बराबर होथे। तोर आगू जिंदगी के जबर पहार खड़े हे। कोन नकाही नइया पार…।
।।बहा जा रहा समय नदी सा लेकिन कोई घाट नहीं।।
।। लम्बा सफर है लेकिन आगे कोई बाट नहीं।।
सास के गह भरे गोठ ल सुन के अघनिया हर कठवा पखना कस होगे। घेरी-बेरी थूँक ल घुटकै। फफक भरिस बिचारी अभागीन हर…। अंचरा के एक छोर म आँसू ल पोंछिस।
कब बिपत आही, कती ले आही अऊ कहाँ जाही… गम नइ मिलै। बिपत के मुड़ी नइ रहै। उकर धरे छोरे के नइए तभो ले धर देथे। किरपाल के जवान-जवान दु झन बेटा…रीटू अऊ माखन…. रीटू बड़े ए हट्टा-कट्टा देंह… एक लम्बर के कमिया घर ले खेत अऊ खार ले डेहरी तक के बुता ओकरे रहै। छोटे भाई माखन ओकर ले कम नइ रहै। भाई के संग-संग बुता करके घर ल उबार डारे हें। किरपाल के परिया म एक ठन माटी के कुरिया काँस के लोटा अऊ दु ठन थारी, रांधे पकाए के दु-चा ठन बरतन, तहाँ बस… फेर आज बेटा मन के परिया म कछु के खंगता नइए। लेन्टर के घर, अलमल कोला बारी, सुघर-सुघर बहू, तीन-तीन ठन नाती, हराभरा घर परवार… कहत बेर लगे करत बेर नइ लगै….।

।।धन दोगानी बल सुमता आगर।।
।।तेकर खेत भरभर गड़थे नागर।।

घर के सियानी ल दाई करै, का होइस दुनों पत्तो मन पोट्ट पढ़े-लिखे हें ता… पर सास ल बिगर पूछे कोनो बुता ल नइ करैं। साग भाजी लेवैं ता सास हर निमारै…. कपड़ा लत्ता, गहना गुंथा लेवै ता सास ल दु आखर पूछ लेंअ। रीटू ल घर के लेनदेन ले कोनो चिभिक नइ रहै। ओ तो काम बुता म बिधुन रहै। खार ले कमा के आवै तहाँ बाई हर लोटा म पानी धरा देय… मुंह कान धौवै फेर परोसा म बइठ जाये। दुनों लइका बड़ चोनहा ए ददा संग खाये ल दंत जाएं… बिछ-बिछ के खाएं….।
हट्टा-कट्टा दोहरी के देंह रीटू रहिस पर ओला एक ठन बेमारी संचरे रहिस। दु-दी, तीन-तीन महिना म गिर के अचेत हो जाए, मुंह ले गजरा फेंकै। आनी-बानी के ओखद करतीन तहाँ चेत हर आवै। कतको डाग्डर बइद कर डारे हें। मिरगी ए… कथें। बेचारा रीटू शरीर ले हट्टा कट्टा हे पर तरी ले घूना खावत हे कथें ना:-

।। पहर रे परबत दिखे ल हरियर ।।
।।भीतर चुरत हे करेजा बाहिर हरियर।।

डॉग्डर बइद मन मना कर देहें हे के एला आगी-पानी ले बचा के रखिया। आगी अऊ पानी हर ए बेमारी बर काल ए। का जानी… आगी पानी तीर म जाए ले ए बेमारी हर उदगर हो जाथे कथें… बइहा कुकुर चाबे रथे तेहू हर गरजना अऊ पानी ल नइ लेवै… ओहर तो पानी ल देख के कुकुर कस भों-भों भूंके लागथे टार… किरपाल के बड़े बेटा रीटू ल आगी-पानी ल बचाए के धियान रहै।
बियासी के दिन… खेत म बियासी के नागर फंदाए रहै। रीटू हर बढ़िया मजा ले बुता काम ल करत हे। ए पंइत दवा पानी के असर ए काय, घात दिन होगे बेमारी हर उठे नइ ए। रीटू ल थोकिन हाय जी लगिस तिही पाय के जिहां नहीं तिहां काम बुता म चल देय। किरपाल ल थोरकन खरजरहा बुखार रहै तेकरे खातीर घर म सुरतावत रहै। भाई माखन संग रीटू हर बियासी के नागर ल टनोरा खार म फाँदे हे । ढरकत बेरा ले नागर चलिस। नागर ढिले के बेरा होगे। नागर ल ढिलीन। झिमिर-झिमिर पानी बरसत रहै सुरसुरी बइहर घला चलत रहै। माखन हर नागर ल ढिलके ओ टिपासी खर कती चल दिस। बिहान दिन उहें ल बियासी करना हे थोकिन पानी छेंक दिहौं अइसे गुन के चल दिस अऊ अड़े भाई ल कहिस:-थोकिन भंइसा मन ल छिंच देबे ग! बड़ चिखलाए हे अऊ अंधेरी घला चाबत हे। रीटू हर हौ कहिस अऊ लाली के साफी ल मुंड़ म बांध के भइसा मन ल खेदत तरिया कती लहकत आवत हे…..।
टिपासी खार के सुलइया तलाव म भइसा मन ल बोरिस। टिपिक-टापक बून्दी गिरत रहै। भुखास के बेरा, भइसा ल जल्दी धोइहौं गुन के रकस-रकस धोना म धोए लगिस। सूनसान खार के सून्ना तरिया म कोन जनी कतका बेरा ले धोवत रहिस…।
माखन हर ओ खार कती ले घर ओथरगे। दु ठन भइसा मन आ-गे रहै। दु ठन हर नइ आये रहै। पूछिस- ददा! दु ठिन अऊ भइसा तो ग…? दुनों भइसा अभीच्चे आइस हे बेटा, बड़े दाउ आए नइ ए… भइसा के पाछु-पाछु आवत होही। पंडवा भइसा ए बकुलावत आ गिन- कोढ़ा पसिया के लोरस म…। जाना ता ग देखिआ, कती पिछवाए हे ता…। माखन हर हौ कहिस अऊ डबरी कती सोरिहाए ल गीस। दुनों भइसा तो पागुर मारत चिखला म थबक थइया आवत रहिन पर भइया, पाछु म नइए। हो न हो कोई अनहोनी होगे हे तभे ए दुनों भइसा हर पछुवाए हे। घठोन्धा जा के देखथे ता कोनो मरे रवईया नइए। सून्ना… अगल-बगल ल तकाइस-गइस ता गइस कहाँ…? कहुँ बाहिर टिकुर तो नइ गये हे ? तभो कोई पता नइ चलिस। अतका म तो माखन हर घबरा गे फेर धउंड़त टिपासी खेत कती गइस। हुँतकराते जावत हे। कोनो कती गम नइ चलिस। हँफरत चोकरत घर फिरथे। पसीने- पसीना… भूखहा के बेरा… पेट म एको दाना नइ गये हे। कथे आइस ग ददा ? नहीं तो रे… अरे जावा रे खारे म बेमारी तो उमड़ नी गे। घर पारा परोस के मन सब घबरा गइन। चला तो बने ढ़ंग ले खोजौ…. फेर पारा मुहल्ला के जम्मो मनखे खार कती बगर गइन। गमे नइ चलिस तहाँ फेर भइया घाट टमरिन। जाली मरवाइन। जाली म रीटू के गोड़ फंसगे अऊ लहस हर तिरावत आ-गे। का पूंछबे- करलाई ल ? रोना-बासा परगे। बमफार के माखन रोइस। दाई-ददा मन छाती पीट-पीट के रोवत हें। कहाँ मेर ल कहौं ? किरपाल के मुड़ म बिपत पहर के चाप हर गिरगे। सम्भलै त सम्भलै कइसे? कटे जरी के बड़खा रूख कस अर्राके गिरगे। अघनिया के करेजा कुचरा गे, बेचारी तो बिहोस होगे, बिपत के पूरा , सुख सपना के बारी ल चिभोर दिस।

।। मन कापड़ के दानी, बिपत के बानी।।
।। घाम म घाम अऊ चुहे बरसाइत के पानी।।
।। सीढ़ चढ़े भीथी ता जियत म लहस हे जिंदगानी।।

कतेक ल कहौं… दुनियाँ के बिपत हर किरपाल के घर ठुलागे। थाना पुलुस होइस। पंचनामा- संचनामा के संग लहस मिलीस। दगीत होइस। आँखी के आँसू निचोवत राग पानी उठिस। जे सुनीस तेन चार बून्द आँसू ढारिस……….।
रीटू के गये ले घर बिरान होगे। परेंवा के घुटुर-घुटुर हर करिया-करिया मरकी म दब गे। पिंजरा के सुआ बोली चोंच म अरहज्ज गे। भीथी म निहारत लाल-लाल बिजली बलप म जीव नइए तइसे होगे। भिथिया म सलगत घिरिया के रेंगना मंधियागे। गाय-गोरू के टोंटा के घंटी के कणवन थिरक गे। छानी म पइधे कौंआ के उचक-उचक के सीथा टोनकई थिरक गे। ओ तो आथे पर अपन दुनों करिया-करिया डेना ल झर्राके कउहा के लंहसे डारी म जा के बइठ जाथे। तिर-तखार म मटमटावत तितली बिन गिंजरे फिर जाथे। भूरी बिलाई बिगर बिजराए कोठा के भीथी म चढ़ जाथे। कोठा के भइसा पूंठी ल अंटिया- अंटिया के रह जावत हे….।
अघनिया के जिंदगी के रंग बसंत म गिरे सेमर के फूल होगे। मन के सपना तो चिथराए पुराइन के पान ए जेन श्वासा के ऊपरी जल म तउरत हे। नान-नान दु-ठो लइका आँखी के काजर, आँसू म धोवागे। दाई के जांघ ल पोटारे कहै अम्मा! पापा कब आही…? सुन के काकर छाती हर नइ चरक ही। दही म कचारे पखरा कस मन हो गे…। अघनिया के बेनी के जिंदगी सुखागे… ओ अँवरा अऊ आँतर के चिकचिकी पनिया गे…। ठाढ़ रात ले रोवै… जिंदगी के ओ मुड़ा कतेक न कतेक धूर हे, कइसे अमरही ? डेना कटे चिराई. ठड़गा रुख के थाँव म बइठे हे….सुख के लम्बा-लम्बा नीलगिरी थँाव ल कइसे अमरही….? पाँव के कोरे-कोरे लाल महाउर… सदा दिन बर परतेज दिस। गाल के कजरी अऊ पउडर तो मुगल- मराठा कस बैरी होगे हें।
साँझ के बेरा, कचरा हर पीढ़ा म बइठे लाल भाजी ल निमारत रहिस। अपन धनी ल कथे:- कस ओ…? एक ठन गोठ गोठियावँव! गोठिया ना, का बात ए तेन, काबर लजावत हस? लजावत नइ ओं, का टोरेच्च फुल के माला गुंथथें? गिरे रथे तेला नइ गुथैं का…? नहीं… ताजा रथे ता गुंथ लेथें। फूल. फूल होथे, चाहे मुरझाए रहै…. आखिर खुशबू तो निकलबे करथे, हाँ भई सफ्फा अउंस जाए रही तेकर बात आने हे….। अइसे कतको कन फूल रइथे जेन झटकन नइ मुरझाए हाँ ता…. कोनो कबी के बेटी औ तइसे गोठिया देहे। भेद ल बता ना…। कचरा कथे- हाँ, अभी लजावत हौं। अरे दुनों परानी म का के लाज! दिल हिन्छा करके गोठिया…। ता सुनिहा…? हाँ भई, ले तोर मुंह तीर कान ल करत हौं…। नहीं-नहीं अइसे चपका झन …। जेठानी अघनिया रोंट थांही के गिरे फूल ए… एला मया के दउरी म धर लिहौ ता का होही…? अरे लकही, बड़खा कबी के बेटी अस गोठियाथस, फोर के कह ना… अड़हा के बेटा औं… तोर भीतरहा अऊ भेदहा गोठ ल नइ समझ सकौं।
रात सिरनाथे, चिराई चूरगून अपन जाँवर जोड़ी संग एके थांही म बसेरा डारथे। बिहना होथे तहाँ फेर जिंदगी बर दुनों डेना ल फरियाथें। हमन मनुख अन… दीया बरथे अंधियार म… लहरा उठथे धार मं। दीदी अघनिया के दीया बुतागे, करिया ढिबरी मइलाए माढ़े हे। जिंदगी के गाड़ी दु:ख के धरसा म छरिहाए परे हे चाहौ तो सकल लेव…। रात भर फरिका उघरे रथे धीमिक-धीमिक दीया बरथे। लइका मन के किलील- कालल महतारी के सिरनियाए मन म समा गे हे। मन आतीस ता बेचारी के भार ल बोह लेतौ…। हमर सगा म भौजाई चूरी के चलागत हे। बुझाए दीया म फेर रोशनी आ जातीस।
परानी के गुड़ढ़िढा कस गुरतुर बानी ल सुन के छिन भर बर माखन धनी के मन हर इचबन बीच बन पइक नार तीन ठन, सुक्खा ठिड़का ठाय करै बुड्ढा भालू हाय करै, कराएन चट्टान सुखाय ठुड़गा रूख जइसे निरदई बन म छिन भर बर गंवागे। भवनाए दहरा म ओकर मती मण्डराए लगीस। गिंजरत भौंरा के पेंदी ल थाह नइ पाये तइसे माखन के आँखी के सुरता अंतस म चाकामिरी गिंजरे लगीस। आधा अंग के नारी… कतका धूर ल गुन सोच के गोठियाइस हे। फेर भरखे लकरी पानी म उपलाए कस मन ओकर उपर आइस। कण्ठ कंजुसाई के सुभाव ले भाखा के नान्हें दउरी म मढ़ाइस। कचरा! बहुत धूरिहा ल गुन के गोठियाए। ए संसार म तोर सही तिरिया अऊ नइ होही तइसे लागथे। जेठानी के पीरा, जिंदगानी के पहार ल मन के तराजू म तउल के ए गुरतुर गोठ ल कहे। दाई-ददा अभी जियत हे, चार आखर पूंछे ल परही। धनी के बानी सुन कचरा के आँखी म मया के मेहन्दी फूल फुलगे। सुख के केरा पान ल ओकर हिन्छा के बइहर हर डोलाए लगीस। मन के सुन्दर-सुन्दर भाव के भौंरा तिरियाए लगीस। गुदगुदी के लाली- पिंउरी तितली फुनफुनाए लगीस…. अऊ एक दिन देरानी हर जेठानी के पीरा के परबत ल अपन छाती म लदक लीस। अघनिया के बुची बाती म फेर सोनहा दीया बरे लगीस….।

।। कथा के खोली म सोनहा दीया बरही।।
।।मंगत के पोथी म, मया के गोठ भरही।।

मंगत रविन्‍द्र

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