मया करे ले होही भाषा के विकास : अनुपम सिंह के जयप्रकाश मानस संग गोठ बात

‘सृजनगाथा’ के संपाद· जयप्रकाश मानस ओडिय़ा होय के बाद भी छत्‍तीसगढ़ी बर समर्पित हवय। साहित्य के सबो विद्या के जानकार होय के संग सामाजिक सरोकार के लेखनी बर अपन पहिचान रखथे। उनखर लिखे ‘दोपहर में गांव’ पुरस्‍कृत रचना हवयं। श्री मानस ह तभी होती है सुबह, होना ही चाहिए आंगन, छत्‍तीसगढ़ी व्यंग्य कलादास के कलाकारी, छत्‍तीसगढ़ी: दो करोड़ लोगों की भासा सहित दू कोरी ले जादा किताब लिखे अउ संपादन करे हवय। माध्यमिक शिक्षा मंडल म अधिकारी मानसजी तिर अनुपम सिंह के गोठ:


अनुपम : मनखे समाज के बीच में छत्‍तीसगढिय़ा बोले म लजाथे। का ऐखर ले भासा के बिकास म असर पड़त हवंय?
मानस : जेन ह ठेठ छत्‍तीसगढिय़ा नो हे तेन हर सार्वजनि· जगा मा छत्‍तीसगढ़ी बोले मा लजाथे। अपमान समझथे फेर ये बात अलग हे के नवा पीढ़ी के अऊ शहरी मानसिकता मा पढ़े-लिखे लइका मन जघा मा छत्‍तीसगढ़ी बोले मा अपमान समझथ हावय। ये हर उन्खर हीनता आय। जेन हर ठेठ छत्‍तीसगढिय़ा हावय अऊ छत्‍तीसगढ़ी बोले मा लजाथे ओला छत्‍तीसगढ़ी भासा के विकास के कोनो संसो नइ हे। जब मातृभासा ला खुद ओकर बोलय्या मया नइ करे तो ओखर ले भासा के विकास में बाधा होथे।

अनुपम : छत्‍तीसगढ़ी राजभासा आयोग के स्थापना जउन बिचार ले करे गे रहिस, ओहर कहां तक ले पूरा होय हवय?

मानस :  छत्‍तीसगढ़ी राजभासा आयोग ह अपन उद्देस्य बर कतका कछु करथ हे, येला छत्‍तीसगढ़ी राज भासा आयोग के मालिक मन ला बताना चाही। मोर नजर मा अइसे कोनो बड़का काम नइ दिखे हे जेला लेके मे टिका-टिप्‍पणी करंव। साहित्यकार अउ कलाकार मन अपन काम ल मन लगा के करत हवंय, ऐखर परिणाम ऐ दिखत हे के आज छत्‍तीसगढ़ी भासा के पहिचान बन गे हवय।

अनुपम  : सिक्षा के क्षेत्र म छत्‍तीसगढ़ी ल आगू नई बढ़ाय जा सके हवय। एखर जिम्‍मेदार आप कउन मन ल मानथव?

मानस : मयं ये बात म राजी नइ हवंव के सरकारी सिक्षा व्यवस्था में छत्‍तीसगढ़ी आघू नइ बढ़त हे। छत्‍तीसगढ़ी ला प्रायमरी कक्षा में पढ़ाय के काम सुरू हो गइस हे। आज भी सहरी क्षेत्र ला छोड़ दी तो गाँव मन के स्‍कूल मा पढ़ाय अऊ समझाये मा मास्टर मन छत्‍तीसगढ़ी मं बोलथे। मैं खुद ऐला सात साल से अजमाय हावंव। मैं सहमत हावंव प्रशासन मे बैठय्या बड़े अफसर मन के छत्‍तीसगढ़ी भासा ला बढ़ाय के खातिर कोनो विसेस उदिम देखेबर नइ मिले हे।

अनुपम :  सहर म रंगमंच ल छत्‍तीसगढ़ी ल प्रोत्साहन नई मिलत हे?

मानस :  भई, शहर के रंगमंच म छत्‍तीसगढ़ी के कोनो जगह नइ हे। ऐकर कइठन कारण हे। एक तो छत्‍तीसगढ़ी के नाट्य परंपरा ह अपन नास्टजेलिया ला पार नइ करे सकथ हे। दु चार झन नाट्य निर्देसक मन ला जोड़ दीं तो जेतकी छत्‍तीसगढिय़ा नाट्य निर्देशक मन हावय ओमन ला हिंदी के बड़े नाटक लेखक मनके नाटक मंचित करय ले फुर्सत नई हे। फेर ये बात ला जरूर ध्यान मा रखेला पड़ही छत्‍तीसगढ़ी भासा म का बढिय़ा नाटक लिखे जाथ हे।

अनुपम :  साहित्य अउ कला के क्षेत्र में इंटरनेट माध्यम बर आम आदमी के रुचि कइसे बाढ़ही।

मानस :  इंटरनेट  पत्रिका के पाठक मन के रूझान साहित्य अऊ कला बर रुचि देखे जा सकत हे। मैं दावा के साथ कह सकत हवं कि पाछु दु साल म कला अऊ साहित्य म काम करइय्या कवि, कलाकार, लेखक, संपादक, पाठक मन खुद अपन ब्‍लॉग खोलिन हे अउ रोज लिखत हवंय। छत्‍तीसगढ़ व छत्तीसढ़ी म खचित अऊ काम करे के गुंजाइस हवय।

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