मरहा राम के संघर्ष

असाड़ लगे बर दू दिन बचे रहय। संझा बेरा पानी दमोर दिस। उसर-पुसर के दु-तीन उरेठा ले दमोरिस। गांव तीर के नरवा म उलेंडा पूरा आ गे। परिया-झरिया मन सब भर गें। मेचका मन टोरटोराय लगिन। एती दिया-बत्ती जलिस कि बत्तर कीरा उfमंहा गें। किसान मन के घला नंहना-जोताार निकल गे।
बिहने फजर घरो-घर नांगर-पाटी अउ जुंड़ा निकल गे। बसला-fबंधना अउ आरी निकल गे। छोलइ-सुधरइ सुरू होगे। माल- मत्ता के हिसाब से खर-सेवर के जांच परख सुरू हो गे। फेर का ?खांध म नांगर अउ हाथ म तुतारी धरे, बइला मन ल हंकालत नंगरिहा मन चलिन अपन-अपन खेत कोती। पीछू-पीछू नंगरिहिन चलिन मुंड़ म बिजहा धान बोहि के। आज पहिली दिन हरे। काली ले तो नंगरिहा मन पंगपंगाय के पहिलिच खेत म पहुंच जाहीं। नंगरिहिन मन निकलहीं अठबज्जी, तावा सरीख अंगाकर रोटी अउ बगुनिया-बटलोही मन म बासी धर-धर के।
सड़क तीर-तीर के खेत मन ल तो पइसा वाले बड़े-बड़े सेठ मन बिसा डारे हें। कतको म कारखाना बन गे हे, कतको म काम चलत हे। सब म तार के घेरा पड़ गे हे। कतरो म पक्का दिवाल के घेरा पड़ गे हे। खेत-खार जाय बर जउन मेंड़ मन म किसान मन पुरखा पहरो ले रेंगत आवत रिहिन वो सब बंद हो गे हें। जउन खेत म नंगरिहा मन ल जाय बर आधा घंटा लगय विही खेत मन म पहुंचे बर अब जुआर भर के समय लगथे। घुमत-घुमत परान निकल जाथे। काली के दिन वहू रद्दा मन ह बंद हो जाने वाला हे। फेर तो मरन हे।
मरहा राम के खेत घला सड़क किनारे हे। वो तीर के सब्बो खेत ल जोगेंदर सेठ ह बिसा डारे हे। बड़े जबर कारखाना बने के सुरू हो गे हे। जोगेंदर सेठ के दलाल मन मरहा राम ल कतको लालच, कतको धमकी दिन फेर मरहा राम ह अपन खेत ल नइ बेंचिस। अब तो जोगेंदर सेठ ह मरहा राम के खेत ल जबरन कब्जा करे बर गुंडइ म उतर गे हे। वोकरो खेत ल तार के घेरा म घेर डरे हे।
एती मरहा राम हलाकान हो गे हे। पहिली सेठ अउ वोकर मुख्तियार मन तीर जा-जा के गोहराइस। ग्राम पंचायत म सोरियाइस। अब तो का पुलिस कहिबे का कलेक्टर अउ तहसीलदार, दरखास्त देवत-देवत मरहा राम थक गे हे। गांव वाले भाई मन घला पीछू घूंच दिन। सब ल अपन जान प्यारा होथे। पर खातिर कोन अपन जान दिही। अब वो काकर सरन म जाय? फेर वा रे मरहा राम ! हिम्मत नइ हारिस। खेत ले ही किसान हे अउ किसान के पहिचान हे। खेत हे त मरहा राम हे। खेत हे त गांव हे। खेत हे तभे जीवन हे। जीवन ल कोई कइसे त्याग देही? का कोई जीये बर छोड़ देही। जीये के अधिकार सब ल हे। जीये बर लड़े पड़ही त वो लड़ही घला। मरना होही ते लड़त-लड़त मरही। बसुंदरा हो के, भूख मर के काबर मरही?
जउन खेत म जोगेंदर सेठ के कारखाना खड़ा होवत रहय विही डहर ले तइहा बखत ले खेत-खार जाय के रद्दा रहय। रद्दा बंद होय ले खाली मरहच राम ल तकलीफ नइ होवत रहय, गांव भर के आदमी पेरावत रहंय, फेर लड़ाई लड़त रहय अकेला मरहा राम ह, बांकी सब तमासा देखइया रहंय।
सब किसान मन फर्लांग भर दुरिहा ले चक्कर लगा-लगा के जावत रहंय। मरहा राम ह कहिथे – ‘‘संगवारी हो, हमला सेठ के कारखाना से का लेना-देना। खेत जाय बर हमला कारखाना म जाय के का जरूरत? एक ठन मेड़ भर चाहिये, जउन ह हमर सबर दिन के रद्दा आवय। खेत जाय बर खेतेच म रेंगे ल पडथे। उड़ के कोनों नइ जा सके। चलव मोर संग। आगू म मंय रहिहंव। तुम मोला संग भर देवव। इंखर चाल ल समझव। ये मन हमला सताना चाहत हें, ताकि खार भीतर के खेत ल घला हमन बेंचे बर मजबूर हो जावन। औने-पौने भाव म खरीदे बर ये मन लुहूटुपुर तो करतेच हें। कंउआ के मुंहू ले रोटी छूटे भर के देरी हे। ‘‘
कोनों संगवारी मन कान नइ दिन।
मरहा राम कब हिम्मत हारने वाला रिहिस ? नांगर बइला धर के टेंक गे वो मेंड़ तीर जउन ह सबर दिन के खेत जाय के रद्दा आय, अउ जउन ल सेठ ह रूंधवा दे रहय। सेठ के परदेसिया गुंडा मन मरहा राम के नीयत ल भंप गें। बड़े जबर झबरा कुकुर ल मरहा राम बर छुआ दिन। मरहा राम घला तियारी म रहय। अच्छा झपेटा तुतारी लउठी धरे रहय। मुंड़ी ऊपर ले घुमा के कचार दिस कुकुर ऊपर। बजर गिर गे। कुकुर विही करा चित्त हो गे। अब गुंडा मन चाकू-छुरी घर के दंउडिऩ। मरहा राम जोम दे के खड़े हो गे। किहिस – ‘‘घर म लिंगोटी छोंड़ के अवइया कुकुर हो, आवव, कोन अपन मां के दूध पीये हव। जादा से जादा मोर परानेच ल लेहू न? तब का तू मन जीयत बांच जाहू का?’’
एक झन गुंडा ह चाकू घर के दंउड़िस। मरहा राम के बजर वोकरो मुंड म गिर गे। विही करा गांव के दू-चार झन किसान मन नांगर फांदे रहय। मरहा राम ल अकेला लड़त देख के अब उंखरो मन के जग उमिंहा गे। वहू मन दंउड़िन। महाभारत मात गे।
बात कहत पुलिस आ गे। मरहा राम रकत म बूड़ गे। गुंडा मन के घला इही हाल रहय। गुंडा मन के घाव ह पुलिस ल दिख गे, मरहा राम के रकत ह वो मन ल नइ दिखिस। मरहा राम ल बांध के ले गें।
महीना दिन के बाद मरहा राम आज जेल ले छूट के आइस।
किसन, रघ्घू अउ जगत वोला लाने बर गे रिहिन। जेल के मुंहाटी म ये मन वोकर अगोरा म दस बजे ले खड़े रिहिन। निकलते साट पोटार लिन। मरहा राम ह ये मन ल देख के पहिली तो अकबका गे। गांव के कोनों मनखे वोला लेगे बर आय होहीं, अइसन वो ह सोंचे नइ रिहिस। वोकर आंखी ले खुसी के आंसू झरे लगिस। कहिथे -’’ मोर असन पापी ल लेगे बर आय हव बेटा हो ?’’
रघ्घू – ‘‘तोला पापी मानबो त दुनिया म हमला कोन पुण्यात्मा मिलही कका। भला हो भोलापुर के जिंहा तोर असन मनखे जनम धरे हे।’’
– ‘‘का हाल चाल हे?’’
– ‘‘सब बने बने हे कका।’’
आधा घंटा के रस्ता। पहुंचना भी जल्दी रहय। रस्ता भर जादा बातचीत नइ होइस। चरबज्जी गांव म पहुंच गिन। दुरिहच ले डमउ-दफड़ा के अवाज सुन के मरहा राम ह पूछथे – ‘‘का के बाजा बजत हे बेटा?’’
– ‘‘ककरो बरात परघाय बर होही।’’
जइसने ये मन गांव के खरकाडाड़ तीर पहुंचिन, मरहा कका ह देखथे कि गांव भर उंहा जुरियाय हे। बजनिया मन बाजा घटकात हें। वोकर दाई ह आरती धर के अउ वोकर बाई ह हार-फूल धर के आगुच म खड़े हें।
मरहा कका ह दाई के पांव के धुर्रा ल अपन माथा म चुपरिस। गांव के माटी म मुड़ी नवाइस। सरपंच, संपत अउ मुसवा आगुच म खड़े रहंय। नता देख-देख के जोहार भेंट होइन।
लखन, ओमप्रकाश , फकीर अउ वोकर जम्मों संगवारी मन घला हार फूल धर के खड़े रहंय। लखन ह जोरदार नारा बोलिस – ‘‘मरहा कका ….।’’
भीड़ म गूंज गे – ‘‘जिंदाबाद , जिंदाबाद ।’’
मरहा राम हार-फूल म लदका गे। गुलाल म पोता गे।
बड़ हंसी खुसी, नाचा बाजा संग मरहा राम के परघवनी सुरू हो गे।
रात म मरहा कका के घर म फेर सबके सब जुरिया गें। मरहा कका ह कहिथे – ‘‘सुनाव भइया हो, गांव के का हाल चाल हे?’’
ओम प्रकाष ह कहिथे – ‘‘तिंही बता कका, तोर जेल के हाल चाल ल। का खावस, कइसे रहस, का करस? इहां सब अच्छा हे अउ जउन होही, अब अच्छच होही।’’
– ‘‘का करहू बेटा जान के? फेर हां! बाहना म मुंड़ी डार के मूसर ले का डरना? अब तो आना-जाना लगेच रहिही। चाहे कइसनो राखंय, कइसनो खवावंय।’’
– ‘‘ससुराली माल गजब भाय हे कका ल। तभे तो घुसघुस ले मोटा के निकले हे।’’ फकीर ह ठट्ठा मड़ाइस।
– ‘‘अब हमर बर तो सब जघा बराबर हे बेटा। गांवेच म रहि के कतिक सुरक्षित अउ कतिक सुतंत्र हन? उंखर गुंडा मन जब हमर गांव अउ घर म आ के हमर इज्जत अउ हमर मान सम्मान ल रंउद सकत हे तब जेल के का हाल तोला बतावंव। उहां तो उंखरे राज हे। फेर पांव अब आगू बढ़ गे हे, पीछू हट नइ सकय। हमरो प्रन हे।’’
– ‘‘ऊंखर तीर धन हे, बल हे, बम अउ बंदूक हे। हमर तीर तो लउठी घला नइ हे। कका, कइसे लड़बोन उंखर से?’’ किसन ह कहिथे।
– ‘‘मन के हारे हार, मन के जीते जीत। असली ताकत तो मन के होथे। मन म ताकत आथे तहां ले तन म खुदे ताकत आ जाथे बेटा। असली लडाई बम अउ बंदूक से नहीं, मन से लड़े जाथे। गांधी जी तीर का रिहिस हे?’’
ओम प्रकाष ह कहिथे – ‘‘आज कोनों दफ्तर म जा के देख ले, बड़े-बड़े कुरसी म विहिच मन ल बइठे पाबे। अउ यहू जान ले कका, ककरो सेवा करे बर वो मन इहां नइ आय हें। अपन पेट भरे बर आय हें। सरकारी खजाना ल तो खाली करतेच हें, लुचपत खा-खा के जनता ल अलग लूटत हें। राजा विही मन, नेता विही मन, अफसर विहिच मन। हमर कोन सुनही? तोर कोन सुनिस भला। मार खाय तिंही , जेल गेस तिंही ।’’
– ‘‘दुनिया ह सुनहीं। दुनिया ह नइ सुनही ते भगवान हर तो सुनही? भगवानो ह नइ सुनही, त तोर आत्मा ह सुनही कि नही? मरे के बेरा कम से कम आत्मा ह तो नइ धिक्कारही।……. जीबो ते इज्जत, अउ मान-सम्मान के साथ जीबो। कायर बन के जिये ले मर जाना अच्छा हे। बलिदान ह अकारथ नइ जाय। षहीद बीर नारायन सिंह ल भुला गेव का?’’
अइसने गोठ बात म रात के बारा बज गे।
बिहान दिन ग्राम पंचायत म गाव भर के आदमी फेर सकला गें।। सरपंच ह कहिथे – ‘‘तोर जाय के बाद तो बड़ अलकरहा हो गे मरहा भइया। ये परदेसिया मन तो हमर जीना हराम कर देय हें। सड़क तीर-तीर के सबो खेत अब उंखरे कब्जा म चल देय हे। मेड़ म चढ़न नइ देवंय। चमचम ले रूंध-बांध डरे हें। हमर खेत मन भीतर-भीतर म हें। खेती-किसानी कइसे करबोन, नांगर बक्खर ल कते डहर ले लेगबोन। हवा म उड़ के तो नइ जा सकन।’’
– ‘‘कका ! करखाना के तीर-तीर वाले जतका खेत हें, सब म रेती गिट्टी बगरा देय हें। चंतराय बर जाबे त धमकी चमकी लगाथें। छुरी-बिछवा निकालथें। जीना हराम हो गे हे। हमरे गांव म हमी मन परदेसी बन गे हबन।’’ जगत किहिस।
फकीर – ‘‘झाड़ू गंउटिया तीर गे रेहेन। आहूं किहिस। आज ले दरसन नइ हे।’’
मरहा राम ह कहिथे – ‘‘बड़े के सगा बड़े। छोटे मन बर दुनिया म कोइ नइ हे। भगवान घला वोकरे मदद करथे, जउन अपन मदद खुद करथे। संगी हो, आज के जुग म एकता म ही ताकत हे। हमर म एकता होही तभे हम इंखर से लड़ सकबोन। आवव ! सब एकजुट हो जावन। कसम खावन कि मर भले जाबो फेर संग ल नइ छोड़न। पहिली मंय कसम खावत हंव……..ये लड़ाई म यदि मरे के नौबत आही त सबले पहिली मरहा राम ह मरही।’’
सब एक दूसर के मुंहूु देखे लगिन। नंदगहिन ह घला अपन महिला सहायता के बहिनी मन संग बइठे रहय। सुकारो दाई अउ डोकरी दाई घला बइठे रहंय। सब के सब रटपटा के उठिन। किहिन -’’कोन रोगहा ह मरहा बेटा के परान लिही, हमू देखबोन।’’
फेर तो चारों खूंट मुठच मुठा दिखे लगिस।
मरहा राम ह जय बोलाइस – ‘‘महादेव की…… जय। बीर नारायन सिंह की …जय।’’
भीड़ ले अगास-फोड़ अवाज आइस – ‘‘जय ….।’’ जयकारा ह दसों दिसा म गूंज गे।
वोतका बेर रघ्घू ह प्रोफेसर वर्मा ल धर के आ गे। प्रोफेसर वर्मा ह कालेज म अध्यापक हे। छत्तीसगढ़ के नामी साहित्यकार आवंय। किसन, जगत, ओम प्रकाष, रघ्घू , जम्मों झन ल कालेज म पढ़ाय हे। ये मन ल आवत देख के भीड़ म चुप्पी छा गे। रघ्घू ह आगू आ के किहिस – ‘‘चुप काबर हो गेव भाई हो ! एक घांव फिर से बोलो – ‘‘बीर नारायन सिंह की …जय।’’
रघ्घू ह बोले के सुरू करिस – ‘‘जम्मों दाई-ददा अउ भाई मन। मोर संग आज हमर गुरूदेव, प्रोफेसर वर्मा आय हें। जोरदार ताली बजा के उंखर स्वागत करव।’’
चारों खूंट ताली गूंज गे। रघ्घू ह बात ल आगू बढ़ाइस – ‘‘अब मंय गुरूदेव से निवेदन करत हंव कि ये मुसीबत ले लड़े बर हमला रस्ता बतावंय।’’
प्रोफेसर वर्मा – ‘‘सबले पहिली मंय भोलापुर गांव के धरती ल माथ नंवा के वंदन करत हंव, जिहां नंदगहिन काकी, सुकारो दाई, डोकरी दाई अउ मरहा भइया जइसन मनखे जनम धरे हें। जिहां आप जइसन जागरुक आदमी रहिथें। संगवारी हो! इहां के हालचाल मंय गजट म पढ़त रहिथ्ंाव। बांकी सब मोला रघ्घू बता डरे हे। मंय तो सोझ अउ संच बात कहवइया मनखे आवंव। आप मन ला बुरा लगही। फेर सच बात तो इही आय कि आज हमर जउन हालत हे वोकर असली जिम्मेदार हम खुद हन। सरकार ल या कोनों दूसर ल दोस देना बेकार हे। …….न हम बोल सकन, न चिल्ला सकन। कोन चपके हे हमर मुंहूं ल? न हम हड़बड़ा सकन, न छटपटा सकन। कोन बांध के रखे हे हमला? ….. हमर डर। ….. वाह! चोर उचक्का मन बेधड़क घूमत हें, हमला डर धरे हे। हमर मन म का के डर समाय हे?……घर-द्वार मत बिक जाय? जीव मत चल देय? अरे! जब मान-सम्मान अउ इज्जते नइ बाचही तब जी के का करहू?…..डर-डर के कब तक अपन खेत-खार अउ इज्ज्त ल बचाय सकहू। बचा सकतेव त आज ये नौबत नइ आतिस। …..तब का इमान-धरम के डर हे? जान हे त जहान हे। जिन्दगिच नइ रहिही त कहां के इमान अउ कहां के धरम। जउन जीतथे, वोकरे जयकार होथे। जीत के कोई विकल्प नइ हे भाई हो। ………अपन अंदर के ऐब ल देखव। पान, बिड़ी, तमाखू के बिना रहि नइ सकन। गांजा-दारू के तो पूछ झन। इही पइसा ल बचा के देखव। दस साल म तुंहरो बिंल्डिंग खड़े हो जाही। …….जइसन खाय अन्न, तइसन होय मन। एक रुपिया अउ दू रुपिया के अन्न खा-खा के हमर मन घला दू कौड़ी के हो गे हे। बंद करो येला। एक रुपिया म मंागना हे त खाद मांगव, बीज मांगव। अपन खेत बर पानी मांगव। ….. संगवारी हो ! ये समस्या केवल भोलापुर के नोहे। सब गांव के हे। पर तुम भागमानी हो कि तुंहर साथ मरहा राम जइसे हिम्मती आदमी हे। जय हिंद, जय छत्तीसगढ़।’’

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अनंतिम
कुबेर
(कहानी संग्रह भोलापुर के कहानी से)

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