महतारी के मया

मातृत्व दिवस के बात आइस त मोला बचपन म देखे एकठन नाचा के गम्मत हर सुरता आगे। ओ गम्मत के भाव रहिस कि माँ हर बेटा ल अड़बड़ माया करय। माँ के लालन-पालन, मया-दुलार म बेटा हर सज्ञान होगे। सज्ञान बेटा ल एक झन लड़की ले पियार होगे त ओ बेटा हर ओ लड़की ले बिहाव करना चाहिस। लड़की कहिस- मँय तोर संग तभे बिहाव करहूँ जब तँय तोर महतारी के करेजा ल लाके मोला देबे। पियार म पागल लड़का अपन माँ ल मारके जब ओकर करेजा ल लेगत रहिस त ओहर हपट के गिर गिस। तब माँ के करेजा ले अवाज आइस-”बेटा तोला कहीं लागिस तो नहीं।” ये आवाज ल सुन के लड़का चँउक गे। ओला अपन गलती के अहसास होगे। फेर का मतलब-”तब पछताय का होत हे जब चिड़िया चुग के खेत।” ये नाचा के कहानी हर बार-बार माँ अउ बेटा के गहरा पियार के अहसास कराथे।
माँ केवल रिस्ता के नाम नोहे, एक पूरा अहसास आय। एक कस्तुरी के तरह अहसास जेला देखे नइ जा सकय, ढ़ूंढे नइ जा सकय केवल अहसास करे जाथे। माँ कहे ले मन म ममता के भाव जागथे। ओकर ऍंछरा म संसार के जम्मो सुख बंधाय रहिथे। ओकर अंतस म समुंदर के तरह पियार-दुलार लहरा लेत रहिथे अउ ओकर ऍंछरा ले पुण्य बरसा बरसत रहिथे, येला कोनो नइ जान सकय कि ओकर अंतस म अउ का-का हे। कभू-कभू तो लागथे माँ के जीवन संघर्ष के गाथा आय या ओकर जीवन हर पूरा तपस्या। काबर कि ओकर तपस्या ले ही पूरा संसार हर एक नवा रूप लेथे। माँ जब रोथे त अइसे लागथे कि जम्मो संसार हर रो दिस अउ हँसथे त अइसे लागथे कि उपवन ले फूल झरत हे। माँ के जीवन के पक्ष हर केवल यिा नो हे, बल्कि एक सिध्दांत होथे। ओमे शिक्षा के प्रकाश के किरण फूटत दिखथे। ओमे जीवन रूपी सिध्दांत ले संसार के जम्मो यिापक्ष के प्रतीत करे जा सकथे। ये पाय के बिद्वान मन कहिथे- भगवान हर सबो करा नइ जा सकय ये पाय के ओ हर माँ बन के घर-घर म बइठे हे।
माँ तो माँ होथे। माँ जइसे अपनापन अउ दुलार कोनो म नइ हो सकय। बेटा चाहे लइका होय, जवान होय या बुढ़ुवा, माँ बर तो हमेशा लइका होथे। ओहर ओला हर पल निहारे बर चाहते। अपन आगू म देखना चाहते। फेर लइका हर अपन ल बड़े मान के हमेशा माँ दूर रहना चाहथे या अपन कामकाज म भूला जाथे। माँ के अहसास के परवाह नइ करय। कभू-कभू तो वो ये कही देथे- मँय अब बड़े होगे हों, का मय तोर ऍंछरा म बंधाय रहँव?
बचपन के बात आज याद आथे। बात हमर घर के हरे । हमर बाबू जी हर जब वैपार या किसानी के काम ले जब बाहर जाय राहय अउ कोनो पानी बरसात के दिन होय, पानी बरसे अउ बिजुरी चमके या जब रात-बिकाल हो जाय अउ ओ हर नइ आय राहय। त हमर डोकरी दाई के मुँहू ले एकाएक शब्द फूटे-”कहाँ होबे रे बेटा! आ नइ जातेस।” अउ ओ हर ये शब्द ल अलग-अलग ढंग ले बार-बार काहय। ओकर उद्गार ल सुन के हमन ओला चिल्लावन। तब ओ हर काहय- ”तुमन का जानहू रे।” अउ अपन ऑंसू ल पोछे। अब बात हर समझ आथे ये हर ओकर मन चिंता पीरा, अउ अहसास आय, माँ के पियार के अभिव्यक्ति। जेला अपन ढंग ले ब्यक्त करय। ये बात ओ समय हमर समझ ले परे राहय।
माँ हर अपन मुँहू के निवाल ल निकाल के खवाथे। अपन बाँहों म झूलाथे। लइका के डर ल भगाय बर अंधियारी रात म ओला लोरी सुनाथे। कच्चा म खुद सुतथे अउ सुक्खा म लइका ल सुताथे। जम्मो पीरा के ऑंसू ल खुदे पी जाथे। ये बड़का विडंबना आय जउन माँ हर चार झन अबोध लइका ल हांसत-हांसत पाल लेथे उही एक झन माँ ल सज्ञान, पढ़े-लिखे, पइसावाले चार झन बेटा मिल के नइ पाल सकय। माँ अमीर होय या गरीब अपन पूरा के पूरा दे के कोशिश करथे। मातृत्व दिवस हर केवल औपचारिकता मात्र मत होय बल्कि ये अहसास जगाय के माध्यम आय।

बलदाऊ राम साहू
एच.-7 बी.टी. आई. कालोनी
शंकर नगर रायपुर

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