माटी के दियना

माटी के दियना, करथे अंजोर।
मया बांध रे, पिरितिया डोर॥
जगमग-जगमग लागे देवारी,
लीपे-पोते घर, अंगना, दुवारी
खलखला के हांसे रे,
सोनहा धान के बाली
चला चलव जी, लुए बर संगी मोर॥
माटी के दियना…
नौकर-चाकर, सौजिया, पहटिया
जोरे-जोरे बइहां रेंगे,
धरे-धरे झौंहा डलिया
चुक-चुक ले, गांव, गली, खोर
माटी के दियना…
छन-छन ले घाट-घटौंदा
तरिया-डबरी, नरवा-नदिया
पैडगरी लागे उजास रे
माटी के दियना…
रामकुमार साहू मयारू
गिर्रा पलारी

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One comment

  • mukesh kumar sahu

    aap man ke mati ke diyna kavita la parhe le mar gavae gaov ke yadaa ge ye kavita likhe bar aap la gara-gara badhai.

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