माटी के दीया जलावव : सुघ्घर देवारी मनावव

देवारी के नाम लेते साठ मन में एक परकार से खुसी अऊ उमंग छा जाथे। काबर देवारी तिहार खुसी मनाय के तिहार हरे।
देवारी तिहार ल कातिक महीना के अमावस्या के दिन मनाय जाथे। फेर एकर तइयारी ह 15 दिन पहिली ले सुरु हो जाथे। दशहरा मनाथे ताहन देवारी के तइयारी करे लागथे।
घर के साफ सफाई – देवारी के पहिली सब आदमी मन अपन अपन घर, दुकान बियारा, खलिहान के साफ सफाई में लग जाथे। घर ल सुघ्घर लीप पोत के चकाचक कर डारथे। बारो महिना में जो कबाड़ सकलाय रहिथे वो सब साफ हो जाथे। घर के खिडखी दरवाजा मन ल भी साफ करके पालीस लगाके चमकाय जाथे।

छबाई – पोताई – आज भी गांव में घर के चंउरा मन ओदर जाय रहिथे वोला माटी में छाब के बढिया बनाय जाथे अउ साथे साथ घर कोठार के जतका माटी वाला कोठ ओदरे रहिथे वोला छाब के सुधारे जाथे।
किसान मन ह अपन बियारा ल रापा में छोल छुली के साफ करथे अऊ भांडी ल ऊंचा उठाके ओकर उपर कांटा लगाके छेका करथे। ताकि कोनो आदमी या जानवर झन खुसर सके।

माटी के दीया – देवारी तिहार में माटी के दीया जलाय जाथे। कुमहार मन ह माटी के दीया बनाथे अऊ वोला बजार में जाके बेंचथे। माटी के दीया जलाय से घर में लछमी के आगमन होथे अइसे माने जाथे ।



देवारी काबर मनाथे – देवारी मनाय के पीछे भी एक कारन हे कि भगवान श्री राम चन्द्र जी ह इही दिन चौदह बरस के बनवास ल काट के अयोध्या वापिस आइस हे । ओकर खुसी में पूरा अयोध्या वासी मन ह दीया जलाके सुवागत करे रहिसे। वो दिन अमावस्या के घोर अंधियारी रात ल दीया जला के जगमग अंजोर कर दीस । तब से दीपावली या देवारी तिहार ल मनात चले आत हे।

धनतेरस – देवारी के दू दिन पहिली धनतेरस के तिहार मनाये जाथे । धनतेरस के दिन बजार में खूब भीड़ भाड़ रहिथे । सब आदमी मन ह बरतन अउ सोना चांदी खरीदथे । ये दिन ए सबला खरीदना शुभ माने जाथे। सांझ के समय घर में तेरह दीया जला के पूजा करे जाथे ।

नरक चौदस – धनतेरस के दूसर दिन नरक चौदस के तिहार मनाय जाथे । एला छोटे देवारी भी कहे जाथे ।नरक चौदस के दिन बिहनिया ले उठ के स्नान करना सुभ माने जाथे । ए दिन सब आदमी मन ह अपन अपन पसंद के अनुसार मिठाई खरीदथे । खील बतासा के मिठाई ह परसिद्ध हे। गनेस लछमी के फोटू खरीदथे। लइका मन बर कपड़ा अउ फटाका खरीदें जाथे।

दीपावली – देवारी के दिन तो लइका मन ह बिहनिया ले फटाका फोरे के सुरु कर देथे। सांझ के समय मुहुरुत देख के लछमी माता के पूजा अऊ आरती करे जाथे। पूजा करे के बाद पारा परोस में परसाद बांटे जाथे अऊ एक दूसर ल दीपावली के शुभकामना दे जाथे। लइका मन ह खूब फटाका फोरथे। फटाका फोरे में लइका मन ल बहुत मजा आथे। लइका मन के साथे साथ बड़े मन भी फटाका फोरथे अऊ मजा लेथे।

जुंवा खेले के परंपरा – लछमी पूजा करे के बाद जुंवा खेले के गंदा परंपरा हे। ए दिन छोटे बड़े सब आदमी मन जुंवा खेलथे। सियान मन कहिथे कि ए दिन जे जुंवा नइ खेलही वोहा अगले जनम में छुछु बन जाही।
जुंवा खेल के कतको आदमी बरबाद घलो हो जाथे। ए परंपरा ल दूर करना जरुरी हे।

गोवर्धन पूजा – देवारी के दूसर दिन गोवर्धन पूजा करे जाथे। ए दिन गाय बैला के पूजा करे जाथे अऊ खिचरी खवाय जाथे। इही दिन भगवान श्री कृष्ण ह गोवर्धन परवत ल उठा के सबके रक्षा करे रहिसे। ओकरे याद में ए तिहार ल मनाय जाथे।

भाईदूज – एकर बाद भाईदूज के तिहार मनाय जाथे। जेमे बहिनी मन अपन भाई के पूजा करथे अऊ मिठाई खवाथे। ओकर बदला में भाई ह अपन बहिनी ल उपहार भी देथे ।
ए परकार से देवारी तिहार ल सब कोई मिलजुल के उतसाह पूरवक मनाथे। ओकर बाद किसान मन ह अपन खेती किसानी के काम में लग जाथे ।

महेन्द्र देवांगन “माटी”
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला – कबीरधाम छ. ग)
8602407353
Email – mahendradewanganmati@gmail.com



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