माटी पुत्र या माटी के पुतला?

हमर इहां कोनो भी मनखे ल मूल निवासी के रूप म चिन्हारी कराए खातिर एक सहज शब्द के उपयोग करे जाथे- ‘माटी पुत्र” खास कर के राजनीति म। चाहे कोनो पार्टी के मनखे होय, कोनो पद म बइठे नेता होय सबके एके चिन्हारी- ‘माटी पुत्र”। फेर मोला लगथे के ‘माटी पुत्र” कहाए के अधिकार हर कोई ल नइ मिलना चाही, भलुक वोकर ‘माटी” खातिर ‘मया” अउ वोकरो ले बढ़ के माटी के पहचान जेला हमन भाखा, संस्कृति या अस्मिता के रूप म चिन्हारी करथन, एमा वोकर कतका अकन योगदान हे, एहू ल देखे जाना चाही।
काबर ते सिरिफ इहां पैदा होय भर म या सिरिफ इहां के भाखा-संस्कृति के गोठ भर कर दे म कोनो ल ‘माटी पुत्र” के चिन्हारी नइ मिल जाए। भलुक एकर मन के करम ल या कहिन बुता ल घलोक देखे जाना चाही। आज छत्तीसगढ़ ल अलग राज बने चउदा बछर उरकगे हवय। फेर इहां के भाखा के, संस्कृति के, इहां के मूलधरम के अलगे चिन्हारी नइ बन पाए हे।
ताज्जुब तब होथे जब कोलकी-संगसी म नेतागिरी करइया मन ले लेके राज के मुखिया तक के बोली म इहां के भाखा, संस्कृति अउ संपूर्ण अस्मिता खातिर भारी अकन कारज करे के शेखी सुने बर मिलथे! अरे भइया.. भारी अकन कारज करे हावव त वोहर कोनो मेर दिखय काबर नहीं? आज तक इहां के भाखा ह, शिक्षा अउ राजकाज के भाखा काबर नइ बन पाए हे? इहां के संस्कृति ल आने प्रदेश ले आए मनखे मन के संस्कृति अउ ग्रंथ संग संघार के काबर लिखे अउ बताए जाथे? इहां के मूल ‘आदि धरम” ल जाति-पाति अउ वर्ण व्यवस्था के दलदल म धंसे तथाकथित धरम के अंग के रूप में काबर चिन्हारी करे जाथे?
का इहां के माटी पुत्र मनला ए बात के समझ नइए। या इन समझ के घलोक अपन राजनीतिक ददा-बबा मन के जोहार-पैलगी करे के छोड़ अउ कुछ जानंय-समझंय नहीं?
मैं एकरे सेती एमन ल ‘माटी के पुतला” कहिथौ! जे मन अपन भाखा-बोली, धरम-संस्कृति अउ इतिहास के गौरव ल नइ गोठिया सकंय, इंकर बढ़वार अउ रखवारी खातिर कुछु ठोस उदिम नइ कर सकंय, उन ‘माटी पुत्र” कइसे हो सकथे, इन सब तो ‘माटी के पुतला” ही कहाहीं न?
मैं वो तथाकथित साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार अउ अस्मिता के चारोंखुंट बगरे रखवार मनला घलोक इही श्रेणी म शामिल करथौं, जेमन भाखा-संस्कृति के बात ल, अस्मिता के गोठ ल सिरिफ मंच म माला पहिरे खातिर करथें। एकाद ठन सरकारी सम्मान ल अपन टोटा म ओरमाए खातिर करथें। जबकि ठोस भुइयां म इंकर मन के कारज शून्य होथे।
छत्तीसगढ़ी भाखा-संस्कृति खातिर कतकों अकन सरकारी-असरकारी आयोजन होवत रहिथे। फेर मोर ये प्रश्न हे- एकर मन के मंच म अतिथि-सतिथि के रूप म जेमन टोटा म माला ओरमा के बइठे रहिथें, बड़े-बड़े पदवी ले सम्मानित होवत रहिथें वोमा के कतका झन के योगदान छत्तीसगढ़ी भाखा, संस्कृति अउ अस्मिता खातिर ठोस होथे?
एक बात तो ठउका जानव के जब तक ढोंगी-पाखंडी अउ फर्जी किसम के मनखे मन मंच म सम्मान पाहीं अउ ठोसहा बुता करइया मन उपेक्षित रइहीं, तब तक छत्तीसगढ़ी के न तो विकास हो सकय, न तो वोकर अस्तित्व बांच सकय।
का ये सब हमर माटीपुत्र मन के आंखी म नइ दिखय? अउ नइ दिखय त उन माटीपुत्र कइसे हो सकथें? जेकर मन के आंखी म अंधरौटी छागे हवय, जेकर मन के मती ल लकवा मार दिये हवय, जेकर मन के हाथ-गोड़ ह सिरिफ अपन राजनीतिक आका मन के जोहार-पैलगी करे खातिर हालथे-डोलथे वोमन सिरिफ ‘माटी के पुतला” तो हो सकथें। जेन कठपुतली नाच बरोबर नाचे के छोड़ अउ कुछु नइ कर सकंय।

सुशील भोले
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