मानव सेवा – देहदान : जरूरत अउ महत्ता




सरग इंहे, नरक इंहे । मरे के बाद कोन जीव कहाँ जाथे तेला कोनो नद जानय। बने करम करबे त ओकर सुख भोगे बर अउ घिनहा करम करबे त दु:ख भोगे बर इही भुइंया म फेर आना हे। सियान मन कहिथे के मरे के पहिली अइसन करम कर लव कि मरे के बाद जम्मो मनखे तुंहर सुरता राखय। दान, दक्षिणा, दीन-दुखी के सेवा, सहायता आदि कतको तरीका हवय जेकर ले आप पुन्न के काम करके मानवता के संदेश दे सकथव। दान करे के कई तरीका हे जइसे कोनो स्कूल बनवा दिस, कोनो धरमशाला बनवा दिस, कोनो चेरिटी म दान करथे, कतको झन रक्तदान करके जीते जी पुन्न के भागीदार बनथे। देहदान घलो इही कडी़ के हिस्सा आय। ये अइसन दान ये जेमा पईसा लागे न कौडी़ ,बिना खरचा के पुन्न कमाना ये।

देहदान काय ये ? – देहदान मनखे के मरे के बाद दे जाने वाला दान आय। मनखे ल अपन जीवनकाल म ही देहदान के घोषणा करे बर परथे, अउ मरे के उपरांत मनखे के देह ल उपयोग म लाय जाथे। देहृदान करे बर उम्र के बंधन नइ हे, नवजात लइका ले लेके 90 साल के बुजुर्ग घलो ह देहदान कर सकथे।

कइसे करन देहदान– जब भी आप देहदान करव त ओखर घोषणा सार्वजनिक रूप से करव। अपन समाज के बीच म, या कोनो बडे सार्वजनिक कार्यक्रम म जिहाँ लोगन सकलाय राहय, काबर येकर ले दूसर मनखे ल घलो देहदान के संबंध म जानकारी अउ प्रेरणा मिलथे। घोषणा करे के बाद देहदान के रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य हवय। आप कोनो भी मेडिकल कालेज, एम्स या मेडिकल रिसर्च सेन्टर म जा के देहदान के विधिवत पंजीयन करा सकथव।

देहदान के फायदा– देहदान करे ले पहिली फायदा पर्यावरण ल होथे, पाँच छह कोंटल लकङी के बचत, घी, राल, माटी तेल जम्मो जिनिस के बचत। लकडी जलाय ले पर्यावरण प्रदूषित होथे तेकर ले बचत। मनखे के हाडा ल बिनके अस्थि बिसर्जन करे जाबे तेकर बचत। अस्थि बहाये ले नदी ह प्रदूषित होथे तेखर बचत। असइने मुरदा शरीर ल पाटबे तभो खरचा आथे वोकरो बचत।

काबर करन देहदान -मरे के बाद मनखे के शरीर ल लोगन अपन-अपन धरम के रीति-रिवाज के अनुसार या तो जला दे जाथे या दफना दे जाथे। ये दूनो क्रिया म मनखे के शरीर ह कोनो काम नइ आवय। फेर मरे के बाद 1 मनखे के मृत शरीर के स्वस्थ अंग अउ टिशू ला दूसर जीवित मनखे के शरीर म प्रत्यारोपित करके लगभग 50 मनखे के जान बचाये जा सकथे। जइसे -दू आँखी ले दू मनखे के आँखी रोशन हो जाथे, दू किडनी ले दू मनखे के जिनगी बांच जाथे, अइसने फेफडा, लीवर, हृदय, कार्निया, टिशू, त्वचा आदि अंग ल अलग-अलग अइसन मनखे के शरीर म प्रत्यारोपित कर दे जाथे जउन मन एकर अभाव म मरनासन्न स्थिति म पहुंच जाय रहिथे। बाकी बांचे शरीर ह मेडिकल कालेज के विद्यार्थी मन के काम आथे, काबर कि चीर-फाड करे बर मनखे के शरीर बड मुसकुल म मिल पाथे। अइसने कोनो-कोनो देहदान करे रहिथे तेकर शरीर ह मेडिकल स्टूडेंट मन के काम आ जाथे।

नावा सोच के जरूरत– 21 सदी ह विज्ञान के जुग आए, रूढिवादी बिचार ल अब बदले के बेरा आ गे हे। कतकोन झिन ल कहत सुने होहु- आँखी ल दान करबे त दूसर जनम म अँधरा होबे मान्यता ल खतम करे जरूरत हवय। पहिली गुनव अउ गुने के बाद सही ल मानव। मनखे जीयत भर जम्मो प्रकार के सुख ल भोगथे, देहदान कर के हम मरे के बाद घलो कई झिन के जिनगी बचा सकथन। मरे के कुछ घंटा तक मानव शरीर के अंग ह सुरक्षित रहिथे तेखर सेती मनखे के के मृत शरीर के कई हिस्सा ह दूसर मनखे के शरीर म प्रत्यारोपित हो जाथे। माने कि मरे के बाद आप बिना खरचा करे पुन्न कमा सकथव। दुनिया भर म अंग नइ मिले के कारण हर बछर 5 लाख मनखे के मौत हो जाथे। देहदान करके इंकर जान बचाय जा सकथे। ये विचार करे विषय हे।

दूसर पहलु – हमर देश म जघा-जघा मेडिकल कालेज खुल गे हवय फेर मेडिकल विद्यार्थी के अध्ययन करे खातिर मानव शरीर के उपलब्धता बहुत कम हवय। मेडिकल बोर्ड के अनुसार हर डाक्टर के पाछू कम से कम 1 मानव शरीर (मृत) के प्रेक्टिकल करे खातिर होना चाही फेर मानव शरीर न मिल पाये के कारण मेडिकल के विद्यार्थी मन चित्र या डायग्राम के माध्यम ले शरीर के संचरना के अध्ययन करथे। प्रेक्टिकल तो तभे करही न जब मानव शरीर मिलही अइसन स्थिति म उंकर मेडिकल के पढई ल अधूरा कहे जा सकथे। यदि विद्यार्थी मन ल मानव के मृत शरीर मिल जाही त उन चीर फाड करके पूर्ण रूप से शरीर ल समझ पाही ये वजह से भी देहदान करे के बहुत जादा आवश्यकता हवय।

जरूरी गोठ – देहदान करे भर ले कुछ नइ होवय होवय, देहदान के घोषणा करना अउ ओकर रजिस्ट्रेशन करवा लेना तो आसान हवय फेर देहदान के क्रियान्वयन बड मुसकुल काम हवय। देहदान ह एक प्रकार ले संकल्प आय जउन ल पूरा करना चाही। देहदान करे के बाद आप तो नइ राहव त आपके ये संकल्प ल आपके अवईया पीढी या आपके करीबी रिश्तेदार ह पूरा करथे। येकर सेती देहदान करईया मनखे ल अवईया पीढी या अपन करीबी रिश्तेदार ल घेरी-भेरी चेता के राखे ल परही कि आपके अंतिम इच्छा का हे। उनला येह बता के राखे ल परही कि मरे के बाद तुरते बाद रजिस्ट्रेन सेंटर ल फोन करहू। अब आजकल तो 1 घंटा के भीतरी एम्बुलेंस पहुंच जथे ओकर बाद मृत शरीर ल सुरक्षित उठा के ले जाथे। मनखे के जेन-जेन हिस्सा बने रहिथे ओला तुरते उपयोग कर लिए जाथे बाकी शरीर ल मेडिकल छात्र मन चीर-फाड करके अध्ययन करथे| यदि मृत देह ल रजिस्ट्रेशन सेंटर भेजवाय म देरी होइस त मृत देह के कतको अंग हा खराब हो जाथे जेकर ले न तो देह के उपयोगिता रइही न देहदान के सार्थकता।

अदभुत उदाहण– भिलाई (छ.ग.) के बेटी अजीता पुरंग शाह बिहाव के बाद अमेरिका के न्यू जर्सी म रहत रहिस। ब्रेन हेमरेज के कारण ओकर मौत होईस, फेर मरे के पहिली अजीता ह देहदान करे रहिस। मरे के बाद अजीता के मृत देह ले 30 मनखे के जान बाचिस। अजीता के अलग-अलग अंग ल अलग-अलग मनखे ल प्रत्योरोपित करे गिस ये प्रकार ले मरे के बाद घलो अजीता ह देहदान करके मिसाल बनिस।

अजय ‘ अमृतांशु”
(लेखक अड उंकर धर्मपत्नी किरण साहू देहदान कर चुके हवय)




धमनी वाले श्री अजय शर्मा जी बतावत हे देहदान के महत्‍व




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