मै मै के चारों डाहर घूमत साहित्यकार – सुधा वर्मा

एक कार्यकरम म कुछ साहित्यकार मन संग भेंट होईस। एक लेखक जेन कवि घलो आय आके पांव छुईस अउ बइठगे। थोरिक बेरा मा कुछु-कुछु गोठियाय के बाद म कहिथे, मैं ह छत्तीसगढ़ के टॉप के बाल साहित्यकार आंव। अभी-अभी थोरिक दिन पहिली एक महिला साहित्यकार फोन कर-कर के कई झन ल कहिस के मैं ह पहिली महिला साहित्यकार आंव जेखर तीन किताब छत्तीसगढ़ी म छपे हावय। मैं ह पहिली महिला उपन्यासकार आंव। एखर पहिली एक शिक्षक साहित्यकार एससीईआरटी म काहत रहय के हाना ऊपर कहिनी मैं ह पहिली लिखे हाववं। अभी तक अइसना कोनो नई लिखे हावय।
‘मैं-मैं-मैं’ के चारों डाहर घूमत हे साहित्यकार अऊ बोकरा कस में में बोमियात हावय। दर्शक अउ श्रोता सब समझ जथे अऊ पीठ पीछू हांसथे। ठीक हे, आजकल हांसी तो कोनों ल आवय नहीं इही बहाना थोरिक हांस लिही। दू बात के काट तो मैं तुरंत कर देंव फेर तीसर बात बर चिंतन करेंव। ये मनखे अपन आप ल टॉप के बाल साहित्यकार काहत हावय त ओखर कतका अकन बाल साहित्य हावय। फेर हमर छत्तीसगढ़ म के झन बाल साहित्य बर अपन कलम चलाए हावय।
मोर आगू म बइठे रहिस हे चन्द्रकला त्रिपाठी अउ श्याम सुन्दर त्रिपाठी। मैं ह जब छोटे रहेंव त चन्द्रकला जी के कहिनी ल पराग अऊ नंदन म पढ़त रहेंव। दस साल के उमर ले ऊंखर रचना पढ़त हावंव। तब काय ये साहित्यकार छत्तीसगढ़ के नोहय? मैं ह तुरंत ये बात के ऊंखर तीर चर्चा करेंव। तब दीदी ह बतईस के सन् 68-69 ले ऊंखर कहिनी नंदन, पराग, मिलिंद म छपत हावय। पहिली बहुत छपत रहिस हे। नव साक्षर मन बर घलो दस साल ले लिखत हावंय। इन्दौर के पत्रिका ‘अक्षर की छांव’ म ऊंखर रचना छपत हावय। सन् 1970 ले अब तक नवभारत, भास्कर, हरिभूमि म घलो छपत हावय। आकाशवाणी के बाल वाटिका म कहिनी आवत हावय। पर्यावरण ऊपर पहली ले पांचवी तक किताब के लेखन अंग्रेजी माध्यम बर करे हावंय।
ऊंखर संगे-संग श्याम सुन्दर त्रिपाठी जी सन् 65 ले लिखत हावयं। नंदन, पराग म घलो रचना छपत हावय। दिल्ली राजकमल प्रकाशन ले एकांकी ‘रेल का सफर’ छपे हावय। अर्चना प्रकाशन भोपाल ले ‘ईमानदारी की कमाई’ छपे हावय। महापुरुष ऊपर घलो बाल साहित्य लिखे हावय। सन् 1997 म लखनऊ सासन डाहर ले हिन्दी साहित्य संस्थान द्वारा बाल साहित्य बर पुरस्कार मिले हावय। इन्दौर के देवदूत बालपत्रिका म रचना छपत रहिथे। भाठापारा के चंचन के सुग्घर कविता देशबन्धु म छपत रहिथे।
इही दौर के आय शिवशंकर शुक्ला, ऊंखर बाल कहिनी घलो बहुत चर्चित हावय, ‘दुलरवा दमाद’ संकलन तीस साल पहिली के आय। ओखर द्वितीय संस्करन घलो निकलगे हावय।
आगू म चुपचाप बइठे सतीश उपाध्याय जी अपन बारे म बतइन के नंदन, पराग, चंदामामा, लोट-पोट, बाल भारती म ऊंखर रचना छपत रहिथे। एससीईआरटी डाहर ले पचपन अऊ बालमित्र पत्रिका म घलो रचना छपे हावय। ”शहद के गोले” बाल कविता संग्रह निकलईया हावय। रायगढ़ के शंभूलाल शर्मा ‘बसंत’ बाल कवि आयं। इंखर कविता ले प्रेरित होके कोरिया सरिख आदिवासी बाहुल छेत्र म लेखन करत हांवय सतीश जी। भिलाई के गोविन्द पाल अउ रायगढ़ के हेमंत चावला घलो अपन रचना ले लइकामन ल दुलारत हावंय।
आनंद तिवारी पौराणिक जी बाल साहित्य बर गंज अकन पुरस्कार देश के कोंटा-कोंटा ले सकेले हावंय। नारायणलाल परमार के नांव छत्तीसगढ़ के कन-कन म समाय हावय। वाणी प्रकासन ‘चलो गीत गाएं’ गीत संकलन अतेक दिग्गज मनके अउ ‘चरित्र बोध की कहानियां’ संकलन सन् 1979 म निकले रहिस हे। आगू म अपन आप ल टॉप में बताना एक मानसिक कमजोरी आय। टेसिया मनखे अपन गुन ल नई बदल सकय कुकुर के पूंछी कस टेड़गा रहिथे। ‘मैं’ के रोग ह कैंसर ले जादा खतरनाक होथे, अइसना रोग पाले मनखे ह मर-मर के जियत रहिथे। छत्तीसगढ़ के साहित्य बिरादरी म ‘मैं’ के रोगी मन बोमियावत हावय।
एक छोटे कुन बालगीत परमार जी लिखे हांवय जेला पढ़के लइकामन म जोस अपने अपन आ जही-
अब झन कर देरी
ओ मोर भईया।
मुश्किल हे रद्दा
ठिकाना अभी दूरिहा हे।
फेर नइया ल हमर
पार तो लगाना हे।
साहस के पुतरा आन
हम सब खिवैया।
सुधा वर्मा

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