राघवेन्द्र अग्रवाल के गोठ बात : जान न जाइ नारि गति भाई

एक ठन गंवई रहय। उहां मनसे परेम लगा के रहत रहंय। एक दुसर के सुख-दु:ख म आवंय-जायं, माई लोगिन, बाब पिला मन घला संघरा गुठियावयं बतावयं, कोनो ल काकरो ऊपर सक-सुभा नि रहय, फेर परेम के पूरा ह काला अपन डहर तिर लिही तेला कोनो नि जानंय, इही कथें आयं, कहत बांय हो जाथे कहिके।
वो गांव म एक झन पुरोहित रहय। कथा वार्ता कहयं घर-घर जाके अऊ अपन गिरस्थी के गाड़ी ल चलावत रहय। वोला अडबड़ दिन ले को जानी का बात वोकर मन म रहत ते, अपन गोसइन संग सोझ नि गुठियाय। मन म भरम तो रहय फेर कोनो ल वो ह अपन गोसइन संग नइ देखे रहय। तेखर सेती मउका के तलास म लगे रहय।
एक दिन अपन गोसइन ल कथे- महराजिन! सुन तो आज में ह कथा बांचे अन्ते गांव जात हंव। महराज ह तो अपन गुनताड़ा म लगे रहय। घर ले निकरिस फेर थोरकेच्च दूरिहा जाके लहुट के आघे अउ अपन सुते के खटिया खाले लुकागे।
महाराजिन के परेमी ल जब जनारो होइस कि महराज ह अन्ते कथा पढ़े बर चल दे हे त वो ह आगे अउ बेफिकर होके मउज-मस्ती म बूड़गे। इही बेरा महराजिन के हाथ ह खटिया तरी लुकाय महराज के मुड़ म परगे। महराजिन समझगे सबे बात ल। वो ह अपन मुंह ले ओथरादिस।
वोकर परेमी ह पूछते- ‘कस ओ! का बात ये आज तें ह मोर सोज बने हांसत-बोलत नइ अस। लागथे ते ह अड़बड़ संसो म हस।’
महराजिन कहिस- ”तें तो जानतेच्च हस के आज मोर महराज ह गांव गे हे। मे ह अपन महराज ल अड़बड़ परेम करथंव वोकर बिना आज मोला ये घर ह भांय-भांय करत हे। वोकर सुन्ना म तैं आके नंगरई करत हस। आवन धर तोर करतूत ल में बताहां ते अपन भल चाहस त अभीच्चे इहां ले भाग जा।” अइसे कहिके बोम फार के रोय लागिस।
‘महराज तें मोला छोड़ के कहां चल देहे ये रोगहा आके मोला मतौना करत हे। ‘ अपन तिरिया के चिल्लई ल सुन के महराजा गुने लागिस देख तो मैं कतका भागमान हंव के मोला अतेक सुघ्घर पतिबरता घरवाली मिले हे। मे ह फोकटे महराजिन उपर सुभा करत रहेवं। अइसे गुन के मारे उछाह के खटिया ले मुंड़ ऊपर उठा लिस अउ नाचे लागिस। महराजिन घला मने मन अपने अकल के कामयाबी ल देख के खटिया ले कूद परिस अउ महराज ल पोटार लिस। पढ़े-लिखे महराज दूसर ल कथा भागवत सुनाना इही वोकर काम रहय वो नि जान सकिस के
‘त्रिया चरित्रं पुरुषस्यं भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुस्य:॥’
राघवेन्द्र अग्रवाल
(खैरघटा) बलौदाबाजार
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