लगिन फहराही त बिहाव माढ़ही

बर बिहाव के दिन म जम्मों मनखे इहिच गोठ म लगे रथे, अऊ ठेलहा मनखे हा तो ये मऊका म जम्मों झन के नत्ता जोरे बर अइसे लगे रथे जइसे ओखर नई रेहे ले दुनिया नई चलही, इंजीनियर, डागटर ल घलो ऊखर मन के गोठ सुने ल परथे। छोकरी-छोकरा मन के दाई-ददा ले ज्यादा ओखर घर के सियान मन ल संसो रथे, ओमन तो छोकरी-छोकरा के काच्चा ऊमर ले पाछू परे रथे, ओमन सोचथे के परलोक सिधारे के पहिली नाती-पोता मन के बर-बिहाव देख लेवन। बड़ कन समाज म छोकरी घर छोकरा हा हांथ मांगे बर जाथे, ये परंपरा जुन्ना हरे, पहिली बर बिहाव म छोकरा के मनमर्जी राहय त ये परंपरा के सेतन कतको छोकरी ल बिन पसंद के छोकरा संग बिहाव करे ल परे, फेर अब जमाना उलट गे हे, अब छोकरी के मनमर्जी चलथे त अब इही परंपरा के सेतन छोकरी खोजत ले छोकरा वाला मन हा हलाकान हो जथे, काबर के नवा जुग म नवा-नवा नखरा हो गे हे। कोनहो करा छोकरा के नखरा त कोनहो करा छोकरी के। अब अइसन म ठेलहा मनखे किंजर-किंजर के मजा उड़ाथे त बुता काम वाला मनखे के मुड़ पीरा हो जथे। पहिली सोजहे में पारा परोस अऊ चिन-पहिचान के घर म नत्ता बना लेवय, वोहा तईहा के गोठ होगे। अब तो बिहाव के दू-तीन बछर पहिली ले जोड़ी खाप खाये अऊ अपन घर म मिंझर जाये तइसन छोकरी अंताजे जाथे, अऊ असल नजारा तो छोकरी देखे बर नवा कपड़ा-लत्ता अऊ नवा पनही पहीर के ऊखर घर पहुंचथे ततका बेर रथे, पहिली तो घर वाला मन आदर के संग बइठारथे, भीतर ले छोकरी के बहिनी हा आके परदा लगाथे अऊ परदा के पाछू ले झांक के छोकरा ल देख के लहुट जथे, छोकरा उही ल छोकरी समझ के खुश हो जखे, अऊ कई घंव तो सटका अऊ अपन संगवारी मन ल मोला छोकरी पसंद हे कइके घलो कही डरथे। छोकरा भले कतको नकटा राहय फेर ओतका बेर जम्मों लाज-सरम ओखरे भीतर हमा जाये रथे, सिधवा गाय सरीक मुड़ी ल गड़िया दे रथे कोनहो कही पुछथे ततकी बेर मुड़ ल उचा के दू भाखा जवाब देथे, जम्मों झन वो बपूरा ल आंखी बटेर के गोड़ के नख अऊ मुड़ के चुंदी ले देखत रथे, त बपूरा अतका तो लजाहिच, अब छोकरी के निकरे के अगोरा म दुनिया भर के गोठ सियान मन कर डारथे, इंहा के ठन स्कूल हे नोनी कहां पढे हे, इंहा के सरपंच कोन आय, फला-फला ल चिन्थस का, अऊ कते कते गांल म नत्तेदारी हे, इंहा के बाजार कब लगथे, भाई-बहिनी मन का करथे, जम्मों गोठ बात होथे फेर छोकरा छोकरी के बिसय म कोनहो घसलाहा मनखे जाय रथे तिही गोठियाथे नई ते ओखर तो गोठ होबे नई करय। बड़ अगोरा म छोकरी बिस्कुट अऊ मिच्चर धर के निकलथे, बईठक कुरिया म ओखर गोड़ राखते साठ फेरन लबली अऊ स्नो ममहाथे, पऊडर मुहु म अल्लिग दिखत रथे, छोकरी ल देख के छोकरा अपन होय भोरहा ल मने-मन हांसथे, सोंचथे के पहिली निकरे रीहिस तेला छोकरी समझ के हव कहूं सोचें रेहेंव, फेर अब येखर बर सोचे ल परही। अऊ ओती छोकरी हा पलेट ल टेबुल म मढ़ा के जम्मों झन के पांव परथे, ताहन सियान मन गाय-गरु छांटे सरीख परखे लागथे, गोड़ बने माढ़त हे के नही, आंखी कान बने हवय के नही, मोठ हे के पातर हे, धार मुहु हे के गोल थोथना हे, गोरी हे के बिलई हे, अऊ ताहन पेशी चालू होथे नोनी तोला रांधे-गढ़े ल आथे के नही, का पढ़े हस, कतका ऊंच हस, के भाई-बहिनी होथव, कतका प्रतिशत ले पास होथस, बिहाव के बाद नौकरी करबे का, अऊ गोत्र ल तो खच्चित पुछे जाथे, अऊ लफरहा मन हा तो तोला छोकरा पसंद हे के नही कइके सबके आघूच म पुछ देथे, छोकरी जम्मों सवाल के जवाब ल लजा-लजा के देथे, अऊ जेन हा नई लजावय तेन ल आज के आधुनिक जमाना में घलो छोकरा घर वाला मन कम पसंद करथे, इही करा हमर समाज के सच हा दिख जथे।
अब छोकरा के पेशी के बारी आथे छोकरा ल छोकरी के भाई, कका, नइते जीजा ह बुला के भीतर डाहन लेगथे, अऊ आघु म बईठार देथे, अब छोकरा के लजाय अऊ नई लजाय म ज्यादा फरक नई परय, जइसन छोकरी ले सवाल जवाब होय रथे वइसने छोकरा ले घलो होथे, फेर दू-चार ठन सवाल ऊपराहा पुछे जाथे जइसे कतका कमाथस का करथस, तुमन बांटा होगे हव का, हमर नोनी ल कहां राखबे, अऊ सबले फंसऊला सवाल की पीथस-खाथस का? ये सवाल के जवाब पहिली जम्मों छोकरा पीये ते झन पीये नहीच म देवय, फेर अब कतको झन कभू-कभू चलाय ल परथे कही देथे। अऊ छोकरा बड़े नौकरिहा हे त ये सब सवाल जवाब ल औपचारिकता म पुछे जाथे, अऊ छोटे नौकरी, धंधा, किसानी वाला मन ल तो पुछ-पुछ के पछिना छोड़वा डरथे। अऊ कोनहो बेरोजगार होगे त कोन जनी बिचारा ल छोकरी मिलही घलो के नही। इही हाल नौकरिहा छोकरी मन संग होथे, ओमन अपन मन के छोकरा छांट के अऊ जब मन आथे तब बिहाव करे के सोंचथे, ओमन अपन दाई-ददा के घलो नई सुनें, अऊ कतको छोकरी मन के ऊमर बाढ़ जथे फेर बिहाव नई हो सकय। अब अतका होय के बाद ऊंहा ले बिदा लेके छोकरा मन लहुटथे, त मोटर म गोठ-बात शुरु होथे, सटका हा छोकरा ल कथे कइसे जी तोला छोकरी मन अईस के नही त बपूरा लजा के कथे तुमन जानो मोला झन पुछो अऊ कतको झन ठेठ हाँ, नही घलो बता देथे। त दुसर कथे मोला तो एक कन आंखी टेड़गा लागिस, त फेर एक झन कथे मोला तो मोठ देहे हे त अलाल होही लागथे, हमर घर के बुता ल सकही के नही ते! त फेर एक झन मोठ नई हे यार मोला तो पातर लागिस, अऊ बिहाव के बाद सब सपोटा हो जथे, कोनहो पढ़ई ल कम हे कथे, त कोनहो रंग ल सांवली हे कथे, चार झन के मुहु ले चार गोठ निकलथे, अऊ घर म बइठे अपन नोनी ले सुग्घर छोकरी म घलो कमी नजर आ जथे, अऊ ये बात तय होथे के अभी दू चार जगा अऊ छोकरी देख लिया जाय। छोकरी वाला मन घलो कम नई राहय, छोकरा कोनहो बड़े नौकरी, अऊ जायदाद वाला नइये त बारा बहाना करके टरका देथे। अऊ अतका अकन तामझाम धरे के धरे रही जथे।
बर बिहाव म सटका, ढेड़हा-ढेड़ही, अऊ सारी-सारा, समधी-समधीन के जबर बुता रथे, येमन बिहाव मढाये ले लेके बिहाव के सिरात ले जम्मों बुता संग हंसी ठिठोली घलो करके बिहाव म रंग जमावत रथे। येखर छोड़ अऊ कई ठन बात हा बिहाव टोरे, जोरे बर बुता करथे, कोनहो मूल,जेठ,मंगली-मंगला के गोठ करथे त कतको झन पंचांग के बहाना करथे, कोनहो चरितर ऊपर सक करथे, त उढरिया भागे रथे तेखर भोगना ल परवार भोगथे, ये ऊपराहा उदीमेच हा हमर समाज के ढकोसला हरे, ये गोठ हा हमर बर हांसे के बिसय हो सकत हे फेर कतको परवार इही म सिरजथे-उजरथे, हमर समाज जतकी आघू बढ़त हे ओतकी पछवाय दिखथे। सिरतोन कबे त भगवान ऊपर ले जोड़ी बना के भेजे रथे, जब जेखर लगिन फहराही तेखर बिहाव माढ़ही।

ललित साहू “जख्मी” छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
9993841525

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *