लहुटती बसंत म खिलिस गुलमोहर : कहिनी

स्वाति ह मां ल पोटार के रोय लगिस। थोरिक बेरा म अलग होके कथे। मां मेंहा तोर दुख ल नइ देख सकंव। मेंहा तोर बेटा अंव। तोर पीरा तोर दुख अउ पहार कस बिपत ल समझथंव। बाबूजी ह अब कभू नइ लहुटय। ये जिनगी ह सिरिफ सुरता म नइ कटय ओ अम्मा। जिनगी म सबो ल हर उमर म कोनो साथी के सहारा के जरूरत परथे। जिनगी के एक-एक छन सहारा ह भगवान के दे हुए वरदान ये। ये ल हांसे जिए बर चाही। तैंहा परकास अंकल ल अपन साथी बनाले, ओखर संग सादी कर ले।
बेटी स्वाति, पूजा खोली म धरे माचिस ल कती धरे हस? मां के अवाज ल सुनके स्वाति के नींद उचटगे। अपन आंखी ल रमजत अऊ जम्हाई भरत वोहा कहिस- ‘में का जानहू ओ, तिंही ह एती वोती धर दे होबे।’ मां ह वोला बड़बड़ात पूजा खोली म आईस। खोजत-खोजत माचिस ह मिलगे। मां ह दिया, अगरबत्ती जलाके मन्त्र पढ़े लागिस। स्वाति ह पलंग ले उठके मुहाटी के बाहिर ले कहिस मां, थोरिक कमती आवाज म मंत्र ल पढ़े कर न ओ। मोर नींद उचटजाथे। मां ह सुनिस त बोलिस- ‘बेटी, अब तैंहा नानुक लईका नोहस, जल्दी उठेकर। असनान करले अऊ नास्ता कर ले। तोला 10 बजे डयूटी म जाए बर हे।’
स्वाति ह कुछु नइ कहिस, चुपचाप नहानी खोली कोती चल दिस।
सहर के बीच म नेहरू मार्केट तिर वर्मा जी के दू मंजिला पक्का घर हावय। चार ठन बड़े-बड़े खोली रंधनीखोली, नहानी खोली अउ अंगना। पिछौत म टायलेट। वर्माजी ह सीधा साधा मनखे रहय। वोहा प्रायवेट कपड़ा दुकान म सेल्समेन के काम करय। ओखर घवाली शांति ह घलो धारमिक विचार के पढ़े लिखे नारी रिहिस। वर्माजी के एके ठन सन्तान रिहिस- स्वाति ह। बस, तीने झन के ये संतोसी परिवार रहय। कमती पगार म वर्माजी ह घर गिरस्ती के गाड़ी ल चलावत रहय। वर्माजी ह अपन पेट ल काटके बेटी ल पढ़ाइस। वर्माजी के घरवाली शांति ह सिलाई मसीन म कपड़ा सिलय। उन्खर गिरस्ती ह बने चलत रिहिस। समय बड़ बलवान होथे। जादा काम बूता करत-करत वर्माजी के छाती म दरद उठे लगिस। पहिली त वर्माजी अउ शांति ह धियान नइ देइन। एक दिन बिहनिया वर्मा के छाती म दरद उठिस। वोहा अचेत परगे। शांति ह देखिस त दऊड़ के वर्मा जी तिर आईस। ओखर छाती ल रमजे लगिस। थोरिक बेरा म वर्मा जी ल होस आईस। दूनो झन रिक्सा म बइठके अस्पताल पहुंचिन। डॉक्टर ह जांच करके एक्सरा निकलवाइस। वोला खूब जांच करके बताइस के येखर छाती म बारीक छेदा हो चुके हे। आपपरेशन करे बर बड़े, सहर जाय बर परही। एमा एक लाख रुपए लागही। वर्माजी अऊ शांति अतका सुनिन त उन्खर पांव तरी के भुइंया खसकगे। हे भगवान, आपरेशन बर एक लाख रुपिया कहां ले आही? शांति के आंखी ले आंसू झरे लगगे। वर्माजी वोला किहिस- ‘तैं रो मत, मोला कुछु नइ होवय।’
अइसन करत दू महिना बीतगे। वर्माजी ह उधार बाड़ी करके 20 हजार रुपिया सकेलिस। शांति ह घलो कपड़ा सिलके 5 हजार रुपिया जमा करिस। पच्चीस हजार रुपिया त सकलागे फेर अभी 75 हजार रुपिया अऊ सकेलना हे। वर्माजी अउ शांति इही चिंता म रहंय। उंखर बेटी स्वाति ह बीस बछर के सुग्घर गोरी-नारी अऊ भरे देह के लड़की रहय। वोहा बीए म पढ़त रहय संग म कम्प्यूटर के ट्रेनिंग घलो करत रहय। वोहा, बाबूजी के दुख ल नई देख सकय। रोवत-रोवत अपन पलंग म गिर जावय।
वो दिन बसंत पंचमी रिहिस। स्वाति ह अपन मां के संग गायत्री मंदिर जावत रिहिस। रद्दा म वर्माजी के नानपन के दोस्त परकास बाबू के संग भेंट होगे। स्वाति ह वोला देखिस त पुकारिस- परकास अंकल, सुनव। परकास ह वोला चिन्ह डारिस, किहिस- ‘अरे स्वाति बेटी, मां संग कहां जावत हस। स्वाति ह बताइस के वोमन मंदिर जावत हे। शांति ल देखके परकास ह हाथ जोर के नमस्ते किहिस। वोमन मंदिर के सीढ़िया म बईठगे। स्वाति ह सबो गोठ ल बताइस।’ परकास ह सुनिस त बोलिस- स्वाति तोर बाबूजी मोर पक्का दोस्त आय। मेंहा सहर म रहिथौं, इहां थोरिक काम म आय हंव। तैं फिकर झन कर बेटी मेंहा तोर बाबूजी के आपरेसन बर 75 हजार रुपिया दुहूं। फेर एक ठन सरत हे के येहा न त कोनो करजा होही, न उधारी।
अऊ ये बात के चरचा ल काखरो संग झन करबे। वर्माजी ल घलो झन बताबे! ‘स्वाति ह अतका सुनिस त ओखर आंखी ले आंसू झरे लगिस। वोहा अपन आंसू ल पोंछके किहिस- परकास अंकल, आप मन कतेक महान विचार के मनखे आव। समय निकाल के घर कोती आहू।’
परकास ह तुरते सीढ़िया ले खडे होगे, हाथ जोर के सान्ति ल कथे- ‘भौजी, आप मन कोनो फिकर झन करव, सब ठीक होही। अच्छा, अब मेंहा जावत हंव। नमस्ते। सान्ति ह मन म सोचत रहय-अइसन मनखे मिलना ये जग म कठिन हे। छियालिस बछर के उमर होगे, अभी ले सादी तको नइ करे हे। सरकारी इसकूल म व्याख्याता हे। अकेला जिनगी काटत हे। तभे स्वाति ह दाई ल झकझोर के कथे- चल न मां मंदिर, अऊ का सोचत हस।’
वर्माजी दू हप्ता ले सहर के सरकारी अस्पताल म भरती ारिहिस। आपरेसन होगे। आपरेसन अउ दवई म सबो पईसा ह सिरागे। वर्माजी ह आपरेसन के बाद म अब्बड़ कमजोर होगे। मुस्कुल ले तीन महीना बीते ले एक दिन रतिहा ओखर छाती म जोर के पीरा उमड़गे। वर्माजी ह दरद म बियाकुल होके अपन छाती म हाथ धरे भुइंया म गिर परिस। ओखर मुंह ले खून के उल्टी होगे। वर्माजी अचेत परगे। सान्ति ह रसोईघर म रहय। थोरिक देरी म वोहा वर्माजी के खोली म आइस त वाला भुइंया म गिरे देखिस। सांन्ति ह बोमफार के रोये लगिस। परोसी मन घलो सकलागे। उही बेरा स्वाति ह इस्कुल ले पढ़ाके आईस। देखो-देखव होगे। डाक्टर ल बोलाइन। डॉक्टर ह नाड़ी देखिस। स्टेथिस्कोप लगाके छाती के धड़कन देखिस। आंखी ल देखिस, सबो ठण्डा परगे रहंय। डॉक्टर ह वर्माजी के सान्त सरीर म चादर ओढ़ा दिस। घर म कोहराम माचगे। सांन्ति अऊ स्वाति दुनो झन वर्माजी के तन ल पोटार के चिल्ला-चिल्ला के रोये लगिन। सांन्ति के हांसत-खेलत गिरस्ती ह उजरगे। किसमत के खेल ह रिकम-रिकम के रूप धरके आथे। परकास बाबू ह ये दुख म पूरा साथ दिस। वर्माजी के जाय के बाद सान्ति ह खाय पिये बर छोड़ दिस। एक दिन संझा जुवर स्वाति ह इसकुल ले घर लहुटिस त देखिस मां सान्ति ह वर्माजी के फोटू ल अपन छाती म पोटार के रोवत हे। घर म संझा के दिया बाती घलो नइ होय हे। स्वाति ह दिया बाती करिस। अपन मां ल समझाईस- ‘मां अपन आप ल संभाल, अब तैं कतको रोबे, बाबूजी ह कभू नइ लहुटय।’ अतका कहिके खुद मां ले लिपट के रोय लागिस।
परकास बाबू ह कभू-कभू छुट्टी के दिन उन्खर घर म आवय। स्वाति अऊ सान्ति ल समझावय। अइसन करत तीन बछर बीतगे। परकास बाबू के मदद ले स्वाति ह एमए करिस। बीएड के ट्रेनिंग करिस। वोला सहकारी स्कूल म लेक्चरर के नौकरी मिलगे। उन्खर घर के दसा ह सुधरे लगिस। इतवार के दिन परकास ह जब आइस त सान्ति ह कहिस- परकास बाबू, तुमन स्वाति बर कोनो अच्छा लड़का देखव। ये बछर ओखर बिहाव जरूर करना हे।
परकास ह किहिस- भौजी, मेंहा एक झन लड़का देखे हंव। उहू ह हाईस्कूल म लेक्चरर हे। मेहा बात करके बताहूं।
जब स्वाति ल पता चलिस के घर म मोर सादी के बात चलत हे। त वोहा उदास होगे। रतिहा अपन बिस्तर म परे-परे वो हा सोचत रहय के मोर ससुरार जाय के बाद मां ल कोन देखही। ओहा कइसे अपन जिनगी ल काटही। स्वाति के मन म सोचत-सोचत एक ठन बिचार आईस। वोहा मन म कुछु निरमय कर डारिस।
परकास बाबू ह बताइस के अवइया इतवार के स्वाति ल देखे बर वो लड़का ह आने वाला हे। सनीचर के रतिहा स्वाति ह सान्ति ल कथे- मां मेहा तोला छोड़के नइ जावंव। मैं हा सादी-वादी नइ करंव। तैंहा वोमन ल मना कर दे। सान्ति किहिस- ‘अरे पगली, बेटी के त सादी करे बर परथे। मोर किसमत म जोन होही मेंहा भोगहूं। तोला सादी त करना परही।’
स्वाति ह रिसा के कथे- ‘में सादी नइ करंव, नइ करंव।’ सान्ति ह अतका सुनिस त रोय लागिस। किहिस- ‘मेंहा तोर भलई बर कहत हंव बेटी। मोला अपन फरज निभावन दे।’
तभे स्वाति ह तुनक के कथे- ‘त ठीक हे मेहा अपन सादी करहूं फेर तोला मोर एक ठन बात माने बर परही।’
सान्ति ह किहिस- ‘बेटी, एक ठन काबर, तोर सौ ठन बात ल मानहूं। फेर बताबे तभे त।’
स्वाति- ‘मां तैंहा मोला वचन दे के तहूं ह मोर बात ल मान लेबे।’
सान्ति- ‘बेटी ये बता, आज तक तोर कोन बात ल नइ माने हंव। स्वाति ह मां ल पोटार के रोय लगिस। थोरिक बेरा म अलग होके कथे। मां मेंहा तोर दुख ल नइ देख सकंव। मेंहा तोर बेटा अंव। तोर पीरा तोर दुख अउ पहार कस बिपत ल समझथंव। बाबूजी ह अब कभू नइ लहुटय। ये जिनगी ह सिरिफ सुरता म नइ कटय ओ अम्मा। जिनगी म सबो ल हर उमर म कोनो साथी के सहारा के जरूरत परथे। जिनगी के एक-एक छन सहारा ह भगवान के दे हुए वरदान ये। ये ल हांसे जिए बर चाही। तैंहा परकास अंकल ल अपन साथी बनाले, ओखर संग सादी कर ले।’
सान्ति ह अतका सुनिस त बात ल कटाके कथे- ये तेंहा का उलटा-पुलटा गोठियाथस बेटी। ये उमर म सादी, दुनिया ह का कइही? स्वाति- मां, दुनिया त सिरिफ हांसे बर जानथे, वो हा काखरो दुख म काम नइ आवय। तैं हा अपन जिनगी के फिकर कर, दुनिया के चिंता झन कर।
‘तैं हा हां त कहिदे, मेंहा परकास अंकल ल मना डारहूं।’
सान्ति ह मुंह ले कुछु नइ किहिस, ओखर आंखी ह बरसे लगिस।
सान्ति ह पैंतालीस बछर के होगे रिहिस फेर वोहा खूब सुग्घर दिखय। परकास बाबू त पचास के उमर म जवान ले कमती नइ रहय। वोकर बिचार ह अब्बड़ ऊंच रहय। वो ह जात, धरम, उमर सबो ल ऊपर उठके मनखे के भावना अऊ बिचार ल महत्व देवय।
वो दिन जब परकास ह स्वाति के घर आइस त सान्ति ह अकेल्ला रहय। परकास संग वोहा अपन आंखी मिलाके बात करे म आज संकोच करत रहय। वोहा बने ढंग ले बात तको नइ कर पाइस। आज वोहा परकास ल दूसर नजर ले देखिस। रतिहा ओखर सपना म वर्मा जी ह दिखिस। किहिस- ‘सान्ति परकास ह मोर दोस्त आय। अब्बड़ सोझ अऊ सुग्घर मनखे। तैंहा अपन बर खुसी खोज ले। परकास संग सादी करले। मैंहा अब्बड़ खुस हंव।’ ओहा झकना के उठगे, रातभर नई सो पाईस। स्वाति ह परकास अंकल ल अपन बिचार बताइस त परकास ह वोला गला लगाके रोय लगिस। किहिस- बेटी स्वाति, तैं त जरूरत ले जादा समझदार होगे हस।
अक्ती के पबरित लगन म एके मंड़वा म स्वाति अऊ सान्ति के बिहाव होगे। सान्ति के उजरे गिरस्ती संवरगे। स्वाति के सुग्घर सपना ह सही होगे। बसंत के लहुटती अऊ ग्रीष्म के आती म गुलमोहर लाली चुनरी कस खिलगे।
आनन्द तिवारी पौराणिक
श्रीराम टाकीज मार्ग महासमुन्द

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