लोक कला के दीवाना रामकुमार साहू

ओ हर निचट गरीब परवार के रहीस। मोर इसकूल मा पढ़य। आज लइका मन ले ओ हर अलगेच रहीस हे। नानपन ले ओहर ‘लोककला’ के दीवान रहीस हे।
ओ बखत मैं हर स्व. दाऊ रामचन्द्र देशमुख के जबड़ लोकनाटक ‘कारी’ मा बिसेसर नायक के पाठ करत रहेंव तब ‘कारी’ खातिर रामकुमार साहू के दीवानगी हर मोला चकित कर देवय। ओला ये खभर मिलतीस के फलाना जघा कारी होवत हे। तब ओहर कइसनो करके ऊंहा हबरी जातीस। पोझिटया कला, दुर्ग निवासी रामकुमार ला एक घंव पता चलीस के ग्राम पैरी मा कारी होवइया हे। फेर बस मा जाय बर ओकर करा टिकिट के पइसा नई रहीस। तब अपन कुरथा ला गहना धरदीस ओ बइहा हर।
आज ओ हर अपन मिहनत ले खाता-पीता घर के सियान बन गे हावय। संगे संग बन गए हावै एक ठिक नामी पोठ लोक गायक। उही कलाप्रेमी संग एक कनी गोठ बात
केके चौबे : रामकुमार लोककला ले तोर पहिली जुड़ाव कब होईस?
रामकुमार – सरजी, मैं खानदानी कलाकार आंव। मोर बाबूजी नाचा में जनाना बनय। अउ मोर बड़े पिताजी परसिध्द तबलावादक रहीन। नानपन ले मैं हर अड़बड़ नाचा देखंव। ओ खानी रइपुर रेडियो म ‘सुर शृंगार’ पोरोगराम आवै। तऊन ला मैं बिना नांगा करे सुनंव। छठवीं किलास ले इस्कूल के कारियकरम मा अऊ गांव के नाटक मण्डली मा भाग लेवंव। एक घंव मोला परसिध कलाकार शिवकुमार दीपक जी हर ‘नवा बिहान’ वाले लोक गायक स्व. केदार यादव करा ले गीस। मैं हर ऊंकर संग मंच मा गीत गाय लगेंव।
फेर भाग जागीस। मैं आपके स्कूल मा, नवमी कक्षा मा भरती होयेंव। जिहां आपके दुरलभ संगत अऊ परसाद मोला मिलीस। मैं आज जिहां हावौ, आपे के दे संस्कार अऊ आसीरवाद के सुफल ये। सदगुरु के रूप मा आजो आप मन मोर प्रेरक, रद्दा देखोइया अऊ संकट मोचक आव।
आज तक तैंहर कोन-कोन परमुख कलाकार संग काम करे हावस?
– अब तक मैं हर ‘सोनहा बिहान’, ‘अनुराग धारा’, ‘चंदैनी गोंदा’, ‘लोक दर्शन’, ‘लोक रागिनी’ (रिखी छत्री) ‘मनमोहना’ (तीजन बाई) ‘गंगाजल’, ‘आमा मऊर’, ‘सोन चिरैया’, जइसे बड़का-बड़का पारटी ले जुड़ के शिवकुमार दीपक, केके चौबे, स्व. केदार यादव, साधना, भीखम धर्माकर, जयंती यादव, स्व. रवि कश्यप, रतन देवांगन, स्व. कमल नारायण सिन्हा, स्व. महासिंग चन्द्राकर, ममता चन्द्राकर, पुष्पलता कौशिक, कविता वासनिक, पद्मश्री गोविन्द निर्मलकर, स्व. सत्यमूर्ति देवांगन, मानदास टण्डन (प्रसिध्द चिकारावादक) मिथिलेश साहू, प्रभु सिन्हा, महादेव हिरवानी, कुलेश्वर ताम्रकार जइसे नामी कलाकार मन संग गीत नाचक अऊ पाठ कर डारे हावौ।
का फिलीम मा घलो काम करे हस?
– हव। आप मन विडियो फीचर फिलिम मैना अउ टेलीफिलिम जतन बनाय रहेंव, ऊंकर छोड़ ‘नवा अंजोर’, ‘चिकारा’, टेलीफिलिम मा घलो पाठ करे रहेंव। देवेन्द्र खण्डेलवाल के टेलीफिलिम ‘हकीकत’ मा घलो काम करे रहेंव जेखर परसारन दिल्ली दूरदर्शन अऊ सहारा चैनल मा होय रहीस। आकासवानी रयपुर बर नामी गीतकार अजय उस्ताद के गीत गाय हौं। पाछू बेरा ‘जी-24 घंटे’ चैनल मा मोर गाय गीत मन के परसारन होय रहीस हे। मैं हर अपन आडियो केसेट ‘मयारू दीदी’ निकाले हंव।
आज तक कोन-कोन बड़े जघा में कार्यक्रम देहे हावस?
– मैं हर छत्तीसगढ़ के जम्मो बड़का सहर मा तो गएच हों। ये मन के छोड़े नागपुर, इलाहाबाद, शिमला, उदयपुर, दिल्ली, अंडमान-निकोबार, भोपाल, आदिवासी लोक कला मंडल रविन्द्र भवन, भारत भवन, मा कार्यक्रम देहे हावौं।
आज के समय मा लोक-सांस्कृतिक मंच ला कोन रूप मा पाथस?
– आज ‘लोकरंग अनुराग धारा’, ‘चंदैनी गोंदा’, ‘दूध-मोंगरा’ जइसन कुछ मंच मन हमर लोक सांस्कृतिक परम्परा ला ध्यान मा राखत, हिरदे ला छू लेवैया, सदाबहार गीत प्रस्तुत करत हें। फेर कुछ कलाकार जेन मन ला या तो लोककला के कदर मालूम नई हे या कि समझ नई हे या अपन ऊपर भरोसा नई हे, उन मन ला ‘जनता के मांग’ के ओखी लगा के फूहर, दू अरथ वाले गीत अउ संवाद प्रस्तुत करत हावैं। येहर अड़बड़ फिकर के बात आय। सस्तउहा मनबहलाव वाले चार झिक दरसक के मांग ला देख के चार हजार बने- दरसक मन के सुग्घर रूचिला मैला करे के उदीम करई हर, भारी निन्दा के बात आय।’
मैं हर खुदे के पाल्टी ‘लोक सिंगार’ बनाय हावौं। हमन रविशंकर शुक्ल, बद्रीविशाल परमानन्द, मुकुन्द कौशल जइसन निन्धा अऊ पोठ साहित्यकार मन के गीद अउ पारम्परिक गीद मन ला गाथन जेन ल जनता रात-रात भर देखथे, सुनथे अउ सहराथे।
तोर रुचि कोन कला डहर जादा हावै?
– वइसे तो मैं हर गीत, नृत्य अऊ अभिनय मा रूचि रखथंव। फेर गीत में पारम्परिक गीत, कायाखण्डी भजन, चंदैनी, भरथरी, गोपीचन्दा, करमा, ददरिया, नचौड़ी गीत मा मोर जादा रुचि हावय। बांस, बसदेवा, भोजली जइसे गीत अब नंदात जात हें। ये गीत मन ला जिया के राखे के उदीम मा जथा सक्ति लगे रहिथंव। पारम्परिक पचरा, जंवारा गीत मन मा घातेच मोहनी हावय। इही मन मा देबी चढ़थें। आजकल के बनाय गीत मा नई चढ़य।
लोक मंच मा (बिसेस करके नाचा-गम्मत मा) आदमी कलाकार मन जऊन जनाना परी के रोल करथें वो हर मोला जादा भाथे। मन ला खुसी अऊ तसल्ली मिलथे। मोर ये पक्का बिचार हे के नाचा ला नाचा सैली मा ही करे जाय। आजकल के नावा किसिम के चलन, मोला नई भावय।
सब ले जादा सुख या दुख देवइया कोन कार्यक्रम सुरता हे?
– हव! कइसे भुलाहूं? धरमजयगढ़ मा पोरोगराम रहीस। सबो कलाकार हमन बेरा मा उहां हबर गेन। फेर गायक गायिका मन ला कोनो जरूरी काम के सेथी हमर ले पाछू आना रहीस हे। लेकिन रात के बारा बजगे। वो मन नई पहुंचिन। गांव वाले बगिया गे अउ हमर संचालक ला चारों मुड़ा ले छेंक डारीन। ओला थाना मा ले जाके बइठार दीन। आगू दिन घलो हमन ला रोक लीन अउ दिन भर खाना-पीना नई दिन।
दूसर दिन हमर गायक-गायिका मन आ गीन। रतिहा कुन हमर कारियकरम देहेन। देखके गांव वाले सन्न रहिगीन। मंच मा गीत, नाचा अउ गम्मत के अइसे तिरबेनी बोहईस के जम्मो देखइया ओमा चभरंग-चभरंग अस्नान करे लगीन। धूम मचगे। रात भर मगर होके मंतर मारे बरोबर कार्यक्रम ला देखीन तहां छेवर मा हमर संचालक मा फूल-माला मा लदक के माफी मांगे लगीन। भेंट मा चांदी के मेडल अउ तय रकम ले जादा पैसा खुसी-खुसी देईन। ये जघा हमला पीरा अउ आनन्द दूनो मिलीस।
तोर बिचार ले लोक कला के विकास मा कोन बाधा हावय?
– हमर संस्कृति विभाग मा असली लोक कला अउ लोक कलाकार के कदर करोइया कमी हावयं। सुवारथ अउ खुसामद के खेल चलत हे। बड़े-बड़े सरकारी कार्यक्रम मा अन्ते के गजल, फिल्मी गाना गवइया मन ला बला के ओमन के पोठ मान-गऊन करथें अउ हमर टुकुर-टुकुर देखत रहिथन।
दूसर बाधा हमरे कुछ छत्तीसगढ़ी कलाकार मन हावयं। ये मन ओरिजनल छत्तीसगढ़ी धुन अउ रिदम ला छोंड फ़िल्म छाप वाले फुहड़ अउ भदेस लगोइया गीत निरीत्य परोसथें। ये परबुधिया मन छत्तीसगढ़ी लोककला ला बिगाड़े मा अपन कोती ले थोरको कसर नई छोड़त हे। पइसा अउ नाम बर इन नंगरा नाच करत हे। खिलाड़ी मन ला तो सरकारी नौकरी मिली जाथे फेर कलाकार मन ला नई मिलय। मिली जाही त असली कलाकार ला छोंड क़े नकली कलाकार ला या सिरीफ महिला कलाकार मन ला।
कला के विकास खातिर, तैं हर का प्रयास करत हस?
– मैं हर अपन ‘लोक सिंगार’ पारटी ला माध्यम बना के पारम्परिक निमगा, सरूप वाले लोकगीत प्रस्तुत करथंव। मैं हर ‘रमायेन मण्डली’ घलोक चलाथों।
सासन ले का उम्मीद करथस?
सासन हर निराश्रित कलाकार मन बर पेंसन योजना चलाथें, ये हर बड़ सुग्घर बात ये। फेर येला पाए के उम्मर 60 बछर ले 45 बछर करना चाही। एक कोती तीजन बाई जइसे मन ला पुरुस्कार अउ पैसा मा लाद देवत हें उहुंचे कुलेश्वर ताम्रकार सरीखे लोक गायक के कोनो पुछारी नई हे। ओला दिन-रात चटनी-बासी के संसो मा परे ला परथे। रेडियो म पाछू जमाना के बड़का बांस गीद गायक कृष्ण कुमार यादव आज भीख मांग के पेट भरत हे। दूसर कोती भेलई ले रिटायर अउ पोठ हैसियत वाले साहित्यकार अउ कलाकार पेंसन उठावत हावय। इही ला कहिथे- ‘भरे ला भरे धुन, जुच्छा ला ढरकाय’ ये बेवस्था सुधरना चाही।
तोर मन के कोनो बात? कोनो पीरा? कोनो सन्देस?
– लोक मंच के कार्यक्रम बंद हाल या कि थियेटर मा नई होना चाही, खुल्ला मंच मा होना चाही जल जमो जन सधारन घलो देख सकंय। गायिका ममता चन्द्राकर ला ‘दाऊ रामचन्द्र देशमुख अभिमत’ सम्मान भेलई होटल मा दिए जात रहीस हे। यहूं खुसी-खुसी देखे बर गेंव। फेर मोला दुआरीच कर ले गार्ड हर भगवार दिस। मोला अइसे लागीस के जानो-मानो पनही खा के लहुटत हों।
के.के. चौबे
गयानगर दुर्ग

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