विकास के कीमत तो चुकाय ल परही

ये तथ्य ल सबो जानथे के धरती के इतिहास कतक पुराना हे। अउ अभी तक के ज्ञात इतिहास में धरती कतका परिवर्तन झेल चुके हे। जउन भी परिवर्तन होय हे फटाक ले नी हो गे हे। ओ परिवर्तन में हजारों-लाखों साल लगे हे। केहे के मतलब परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे होथे। अभी कुछ दसक ले हमर धरती म परिवर्तन होये के शुरुआत हो गे हे। मोर इसारा धरती के तापमान बाढ़े म कोती हे। हमला सोचना हे हमर धरती के तापमान में बढ़ोतरी काबर होवत हे? का ए हमर विकास के कीमत तो नो हे? अभी केहे जा सकथे के मानव जाति सभ्यता के सबसे ऊंच सिंघासन म बइठे हे। दुनिया के विकास घलो चौमुखी होय हे। मानव, जाति, जल, थल, नभ तीनों में अपन झण्डा गड़ा चुके हे। फेर प्रकृति के चक्र कभी रूकने वाला थोरे होथे। विज्ञान बताथे के धरती घलो शुरू में आग के गाोला असन गरम रहिसे। ओखर ठंडा होय में हजारों-लाखों साल लगगे। फेर दुनिया में जीव के पैदाइस होइस। अति सूक्ष्म जीव ल लेके डाइनासोर के युग होइस। मानव जाति के विकासेच ह लाखो साल के इतिहास आय।

धरती के सुरू ले लेके आज तक के इतिहास बताए म कतका पेज लग जाही। इतिहास ल छोड़ो अउ विकास डाहर आव। ए विकास के कीम्मत आय जउन ल आज हमन जलवायु परिवर्तन काहत हन। विकास के नाव म हमन ये धरती म का परयोग नी कर डारेन, हमर मारे काय बांचे हे। का जमीन, का जंगल, का पहाड़, का पानी अउ का हवा, जेन ल हम पर दूसित नई करेन? प्रकृति के संतुलन ल बिगाड़े म हमर मानव जाति ल छोड़ कोनो दूसर ल दोस नई दे जा सके।

पहिली हमर देश म तीन ठन ऋतु होवे। वर्ष के, ठंड के अऊ गरमी के। अब लागथे एके ठन ऋतु बांच जही। सिरिफ गर्मी के ऋतु। कतको झन कथे के तीसरा विश्वयुध्द होही तो दुनिया खतम हो जाही। फेर मोर कहना हे, के तीसरा विश्वयुध्द म खतम नहीं होही त जलवायु परिवर्तन म अवश्य करके खतम हो जाही। ये जलवायु परिवर्तन अभी तक के हमर विकास के कीमत आय जेन ल हमला चुकाय ल परही अउ मानव जाति के रक्छा करे बर यदि ये जलवायु परिवर्तन ल रोकना हे तो विकास के परिभाषा ल घलो बदलना पड़ही। नीही ते प्रकृति ल घलो अपन तराजू म तऊले ल आथे अउ ओखर तउल म कमती जादा के कोनो गुंजाईस नी राहय। अब हमला सोचना हे, के हम चेत जान या प्रकृति ला तराजू धरे के मउका देना नइए। नहीं ते प्रकृति के चक्र पूरा होय म जादा देरी नी लगे अऊ धरती फेर आग के गोल बन जही।

दिनेश चौहान
शीतलापारा
नवापारा राजिम

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