शिवरीनारायण के मेला

इहां एक शिवलिंग हावय। ऐसे कहे जाथे के ये शिवलिंग म सवा लाख छिद्र हावय। येमा सिक्का डाले ले सिक्का के आवाज तो आथे फेर वो हर कहां जाथे ये रहस्य हावे। इहां माघ पूर्णिमा ले महाशविरात्रि तक मेला भरथे।
शिवरीनारायण नाम में ही भक्त अउ भगवान के मिलन के बात हे, त एखर पौराणिक महत्व अउ इतिहास भी बहुत हेवय शवरीन दाई अउ ओखर भगवान राम के कहिनी कथे शवरीनारायण हर, इही जघा म तो शवरीन दाई जेन हर संवरा जाति के रसहि, अपन गुरुदेव मतंग मुनि के आसरम में अपन स्वामी श्रीराम के प्रतीक्षा करत अपन पूरा जीवन ल बीता दिस। अइसे कहे जाए कि त्रेतायुग म जब रावण हर सीताजी के हरण करके ले गिस त भगवान श्रीराम अउ ओखर भाई लक्ष्मन, सीताराम के खोज करत इहां आए रहिन हेवय, इहां शवरी हर अपन स्वामी राम के रस्ता देखत रोज रस्ता म फूल बिछावय अऊ तरह-तरह के कन्द-मूल तोड़ के रखे रहय, फेर एक दिन भगवान ह सीताजी ल खोजे के बहाना अपन भक्त ल दरशन देहे बर आथें तब शवरीन दाई हर कतका भाव विभोर होगे कि भगवान ल खट्टा बोईर मत मिल जाए कहिके चिख-चिख के मीठ्ठ बोईर भगवान ल देथे अउ भगवान हर बड़ प्रेम भाव ले खाए लगथे। कहे जाथे कि जेन पेड़ पान म शवरीन दाई हर बोईर ल रखे रहिस हेवय, ओ पेड़, हर आज भी बड़े मंदिर के अंगना म हेवय, ओ पेड़ के पान के आकृति हर तरी ले बंधे हुए दोना जइसे हे, ओ पेड़ के नाव कृष्णकली कहे जाथे। शवरीन दाई ल इहें अपन स्वामी के दरशन होइस अउ मोक्ष के प्राप्ति भी इहें होइस। त एखरे बर ये जघा के नाम शिवरीनारायण होइस, ये सब के सेती एखर महत्व भी अब्बड़ हावय। साथेंच में तीन नदी के संगम घलोक हावय। जोंक नदी, शिवनाथ नदी अउ छत्तीसगढ़ के सार नदी महानदी। कतेक जुन्ना सियान मन हर ये जघा ल शिवरीनारायण नई कहीके शवरीनारायण ही बोलथे। वइसे ये नाव हर असली नाम हरे, शिवरीनारायण तो कालांतर में हो गिस। खडे रइके सब झन ल देखत अउ बलावत रथे, अपन आशीर्वाद देहे बर। जघा-जघा के मनखे उहां पहुंचे।
नर-नारायण मंदिर के अलावा इहां मां अन्नपूर्णा के मंदिर भी हेवय जहां भगवती अन्नपूर्णा द्वापर युग से इहां विराजमान हे इहां भी दरशन करोइया मन के अब्बड़ भीड़ रथे अउ बहुत मात्रा में इहां अखण्ड योति कलश भी जलथे। अइसे कहे जाथे कि इहां के चावल ल ले जाके अपन कोठी या भंडारा म डाल दिए जाए तो ओ हर कभी भी खाली नई होवय एखरे कारण आस-पास म कहूं-कुछू काम धाम या भंडारा होथे त कतेक झन मन अन्नपूर्णा मां ल नेवते बर आथें अउ इहां के परसाद वाले चांउर ल अपन साथ ले जाथे। मां अन्नपूर्णा ओमन ल निराश नइ करय।
मेला के आखिर दिन यानि की महाशिवरात्रि के दिन श्रध्दालु मन खरउद (खरौद) म स्थिति लक्ष्मणेश्वर मंदिर म जाथे, इहां तो महाशिवरात्रि के पहिली रात ले जो लइन लगे रथे, दरशन बर तेन हर महाशिवरात्रि के आधा रात तक रथे। इहां कतेक झन मन लखहर (सवा लाख चावल) चाउर चढ़ाथे अउ तिली घलोक। इहां जेन भगवान शंकर के जो लिंग हवय ओखर छिद्र के संख्या सवा लाख हे, अइसे कहे जाथे कि एमा सिक्का डाले ले, सिक्का के आवाज तो आथे फेर ओ हर कहां जाथे ओ हर रहस्य हावे। श्रध्दालु मन बहुत श्रध्दा के सब पूजा पाठ करथे। फेर इहां शंकर भगवान के पूर्ण परिक्रमा नई करे जाए। इहां भगवान के अर्ध परिक्रमा ही किए जाथे, इहां भी छोटे-बड़े मंदिर के साथ अब्बड़ संख्या म तालाब हे जेन ह अपन कहानी छिपाए हावय।
मेला हर माघ पूर्णिमा से चालू होके महाशिवरात्रि के दिन तक चलथे अउ श्रध्दालु मन भगवान शंकर के पूजा पाठ करके लहुटथें अगले साल के मेला के कल्पना करत अउ ओखर बात करत।
सीमा ऋषि शर्मा
मुकाम व पोस्ट- तुमगांव
तह.व जिला महासमुन्द

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2 comments

  • शकुन्तला शर्मा

    सीमा ! बहुत बढिया आलेख लिखे हावस । शिवरीनारायण अऊ खरौद हर न हमर गॉंव ‘ कोसला ‘ के तीर म हावय प्रसिध्द उपन्यासकार अऊ इतिहासविद् आचार्य चतुरसेन शास्त्री हर , अपन प्रसिध्द उपन्यास ” वयम् रक्षामः ” म खरौद ल खर अऊ दूषण के राजधानी बताए हावय । एहर वोही जगहा ए जिहॉ लखन जी हर महादेव के स्थापना करिन , तेकरे सेती वोहर लखनेश्वर महादेव के नाव ले जाने जाथे ।

  • jojwagautam

    सुघर लेख बार गड़ा अकन बधाई. लेकिन अतका बढ़िया धार्मिक जगह के साफ सफाई ल देख के रोना भी आथे. एक बात आउ इन्हे नहीं कहूँ भी शंकर भगवन के मन्दिर के पूरा परिक्रमा नई करे जाय.

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