श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – ‘फुटहा दरपन’ अउ ‘मनखे मर गे’


फुटहा दरपन

हरियर छइहाँ हर उदुप ले हरन हो गे
तपत, जरत-भूँजात पाँव के मरन हो गे।
घपटे रहि जाथे दिन-दिन भर अँधियारी
अँजोर के जब ले डामरीकरन हो गे।
कुकुर मन भूकत हवें खुसी के मारे
मनखे मनखे के अक्कट दुसमन हो गे।
जउन गिरिस जतके, ओतके उठिस ओ हर
अपत, कुलच्छन के पाँव तरी धन हो गे।
करिन करइया मन अइसन पथराव करिन
मन के दरपन हर फुटहा दरपन हो गे।
का करे साँप धरे मेचकी-अस जिनगी हर
निचट भिंभोरा-कस मनखे के तन हो गे।

मनखे मर गे

दाना-दाना बर लुलुवावत मनखे मर गे
खीर-सोंहारी खावत-खावत मनखे मर गे।
का ला कहिबे, का ला सुनबे, का ला गुनबे
पर धन ला बइठे पगुरावत मनखे मर गे।
पीवत-खावत अउ मेछरावत मनखे मर गे
धारन रोवत अउर करलावत मनखे मर गे।
नइये कहूँ गरिबहा के कोनो मनराखन
गुन-हगरा मन के गुन गावत मनखे मर गे।

लाला जगदलपुरी

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