श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – रतिहा

पहाड़-कस गरू हवय अँधियारी रतिहा
टोनही बन गे हे एक कुआँरी रतिहा।
बने रद्दा ह बने नइ लागय मनखे ला
कोनो ला नइ दय कोनो चिन्हारी रतिहा।
भिम-अँधियार के गुन गावत हे गुनवंतिन
अँजोर के करथय बहुंते चारी रतिहा।
अँगठी फोरथे दुखाही ह चच्चर ले
सरापथे दिन ला, देथय गारी रतिहा।
अब्बड़ रोवत हें खोर-खोर कुकुर मन
निचट जनावत हे असगुन भारी रतिहा।
नइ मिलय नींद के कहूँ आरो बसती मा
अइसन धमकाथे नयन-दुआरी रतिहा।
कहूँ सिरोतन के कदर नइये सँगवारी
अइसन फरकाथे गोठ लबारी रतिहा।
कतको करवाथे अलिन-गलिन बटमारी
बेधड़क भोगे बर महल-अटारी रतिहा।
झटकुन बासो रे कुकरा हो सुरुज बर
करिया मुँह तब करही ए कारी रतिहा।

लाला जगदलपुरी

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