श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – धन-पसु

पेट सिकन्दर हो गे हे
मौसम अजगर हो गे हे।
निच्चट सुक्खा पर गे घर
आँखी पनियर हो गे हे।
हँसी-खुसी के रद्दा बर
बटमारी घर हो गे हे।
मया-दया के अचरा के
जिनगी दूबर हो गे हे।
दुसमन तो दुसमन होथे
मितान के डर हो गे हे।
पसु-धन के चारा चर के
धन-पसु हरियर हो गे हे।
बाढ़िस खेती भाँठा के
आसा बंजर हो गे हे।

लाला जगदलपुरी

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