श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – का कहिबे?

मन रोवत हे मुँह गावत हे का कहिबे
गदहा घलो कका लागत हे का कहिबे?
अब्बड़ अगियाए लागिस छइहाँ बैरी
लहँकत घाम ह सितरावत हे का कहिबे?
खोर-खोर म कुकुर भूकिस रे भइया
घर म बघवा नरियावत हे का कहिबे?
छोंरिस बैरी मया-दया के रद्दा ला
सेवा ला पीवत-खावत हे का कहिबे?
चर डारे हे बखरी भर ईमान ला
कतका खातिस पगुरावत हे का कहिबे?
सावन-भादों बारों मास गरिबहा के
लकड़ी-कस मन गुँगुवावत हे का कहिबे?

लाला जगदलपुरी

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One comment

  • रमेशकुमार सिंह चौहान

    जम्मो शे’र एक ले बढ के एक हे । कतका सुघ्घर शब्द अउ ओखर ले सुघ्घर भाव वाह मजा आगे

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