संस्कृति बिन अधूरा हे भाखा के रद्दा

भाखा के मापदण्ड म राज गठन के प्रक्रिया चालू होए के साथ सन् 1956 ले चालू होय छत्तीसगढ़ी भाखा ल संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल करे के मांग आज तक सिरिफ मांग बनके रहिगे हवय। अउ लगथे के ए हर तब तक सिरिफ मांगेच बने रइही, जब तक राजनीतिक सत्ता म सवार दल वाला मन के कथनी अउ करनी एक नइ हो जाही। काबर ते ए बात ल अब तक हर पढ़े-लिखे मनखे समझगे हवय के छत्तीसगढ़ी स्वतंत्र रूप ले एक समृध्द भाषा आय, जेकर शब्‍दकोश हे, व्याकरण हे, करोड़ों के संख्या म वोला बोलने-चालने वाला हें। कोनो भी भाखा ल संवैधानिक दरजा दे बर अतका अकन योग्यता (विशेषता) ह काफी होथे। तभो एला संवैधानिक मान्यता नइ मिलत हे, त एकर असल कारण राजनीतिक सत्ता म बइठे लोगन के कथनी अउ करनी के भेद हर आय। कथनी-करनी के भेद ए सेती काबर ते ए मन जब सत्ता म बइठे रहिथें त भाषा आन्दोलन डहर आंखी उठा के तक नइ देखयं, अउ जब सत्ता ले फटीक दिए जाथें त खुदे भाषा के नांव म मशाल धरके खड़ा हो जाथें। ए ह कोनो भी राजनीतिक पार्टी के बात होय, सबके एकेच हाल हे। छत्तीसगढ़ी ल संवैधानिक रूप ले भाषा के दरजा नइ मिल पाय के एहर तो राजनीतिक कारण होइस। फेर मोला लागथे के ये आन्दोलन ल जन-जन के आन्दोलन बनाय खातिर एकर संग इहां के मूल संस्कृति अउ धरम-करम ल घलो संघारे बर लागही। 
अभी तक ये देखब म आथे के हम छत्तीसगढ़ी भाखा के बात तो करथन फेर जब संस्कृति के बात आथे त इहां के मूल संस्कृति ल छोड़ के उत्तर भारत के संस्कृति ल अपन बताये बर धर लेथन। जे मन इहां के संस्कृति के वास्तविक रूप ल जानथें वो मन अइसन किसम के दोगलई बात ल सहे नइ सकयं, एकरे सेती उन भाषा आन्दोलन डहर मुंह उठाके तक नइ देखयं। ए बात ल सब जानथें के इहां जतका भी धारमिक ग्रंथ हें वो सब उत्तर भारत ले ही इहां आय हे, अउ एकरे सेती वो सबो म उत्तर भारत के ही संस्कृति समाए हुए हे। जब हम छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढिय़ा के बात करथन त ए निश्चित हे के हमला इहां के मूल धर्म अउ संस्कृति के घलोक बात करना चाही। तभे भाषा आन्दोलन खातिर हमर ईमानदारी ह स्पष्ट हो पाही। एक डहर हम स्थानीयता के बात करबो अउ दूसर डहर उत्तर भारत के धारमिक संस्कृति अउ साहित्य ल मुंड़ म लाद के किंजरबो त कोन हमर मन ऊपर भरोसा करही, अउ जब हमरे आदमी हमर ऊपर भरोसा नइ करही त हमर संग जुड़ही काबर? 
अभी तक मैं कई ठन लेख के माध्यम ले ये बात ल प्रमाणित कर डारे हवंव के हिन्दुत्व के नांव म हमला जेन भी साहित्य उपलब्‍ध करवाए जावत हे वो सबो ह उत्तर भारत के संस्कृति ऊपर आधारित हे, छत्तीसगढ़ के संस्कृति ऊपर नहीं। एकरे सेती अइसन कोनो भी ग्रंथ या साहित्य ल छत्तीसगढ़ी संस्कृति के मापदण्ड के रूप म स्वीकार नइ करे जा सकय। सांस्कृतिक स्वरूप के भिन्नता के उदाहरन खातिर मैं एक छोटकुन बात ल आपमन के आगू म फेर रखना चाहहूं। अब जइसे चातुर्मास के बात हे, त हिन्दू धर्म के मुताबिक चातुर्मास (सावन, भादो, कुंवार, कार्तिक) ल कोनो भी मांगलिक कारज खातिर शुभ नइ माने जाय। एकर कारन ए बताए जाथे के ये चारों महीना म देवता मन सूते रहिथें या विश्राम करत रहिथें। 
अब आवौ ए चातुर्मास ल हम छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के मापदण्ड म देखिन। पूरा छत्तीसगढ़ कार्तिक अमावस्या के दिन (देवारी म) गौरा पूजा के पर्व मनाथे। गौरा पूजा म का होथे? भगवान शंकर अउ देवी पार्वती के बिहाव होथे। भगवान के ये बिहाव पर्व ल इहां पूरा रीति-रिवाज के साथ मनाए जाथे, जेकर बारे म अउ जादा बताना अनावश्यक होही। अब सोचौ के जेन छत्तीसगढ़ म कार्तिक अमावस्या के भगवान के बिहाव के पर्व मनाए जाथे, वो छत्तीसगढ़ ह ए बात ल काबर मानही के चातुर्मास म देवता मन सूते रहिथें, एकरे सेती ए महीना म कोनो किसम के मांगलिक कारज (बर-बिहाव) नइ करना चाही। हिन्दू धरम (उत्तर भारत के संस्कृति) के अनुसार देव उठनी माने कार्तिक महीना के शुक्ल पक्ष के एकादशी तिथि के पहिली तक मांगलिक कारज म प्रतिबंध हे, जबकि शिव-पार्वती बिहाव (गौरा पूजा) परब देवउठनी के दस दिन पहिली माने कार्तिक अमावस्या के होथे। अब आपे मन बतावौ के का इहां धर्म के नांव म जेन साहित्य उपलब्‍ध करवाए जावत हे, का वोमन ल छत्तीसगढ़ के संस्कृति के मापदण्ड म लिखे गे हवय? अउ यदि छत्तीसगढ़ के मापदण्ड म नइ लिखे गे हवय त फेर इहां के संस्कृति ल घलोक भाषा आन्दोलन संग शामिल काबर नइ करे जाना चाही? निश्चित रूप ले शामिल करे जाना चाही, तभे जम्मो किसम के स्थानीयता खातिर हमर ईमानदारी ह जगजग ले दिखही।
सुशील भोले
सहायक संपादक – इतवारी अखबार
41191, डॉ. बघेल गली
संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर

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