समारू के दु मितान कालू-लालू

Hemlal photoये कहानी हा हमर छत्तीसगढ़ के किसान अऊ ओकर मितान बईला के हरय। कईसे येक किसान हा अपन मितान ला जतन के रखथे त ओकर मितान बईला हा ओकर कईसे साथ देथे। ऐकठन गाँव मा बड़ गरिबहा किसान रहाय ओ किसान के नाम रहय समारू। समारू ह बड़ गरीब रहय बेचारा हा बनी करके खाय कमावय। समारू घर दुठीन गाय रहय दोनो गाय हा गाभीन तको रहय। समारू हा अपन लक्ष्मी के सेवा जतन बड़ सुघ्घर करय। समारू हा अपन कोनो गरवा ला कभू नी बाधय हमेशा ओला कोठा मा खुला बिन दरवाजा के राखय गरवा मय तको खाये पिये ला पावय त कहा ले भागय। समारू हा ऐकदिन अपन बाई मेरा गाठियाथे हमर गाय मन बछवा पिला दे देतिज त हमर भाग लहुट जातीज हमर गरिबी दुर हो जातीज समारू घर के तको कहय मोर तो उही आस हे लक्ष्मी दाई मेरा। कुछ दिन बाद दुनो लक्ष्मीदाई हा जनमगे सही मा दोनो गायमन बछवा पिला जमने रहय। दुनो गाय के बछवामन बने टन्नक रहय दिखे मा मार हटटा गोट्टा रहय एकठन हा करिया रहय त एकठन हा लाल समारू हा दोनो बछवा के नाम धरिच कालू अऊ लालू । समारू हा अपन बछवामन के खुब मन लगा के सेवा जतन ला करथे धीरे धीरे दिन बादर हा गुजर गे अब कालू आऊ लालू ला बछवा ले बईला बनगे रहय मार जवान बाड़हे पोड़हे लईका होगे रहय। अब समारू हा अपन बछवामन ला बने सीखो पड़हो के बईला बनईस। कालू अऊ लालू हा सिरतोन मा मार गुनकारी बईला बनगे राहय। बपरा समारू के भाग जागे राहय अब दुनो ला अपन मितान कस रखय अऊ पहली ले जादा मया करय सेवा जतन खूब करय। अब दोनो कालू अऊ लालू नागर गाड़ी फादे के लायक होगे राहय अऊ दोनो सीख घलोगे राहय दुनो ममा भाचा कभू अलाल नी रहय गा। समारू हा अपन मितान कालू अऊ लालू के बल मा बने अक ले अधीया ले रहय फेर दुनो बईला समारू के आस ल निरास नी करीच समारू के नागर-बतर, बर-बियासी सबो ला बने-बने निपटा डरिच कालू अऊ लालू दुनो बईला ला धरके गोटिया घर सापर मे गे राहय लालू अऊ कालू दुना छोटे छोट तो राहय गोटिया घर के बईला मन देख के हासय ये काल के लईका हमर संग कहा पुरही कहिके ये सुन के कालू ला गुस्सा आगे फेर गुस्सा मा काबू रखके कहिथे बुता करे मा छोटे बड़े के जरूरत नी पड़ये जागर के जरूरत पड़थे। सिरतोन मे ओ दिन दुनो बईला हा खुब रेगिच अऊ गोटिया के बईला मन ला घलो हैरान कर दीस गोटिया के बैईला के बरोबर कमाईच त गोटिया के बईलामन के माथा ओरम गे। लालू -कालू अऊ समारू के मेहनत ले ऐ साल के नागर-बईला ला बिसाये के जरूरत नई पड़ीच समारू हा बतर-बियासी, ननई-डाहराई, मिसई-धरई के खरचा ले ऐसाल बाच गे राहय। समारू के तो ये साल भाग जागे राहय काबर कालू-लालू , ममा-भाचा अऊ समारू तीनो झन के खुन पसीना के कमाई ले खुब धान होये हराय अऊ तीनो झन खुब बनी करे राहय बतर-बियासी, ननई डाहराई मा समारू के घर मा तो धन के बरसा होग रहय। आस-परोस मा खुब छाये रहय तीनो झन के गोठ हा अऊ समारू भी हा अपन बईला मन के खुब सेवा जतन करय अपन बेटा बरोबर राखय। एकदिन के बात ये समारू हा अपन बाई संब गाँव गे राहय। घर के कोठामा कालू अऊ लालू अऊ उकर दाई मन राहय कोठा मा फईका कभू नी लगावय समारू हा। येही मौउका ला देख के चोर मन उही दिन समारू घर चोर मन चोरी करे ला समारू घर आथे तारा ला ताड़ के समारू घर चोरी करे ला घूसथे पर लालू अऊ कालू ये सबो ला देखत रहिथे। जैसे ही चारे मन घर मा घूसथे त लालू अऊ कालू दुनो झन ममा भाचा मिलके ऐतका पटक -पटक के मारथे की चोर मन के बया भुलाजाथे उठ के बैईठ नई सके कइसनो करके अपन जान ला बचो के सबो चोर लटटे पटटे ल भागते अऊ कान ला चिपथे की आज की बाद चोरी कभू नी करन कहिके काबर बईला के मारे ले सबो चोर मन के हाथ गोड़ हा टूट गे रहिथे। जब समारू हा गाँव ले अपन बाई दुनो आथे त सब ला देखथे अऊ रोवत रोवत अपन दुनो बईला के गला लग जाथे अऊ कहिथे सबो ले बड़े तो मोर धन तुमन हारव तुहर रहत ले मैं जिन्दगी भर भुख नी मरव आज हमर धन के रक्षा करय अऊ ये धन तको तुहरे कमाये हरे सच मे आज साबित कर दे हव बईला हा किसान के सच्चा मितान हरे तेला। आदमी मन तको ऐतका मितानी ला नी निभाववय जेन तुम दुनो निभाये हाव ।
ये सचहे जेन किसान अपन मितान बईला के सेवा जतन तनमन ले करथे अऊ अपने बेटा जैइसन रखथे ओकर घर के बईलामन भी ओकर काम मा हाथ तनमन ले बटाथे अऊ जियत भर ओकर साथ ला देथे। ईही बात ला सियानमन कथे जईसन जईसन बोबे तईस तईस पाबे। जागर ला पेरबे त सुख ला पाबे।

हेमलाल साहू

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4 comments

  • Mahendra Dewangan Maati

    बहुत अच्छा काहनी हे संगवारी एकर बर आप मन ल गाड़ा गाड़ा बधाई |

    • हेमलाल साहू

      अपमान ल बहुत बहुत धन्यवाद जो हमर कहानी ल पसंद करेव
      एकर बार हम आभारी हन। जय जोहार

  • chhattar gavde

    आपमान के रचना बहुत बड़िया हे भैया आपमान ल बहुत बहुत धन्यवाद जो छत्तिसगढ़ी मे लिखेव । जय जोहार राम राम

    • हेमलाल साहू

      आपमन ल भी बहुत बहुत धन्यवाद भैया जोन हमर रचना ल पसंद करेव । राम राम जय जोहर पाहुचत हे स्वीकार करहु । छत्तर गवडे जी

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