साला छत्तीसगढि़या

‘‘इसकुल खुले महिना भर हो गे, लइका ह रात दिन रेंध मतावत हे, तंय का सुनबे? तोर कान म तो पोनी गोंजा गे हे। पेन-कापी लेय बर कहत हे, ले नइ देतेस।’’ देवकी ह अपन नंगरिहा रतनू ल झंझेटिस।
रतनू ह कहिथे – ‘‘हित लगा के दू कंवरा बासी ल तो खावन दे भगवान। पेन-कापी ह भागत थोरे हे। कालिच बांवत उरकिस हे। हांथ म एको पइसा नइ हे। खातू-दवाई घलो अभिचे लेना हे। निंदइ-कोड़इ ल आन साल जुर मिल के कर डारत रेहेन, फेर पर साल ले तो बन-झार के मारे खेत ह पटा जाथे। एसो कोन जाने का होही? बनिहार लेगे बर झन परे। इही ल कहिथे, ‘दुब्बर बर दू असाड़।’ करंव ते का करंव, तिंही बता?’’
देवकी ल कुछू कहत नइ बनिस। अपन गलती ल संवास के वो ह चुप हो गे। थोरिक देर दुनों झन एक दूसर के रोनहू सूरत ल करलइ अकन देखत रहि गें। अइसन म कइसे बनही? देवकी ह अपन जी ल कड़ा करके कहिथे – ‘‘जउन होना होही, होवत रहही, फिकर काबर करथो। हित लगा के बासी ल तो खा लेवव। महूं अड़ही, जकही-भुतही सरीख, बिना गुने अलकरहा कहि परथों। नराज झन होय करो।’’
रतनू – ‘‘काबर नराज होहूं राजेस के मां। तोला का सुख देवत हंव कि तोर बर नाराज होहंव। फेर का करंव, एक फिकर छूटे नहीं कि दस ठन ह अउ मुंह फार के खड़े रहिथे। एकरे सेती टांठ भाखा निकल परथे।’’
जोंड़ी के मुंह ले अतिक सुघ्घर मया के गोठ सुन के देवकी के मन गदगद हो गे। फेर घर के जुच्छा कोठी के सुरता करके अउ रतनू के अइलहा मुंहरन गढ़न ल देख के वोकर आंसू बोहाय लगिस। अंचरा के कोर म ढरत आंसू ल कलेचुप पोंछ के कहिथे – ‘‘कइसे तुंहर मुंहूं-कान ह अइलहा अइलहा दिखथे? जर-बुखार धरे होही ते सूजी-पानी नइ लगवा लेतेव।’’
‘‘दु-चार दिन हो गे हे राजेस के मां, सुस्ती-सुस्ती कस लागथे। गोड़-हाथ घला पिराथे। नांगर-बक्खर के दिन म का आदमी ल कहिबे, का बइला-भंइसा ल कहिबे, सबके रगड़ा टूट जाथे। हफ्ता पंदरा दिन के बात रहिथे। फेर तो अरामे अराम रहिथे। तंय फिकर काबर करथस, मोला कुछू नइ होय हे।’’ रतनू ह अपन गोसाइन ल ढाढस बंधाइस।
देवकी ह झिचकत झिचकत कहिथे – ‘‘नांदगांव वाले साहेब बाबू ह काली सांझ के आय रिहिस। कहत रिहिस के भइया ह अपन खेत ल जोंत डरिस होही त हमरो खेत ल बों देतिस। हर साल तुंहिच मन तो कमाथो। भइया के रहत ले मंय कोनों दूसर ल नइ तियारों।’’
‘‘तब तंय का केहेस राजेस के मां ?’’ रतनू ह टप ले पूछथे।
‘‘का कहितेंव, तुमला पूछे बिना। एसो भर हो गे हे तुंहर बदन ह झुकते जावत हे। वइसने हाल बइला मन के हे। सब डहर सोंच के बक्का बंधा गे।’’ देवकी ह कहत कहत बोटबिटा गे।
रतनू – ‘‘दू चार दिन भाड़ा कमा लेतेंव ते हाथ कच्चा हो जातिस। आज बुधवार ए। बिरस्पत, सुकरार अउ सनिच्चर, तीन दिन के कमाय ले लइका के कापी-किताब के पुरती हो जातिस। इतवार के दिन नांदगाव के बजार चल देतेंव।’’
महिला मन के बुध्दि ह जादा सरल रस्ता खोज लेथे। देवकी ह कहिथे – ‘‘नांदगांव घूमे के संउक लगे हे नइ कहव। गांव के गंउटिया दुकान म तो घला पेन कापी मिलथे। उंहे नइ ले लेहव। किताब तो इसकुल डहर ले मिलिच गे हे।’’
रतनू – ‘‘बने कहिथस राजेस के मां। पाछू साल गंउटिया दुकान म लेय रेहेंव। छपे कीमत ले आना दू आना कम कर के देय रिहिस। पान बिड़ी के पुरती अउ छोड़ाय रेहेंव। ये तो छोटे दुकान ए। नांदगांव के बड़े दुकान मन म लेय से रूपिया दू रूपिया अउ बच जाही। इही सोंच के नांदगांव जाहूं कहत हंव। तंय कहिथस घूमे के संउक लगे हे। जब गोठियाबे उल्टच गोठियाबे।’’
‘‘जानत हंव फेर मोर बर का लाबे?’’ कहिके देवकी ह मुच ले हांस दिस।
रतनू – ‘‘नांदगांव के गोल बजार ल।’’
देवकी ह रतनू कोती कनखही देख के जिबरा दिस। रतनू के हिरदे म घला मया उमड़ गे। कहिथे – ‘‘तोर बर करधन अउ पैरपट्टी बनवाहूं कहत कहत जिनगी बीत गे। फेर ए साल भगवान ह बने बने पानी बादर दे देही ते जरूर बनवाहूं।’’
इतवार के दिन। रतनू ह बिहिनिया ले नहां धो के बासी-पेज खा के तियार हो गे। पंदरही हो गे हे, सायकिल के पीछू चक्का भरस्ट होय। बनवाय बर मिस्त्री तीर लेगे रिहिस। टैर-टूब कंद गे हे कहिके नइ बनाइस। अब अढ़इ-तीन सौ रूपिया वो कहां ले लातिस। वइसने के वइसने माड़े हे। अब का करे? बड़े भइया के सायकिल ल मांगे के सोंचिस, फेर भउजी के सुभाव ल देख के वोकर हिम्मत नइ होइस। आखिर म रेंगत जाय के तय करिस; न उधो के लेना न, माधो के देना। झोला झंगड़ धर के जइसे घर ले निकले के होइस, राजेस ह संग पड़ गे। रेंध मता दिस। कहे लगिस – ‘‘हम एको घांव नांदगांव ल देखे नइ हन। हमू संग म जाबो त हमर मन पसंद के लेबो। पाछू साल तंय उल्टा-पुल्टा ले देय रेहेस।’’
देवकी के पलोंदी पा के राजेस अउ जिद करे लगिस। आखिर म रतनू ल मानेच बर पडि़स। राजेस के का पूछना।
गांव के सड़क म गड्ढच गड्ढा। रात म जोरदार पानी गिरे रहय। गड्ढा मन तरिया कस भरे रह। चिखला के मारे चप्पल फदक फदक जाय। खिसिया के रतनू ह दुनों झन के चप्पल ल हाथ म धर लिस। राजेस के भाग खुल गे। रतनू ह सुक्खा सुक्खा देख के रेंगय, तब राजेस ह डबरा के पानी म चभक्की मारय, खेले बर रम जाय।
सड़क के दुनों बाजू जतिक दुरिहा ले देख ले खेतेच खेत। कतको खेत हरिया गे रहय त कतको म अभी नांगर चलतेच रहय। रतनू के मन खेतखार म रमे रहय। राजेस के सुरता आ गे। पाछू लहुट के देखथे, वो ह पानी खेले म रमे रहय। रतनू खिसियाइस – ‘‘ झपकिन आ, पानी खेले म झन भुलाय रह। पानी बादर के दिन।’’ राजेस दंउड़ के आइस।
बड़ मुस्किल से माइ सड़क म पहुंचिन। बड़े सड़क गजब ऊंच, बिकट चाकर। डामर के बनल, चिक्कन चांदर। रतनू ह पाइ के डबरा म गोड़ धो के चप्पल ल पहिनिस। राजेस घला वइसनेच करिस। अब दुनों बाप बेटा सड़क के डेरी बाजू कोरे कोर रेंगे लगिन। सड़क ह मोटर 7गाड़ी ले दमदमावत रहय। किसम किसम के बस, टरक, कार, फटफटी पूछी चाबे चाबे कभू एती ले त कभू वोती ले, भर्र भर्र आवय, बड़ोरा उड़ात चल देवय। पें..पों..पीं…. के मारे चेत हराय के पुरती रहय। पें… करत एक ठन गजब सुंदर कार सांय ले उंखर बाजू ले निकलिस। राजेस ह वोकर नकल उतारिस। पीं…..। आगू डहर ले एक ठन अब्बड़ लाम के टरक आवत रहय। वोमा बड़ भारी मसीन जोराय रहय। पचासों ठन चक्का लगे रहय। कनखजूर जइसे टरक देख के राजेस चकित खा गे। वोकर चक्का मन ल गिने लगिस। एक दू तीन चार…..पचीस। आंखी चकमका गे। गिनती भुला गे। कन्झा के बाप ल पूछथे -’’बाबू बाबू, एकर के ठन चक्का हे?’’
रतनू ह लइका के हाथ ल चमचमा के धरे रहय। अपन डहर खींचिस। किहिस – ‘‘सड़क ल देख के रेंग। चक्का गिने म झन भुला।’’
राजेस ह फेर पूछिस – ‘‘एमा का मसीन जोराय हे?’’
‘‘कोनो कोती कारखाना बनत होही। वोकरे होही।’’
राजेस के मन नइ मानिस। टरक ह गुजर गे रहय। दुरिहात टरक ल लहुट लहुट के देखे लागिस। वोतका म एक ठन बस पों…..करत आइस अउ बड़ोरा उड़ात चल दिस।राजेस ह कहिथे -’’बाबू बाबू ,थकासी लागत हे मोटर म चढ़ के जाबो।’’
‘‘टिकिट बर पइसा नइ हे बेटा।’’
‘‘बिन पइसा के नइ चढ़ाय क?’’
‘‘तोर आजा बबा नों हे।’’
‘‘तंय तो पइसा धरे हस।’’
‘‘बस वाले ल देय बर नइ धरे हंव। तोर समान लेय बर धरे हंव। बांच जाही तेकर खजानी खाबो। बस वाले ल काबर देबो। ‘‘
खजानी के बात सुन के राजेस के मुंहूं म पानी आ गे। अतिक मोटर गाड़ी देख के वोकर मति चकराय रहय। थोरिक देर गुनिस। दिमाग नइ पूरिस तब बाबू ल फेर पूछिस – ‘‘बाबू बाबू , ये मोटर मन काकर होहीं। ‘‘
‘‘बड़े बड़े आदमी मन के आय।’’
‘‘हमरो मन ले बड़े?’’
‘‘भोकवा ! हमी मन बड़े आदमी आवन?’’
राजेस अचरज म पड़ गे। दुनों हाथ ल ऊपर उचा के कहिथे -’’अतेक बड़े?’’
‘‘अरे वइसन बड़े नहीं। खूब रूपिया पइसा वाले आदमी। समझे? हमन तो गरीब आवन।’’
राजेस ह अपन दुनों हाथ ल आगू कोती लमा के कहिथे – ‘‘अतीक रूपिया?’’
‘‘वोकरो ले जादा।’’
‘‘अतेक पइसा वो मन कहां ले पाथें ?’’
‘‘ भगवान देथे।’’
‘‘हमन ल काबर नइ देवय। ‘‘
‘‘अपन-अपन करम कमइ तो आय बेटा। ‘‘
‘‘तहूं तो अब्बड़ कमाथस। रात-दिन कमाथस। तब ले भगवान ह हमन ल बस चढ़े बर घला पइसा नइ देय।’’
रतनू ह राजेस के बात ल सुन के अकबका गे। कुछू कहत नइ बनिस। अइसन तो वो ह कभू सोंचेच नइ रिहिस। मन उदास हो गे। कहिथे – ‘‘सब भगवान के माया ए।’’
वोतका म असोक गुरूजी ह उंखर आगू म फटफटी ल धम ले रोक के खड़ा हो गे। रतनू झकनका गे। कहिथे – ‘‘राम राम गुरूजी।’’
असोक गुरूजी – ‘‘राम राम कका। दुनों बाप-बेटा कहां जावत हव जी? नांदगांव जावत हव क?’’
‘‘हव गुरूजी। सायकिल ह पंचर पड़े हे। रेंगत जावत हन भइ।’’
‘‘रेंगत-रेंगत लइका ह लथर गे हाबे। आवव मोर संग बइठ जावव।’’
‘‘आप मन ल तकलीफ नइ होही गुरूजी ?’’
‘‘का के तकलीफ होही जी?’’
‘‘उपरहा पइसा नइ हे गुरूजी। पिटरोल खरचा कहां ले देहूं।’’
‘‘कका, अब तंय गारी खाबे। अरे ! ये पइसा के बात कहां ले आ गे ? बिरान समझथस का ? अरे हमला तंय लोटा धर के अवइया अउ चार साल म बिल्डिंग टेकइया समझ गेस तइसे लागथे। हम वइसन नो हन। हमर तुंहर कई पुरखा के नेरवा इही माटी म गड़े हे। चलो बइठो। ‘‘
‘‘दूध के जरइया मही ल घला फूंक-फूंक के पीथे बेटा। एक घांव सेठ टुरा संग अइसने बइठ परेंव। दस रूपिया ले लिस। लइका मन के मुंहूं म पेरा गोंजा गे। चना चबेना घला नइ ले सकेंव। ‘‘
‘‘सही बात आय कका। हमर मन के मुंहूं म पेरा गोंजही तभे तो उंखर बिल्डिंग खड़े होही।’’
दुनों बाप बेटा गुरूजी के फटफटी म बइठ के नांदगांव पहुंच गिन। राजंस ह कभू फटफटी नइ चढ़े रहय, गजब खुस हो गे। उतरत समय असोक गुरूजी ह कहिथे – ‘‘आफिस जावत हंव। दू बजत ले मोर काम हो जाही। इही करा अगोरा कर लेहू। आय हन वइसने चल देबो। राजेस ह पढ़ाई म गजब होसियार हे। वोकर मन पसंद के समान लेबे।’’
बेटा के प्रसंसा सुन के बाप गदगद हो गे।
राजेस के अंगठी धरे धरे रतनू ह बड़े दुकान कोती के रस्ता म चल पड़िस। राजेस के धियान ह सडक के दुनों बाजू के नाना प्रकार के सजे धजे दुकान अउ दुमंजिला-चरमंजिला मकान मन कोती रहय। सोंच म परे रहय कि अतेक ऊंच-ऊंच मकान ल कइसे बनाय होहीं। इंहा के रहवइया मन कइसन होत होहीं। राजकुमारी के कहानी के सुरता आ गे कि कइसे वो ह सतखंडा महल के झरोखा ले राजकुमार ल देख के मोहा गे रहय। वोतका बेर एक झन अबड़़ सुंदर सेठाइन टुरी ह तीसर मंजिल के झरोखा ले झांकिस। राजेस ह अपन बाबू से पूछथे -’’ बाबू बाबू , वो झांक के देखत हे तउने ह राजकुमारी आय क ?’’
‘‘कोन राज कुमारी?’’
‘‘काली रात के कहानी सुनात रेहेस न, विही।’’
‘‘अब कहां के राजा अउ कहां के राजकुमारी। फेर बने केहेस। आजकल के राजा अउ राजकुमारी इहिच मन तो आवंय।’’
‘‘सेठ मन कइसन होथें ?’’
‘‘वो दुकान म बइठ के पइसा गिनत हे तउन ल देख ले। एक झन सेठ विही आय।’’
‘‘हमू मन अइसने घर काबर नइ बनान ?’’
‘‘पइसा वाले मन बनाथे। हमन कहां ले बना सकबो।’’
‘‘सेठ मन तीर बहुत पइसा होथे क?’’
‘‘हव।’’
‘‘तब हमू सेठ बनबो।’’
रतनू ह राजेस के सवाल पुछइ म थर्रा गे रहय। गुस्सा आ गे। कहिथे – ‘‘तोला सेठ बनाय बर नइ पढ़ात हंव। अरे ये सब तो गरीब किसान मन के खून चुहकइया हरे। तोला खून चुहकइया नइ बनना हे। तोला तो बड़े साहब बनना हे। इंखर मन के काल।’’
भूख के मारे राजेस के पेट अंइठत रहय। बाप के गोठ वोला समझ नइ आइस। हलवाई दुकान मन डहर ले जावत रहंय। दुकान मन म किसम किसम के मिठाई सजे रहय। भट्ठी मन म बड़े बड़े कड़ाही चढ़े रहंय। कहीं समोसा-कचौरी त कहीं इमरती-जलेबी चुरत रहंय। तेल अउ मसाला के सुगंध म राजेस के भूख अउ बाढ़ गे। मुंह पनछिया गे। मंुह के पानी ल गुटकत कहिथे – ‘‘बाबू बाबू , अबड़ भूख लागत हे। पियास घला लागत हे।’’
रतनू घला पियास मरत रहय। लइका के दसा ल देख के वोला रोना आ गे, फेर मन मसोस के कहिथे – ‘‘थोरिक दम धर बेटा, पहिली तोर कापी-किताब ल ले लेथन। बांचही तेकर मन भर मिठाइ खाबो। तोर मां बर घला लेगबो।’’
दुनों बाप बेटा बड़े दुकान म गिन। दुकान के नाम अतराब म परसिध्द हे। छोटे दुकानदार मन इ्रहें ले थोक भाव म खरीदी करथें। गजब भीड़ रहय। लटपट इंकर समान निकलिस। सबो के कीमत जोड़ के सेठ ह बताइस। सुन के रतनू अकबका गे। बड़ मुस्किल म मंुहूं उलिस – ‘‘अबड़ मंहगा लगाएस सेठ जी।’’
सेठ – ‘‘ये साल मंहगाई बाढ़ गे हे कका। सब म कीमत छपे हे। बने देख ले, जोड़ ले, तब पइसा दे।’’
रतनू – ‘‘देख डरेंव सेठ जी। छपे कीमत ह ब्रह्मा के लिखा नो हे। थोरिक तो कम करके जोड़।’’
सेठ – ‘‘एक पइसा कम नइ हो सकय। लेना हे ते ले नइ ते आगू बढ़। इहां मोल भाव नइ चलय।’’
रतनू – ‘‘कइसे नइ हो सकही ? हमर गांव के दुकानदार मन कइसे कम करथें ? तंय तो बड़े दुकानदार आवस। इहां दू पइसा अउ सस्ता मिलत होही कहिके आय रेहेन। उल्टा हो गे भइ।’’
रतनू के बात सुनके सेठ कलबला गे। बाजू म दूसर सेठ बइठे रहय तउन ल कहिथे – ‘‘सुन रहे हो न सेठ जी। गांव के जितने छत्तीसगढ़िया दुकानदार हैं, सब सालों ने रेट खराब कर दिए हैं। हम तो परेषान हो गए हैं।’’ फेर रतनू डहर देख के कहिथे – ‘‘अरे लेना हे त ले कका, नइ ते जा अपन गांव म ले लेबे। वो मन तुंहर सगा होहीं, तउन पाय के दे देवत होहीं। समझे?’’
रतनू – ‘‘समझ गेंव। बने कहत हस तंय। विहिच मन हमर सगा आवंय। हमर छत्तीसगढ़िया भाई आवंय। तुमन हमर का लगथो जी ? तुमन तो इहां बेपार करे बर आय हव, हमर सगा बने बर थोड़े आय हव। छत्तीसगढ़िया बने बर थोड़े आय हव। समान के बिकत ले, मुटृठी म पइसा के आवत ले हमन तंुहर कका-बबा आवन। पाछू तुंहर बर हम साला छत्तीसगढ़िया बन जाथन। साला देहाती बन जाथन।’’
रतनू ह लेय समान ल सेठ के आगू म पटक दिस अउ अपन गांव डहर लहुट गे।

कुबेर
(कहानी संग्रह भोलापुर के कहानी से)

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