साहित्य हरे अंधरा के तसमा

मटमटहा राम हा नवा-नवा साहित्यकार बने रथे, ओकर लेखनी के चारो खुंट परसंसा होथे वोहा कम दिन मे ज्यादा नाम कमा डरथे, त वोला लागथे के वोहा सबे जिनिस ल जान डरे हे अऊ इही बात के घमंड में साहित्य ल बिन जाने समझे जेन मिले तेन ल साहित्य काय आय कइके पुछथे, वोहा सबले पहिली अपन संगवारी साहित्यकार मन ल पुछथे, त बड़ सुग्घर जवाब पाथे, एक झन कथे साहित्य तो अंतस के दरपन आय, फेर मटमटहा अपन घमंड पाय के जवाब ल नई समझे, वोहा दुसर संगवारी ल पुछथे त जवाब मिलथे साहित्य गियान अऊ भावना के सागर आय, मटमटहा ल यहू जवाब पसंद नई आय, अऊ वोहा रोज ये सवाल पुछे अऊ कोनहो कतको सुग्घर जवाब दे वोला वोहा हांस के छोटेच देखाय के जतन करे, अइसन करत-करत ओकर घमंड अऊ बाढ़ जाथे त वोहा चारो खुंट घोसना करवा देथे के जेहा मोला साहित्य काय हरे बता के सरेखवा दिही तेला मेहा आधा एकड़ खेत ईनाम मे देहूं, ये गोठ ल जम्मों डहर के मनखे मन सुनथे अऊ मटमटहा राम करा पहुंचे लागथे फेर वोहा एको झन के जवाब ल नई माने, त एक दिन ओकर करा बड़का साहित्यकार आथे अऊ वोहा मटमटहा के सवाल के जवाब म कथे के जब सब्द ल मथबे त जे लेवना निकरथे तेला साहित्य कथे साहित्य हा हमर जिये के साधन अऊ सब्द-आखर के जाप हरे, साहित्य हा सुख, दुख, मया, हांसी ठिठोली, ल अंतस मे पहुंचाय के साधन अऊ समाज ल आघू बढाय के रद्दा हरे, अऊ अइसन कतको अकन पोठ जवाब देथे फेर मटमटहा वहू ला नई माने अऊ ईनाम दे बर नट जथे।
अब दुनो झन झगरा सरीख हो जथे, मटमटहा के पेलाही ले खखवा के बड़का साहित्यकार हा ओकर घमंड ल टोरे के सोचथे। वोहा चार दिन के बिते ले अंधरा डोकरा के सवांगा रच के आ जथे त मटमटहा कथे काये बबा ते काबर आय हस त अंधरा बने साहित्यकार कथे मेहा तोर सवाल के जवाब दे बर आय हंव त मटमटहा हांस देथे अऊ कथे कतको झन साहित्यकार मन बता नई सकीस त ते अंधरा काला बता सकबे त अंधरा कथे सुन तो ले मटमटहा ताहन अंटियाबे त वोहा ले सुना कही के बईठ जथे ता अंधरा कथे साहित्य मोर तसमा हरे, त मटमटहा फेर कथे जा अपन काम कर मोर करा हांसी ठिठोली के बेरा नई हे त अंधरा कथे मोरे भर तसमा नई होय तोरो तसमा हरे अऊ मेहा ये बात ला सरेखवा सकत हंव त मटमटहा अब अकचका जथे अऊ कथे ले तो सरेखवा ताहन तोला आधा एकड़ खेत ईनाम मे देहूं।
त अंधरा एक झन मनखे ल तिर म बुलाथे अऊ खिसा ले करिया रंग के फरिया ल निकाल के मटमटहा के आंखी म बांधे बर कथे, वो मनखे ओसनहे करथे अब अंधरा कथे मेहा अभी तोला कबिता बना के सुनावत हंव अऊ तेहा सुन के मोला बताबे तोला का समझ अइस, अऊ अंधरा पहिली कबिता सुनाथे-
ढका गे सुरुज करिया होगे आगास
अब बुझाही तरिया के घलो पियास
मटमटहा घलो साहित्य के भाव ल थोक बहुत समझे त तुरते अंताज डरथे, अऊ कथे बादर आये हे का जी अंधरा हव कइके दुसरा कबिता सुनाथे,
खिसा होगे जुच्छा आधा भरीस झोला
मंहगाई होगे बड़ भारी का करे जी भोला
मटमटहा तुरते कथे सिरतोन म जी हर जिनिस मंहगी होगे अंधरा फेर हव कथे अऊ अइसने वोहा चार-पांच ठन नान्हे नान्हे कबिता अऊ सुनाथे जम्मों ल सुन के मटमटहा सही-सही जवाब देथे त अंधरा कथे मटमटहा तोर आंखी म तो पट्टी बंधाय हे फेर ते सही जवाब कइसे देवत हस मोला तो लागथे पट्टी बने नई बंधाय होही तोला सब दिखत हे, त मटमटहा कथे मोला कुछु नई दिखत हे मेहा तो तोर कबिता ल सुन के सही जवाब देवत रेहेंव त अंधरा हांसे ल धर लेथे अऊ अपन सिरतोन रुप म आ जथे अऊ ओतका बेर ले मटमहा घलो आंखी के फरिया ल हेर डर रथे अऊ वोहा वो साहित्यकार ल चिन डरथे त मुडी ल गडिया के कथे मोला सही रद्दा म लाने के तोर उदीम बने रीहिस अब मोर घमंड टूट गे हावय सिरतोन म साहित्य अंधरा के तसमा हरे, अऊ अइसन काहत वोहा अपन घोसना ल पुरा करथे।

ललित साहू “जख्मी”
छुरा, जिला – गरियाबंद (छ.ग.)
9993841525

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