सुकवि बुधराम यादव के सरस कविता संग्रह ”गॉंव कहॉं सोरियावत हें” गुरतुर गोठ म लउहे


नवा जमाना अउ समे के परभाव ले
गॉंव-गँवई के असल सरूप सिरावत हे,
चाल-चरित्‍तर नंदावत हे 

अउ गुन ह जनव गंवावत हे।
गॉंव दिनों दिन सहर कति सरकत जाथे,
ये सबके पीरा ले सरोकार खग-पंछी ल
मनखे ले जनव जादा हावय।
तभे तो ये सगरी कविता कोईली के कलपब
अउ मैना के बिलपब ले सराबोर हे।



हमर गुरतुर गोठ के प्रबंध संपादक आदरनीय सुकवि बुधराम यादव के पाछू दिनन सरस कविता संग्रह ‘गांव कहॉं सोरियावत हे’ के प्रकासन होए हे। जेखर विमोचन छत्‍तीसगढ़ साहित्‍य समिति के प्रदेस स्‍तरीय सम्‍मेलन में होइस। ये कविता संग्रह म संग्रहित कविता मन ला प्रदेस के साहित्‍यकार मन अड़बड़ पसंद करत हांवय। संग्रह म भाखा के कमाल, छत्‍तीसगढ़ी के गुरतुर सेवाद अउ माटी महतारी के महिमा के बखान ह अद्भुत हावय। हमर हिरदे म बसे हमर गांव ला हम बिसरा देहे हन, ये कबिता संग्रह हमला, हमर हिरदे ला, हमर गांव डहर लेजे के उदीम ये। सुकवि अपन भूमिका म स्‍वयं कथे कि ‘साहित्‍य के सबले बड़े बुता आय देस-दुनिया समाज अउ मनुख ल जगावब, चेतावब अउ डहर देखावब।’ कवि अपन बात ल ये कविता संग्रह म साबित करथे। कविता संग्रह ‘गांव कहॉं सोरियावत हे’ ल हम आपमन खातिर लहुआ इहां सरलग छापबोन। संग्रह के कबिता के बानगी देखौ – 


”गॉंव रहे ले दुनियॉं रहिही, पॉंव रहे ले पनही
ऑंखी समुहे सबो सिराये ले पाछू का बनही
दया-मया के ठॉंव उजरही, घमहा मन के छइहॉं
निराधार के ढेखरा कोलवा, लुलुवा मन के बइहॉं ।”

-: :-
“देखते देखत अब गॉंव गियॉं
सब शहर कती ओरियावत हें !
कलपत कोइली बिलपत मैना
मोर गॉंव कहॉं सोरियावत हे !”

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  • गाँव कहाँ सोरियावत हे ? एक जागरूक साहितकार बर गाँव के चिंता करना सुभाविक हे. साहितकार मन समाज के निरमाता होथें.इंकर आंखी कोन्हो साधु-महात्मा असन भविस्य ला देख लेथे.इंकर कलम बहुत पहिली ले सावधान कर देथे.फेर मनखे अइसन जीव आय ; तब तक नई चेतय जब तक कोन्हो बात पूरा-पूरा बिगड़ नइ जावै.अभिन ले समय हे.गाँव के तरक्की हो,गाँव में साधन – सुबिधा बढ़े,ओखर सहरीकरण झन होय.जिनगी के सुख गाँवे मन मा बाँचे हे.सहर मन मा न जिनगी दीखे, न सुख . हाथ-गोड़ हालथे उही ला जिनगी अउ मोटर,कार,बंगला,रूपया-पैसा ला सुख समझथे.श्री बुधराम यादव जी के चार लाइन मा उंकर किताब के वजन दिखथे .यादव जी ला बधाई .

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