सुन्ना कपार – उतरगे सिंगार

”मास्टरिन के बात ल सुन के मैं ह खुस होगेंव के देखव तो अब इंकर मन म जागे के चिनगारी उठत हे। जेन माइलोगिन निंदा-चारी के परवाह नई करके समाज अउ परिवार संग जुझथे वो ह अवइया कतेक माइलोगिन मन बर रद्दा बना देथे। कतको सिक्छित माइलोगिन मन ल कपार ल जुच्छा नि राखंय अउ बिंदी टीका लगाथे।”
मे-ह अंध बिसवास ले दुरिहा रथौं। अउ जेन मोर करा अपन दु:ख ले उबरे के उपाय पूछे बर आथे तेन मन ल घला मे-ह ये समाज के दकियानूसी दुरिहा रहे के सलाह देथौ।
त- एक झन मोर सारा के बहिनी के माथा ह जुच्छा होगे। बिचारी ह अपन रूप ल देख के सहे नि सकिस त मोर करा पूछ थे- भांटो! मोला ये जुच्छा कपार ह बड़ पीरा देवत हे। का मे-ह टीका लगा सकत हंव? सारा भांटो, सारी-भांटो म कांही परदा नि रहय-त-मोर करा पूछिस।
मे केहेवं देख दुलारी! (नांव बदल दे-गे-हे) टीका ल तो तैं कुंवारी म घर मा लगावत रहे। साढू ह तो तोला बिन्दी-टीका दे नइए। बिहाव म बिछिया अउ बेंदा दे रिहिस हे। मोर कहे म वो ह हां में हां मिलाइस। वोकर चेहरा म मे- ह एक नारी मन के पीरा ल देखेंव अउ मोर आंखी के सामने म वो सबे माई लोगिन के पीरा जेकर हालत ह दुलारी कस होगे रहय मोर आंखी म दिखे लागिस।
अब आज के पढ़े-लिखे कॉलेज के एक झन मास्टरीन के विचार ह माने के लइक हे। वोकर बिहाव अभी-अभी होय रहय अउ वोकर मांग सुन्ना होगे। फेर वो ह अपन सिंगार ल नइ छोड़िस। मे ह एक दिन वोकर ले सोज पूछ परेंव। बहिनी अइसन करके समाज के कहा सुनी के डर तोला नइ लागय? मोला लागिस के वो ह थोकन भड़कगे। कहिस बाबूजी ! मे-ह समाज के नियम के पेलाही एकर सेती करे हंव के मे ह अपन भार समाज परिवार के ऊपर नई डारे हवं। मे-ह अपन पांव म ठाढ़े हंव। मोर चारी करके मोर काय बिगाड लेहीं? ये बंधना ल हमर मन ऊपर एकर सेती थोपें हे। काबर के हमन मन से मन करा बेचाय हन। उका कारन ये के मनसे के बीते के बाद म हमर सिंगार ल उतार लेथें। जब के हमर मन के मिरतु (मृत्यु) होथे त मनसे मन कांही पहिरई-ओढ़ई अउ चंदन टीका ल नई छोंड़य।
मोला लागिस के वो मास्टरीन के बात म बड़ वजन हे। वोकर बात ल सुन के मे ह खुस होगेंव के देखव तो अब इंकर मन म जागे के चिनगारी उठत हे। जेन माइलोगिन निंदा-चारी के परवाह नइ करके समाज अउ परवार संग जुझथे वो ह अवइया कतेक माइलोगिन बर रद्दा बना देथे। मे कतको शिक्षित माइलोगिन मन ल जानथंव जे मन कपार ल जुच्छा नि राखंय अउ बिंदी, टीका लगाथे।
मोर मन कहे लागिस- का समाज म सिरतोन म नारी जागरन होथे? सोचव, नारी के तो जिनगीच्च ह वोकर सिंगार आय। विधवा के सिंगार उतार के समाज नारी ल असहाय बना दे-हे।
मैं वो सबे माइलोगिन के तारीफ करत हंव जेन समाज के कुरीति ल मिटाय बर संघर्स करत हें। आज समे म बदलाव जरूरी हे। समाज येला नजरअंदाज झन करय अउ उंकर मानसिक सतांप ल मिटाए खातिर प्रयास करंय। येकर खातिर जवान पीढ़ी ल आगू आय बर परही।
नारी के सम्मान जहां। सुख, सांति, समृध्दि वहां॥
राघवेंद्र अग्रवाल
खैरघटा वाले बलौदाबाजार

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