सोरिहा बादर – गुड़ी के गोठ

तइहा के बात आने रिहीसे जब ठउका लगते असाढ़ के बादर उमडय़ अउ कालिदास के बिरहा भोगत यक्ष ह वोला सोरिहा बना के अपन सुवारी तीर पठो देवय। अब वो जुग बदले के संगे-संग बादर के अवई-जवई के बेरा घलो बदले बर धर लिए हे, अइसे म बिरहा भोगत यक्ष कइसे करय, वो अपन सुवारी ल कइसे बतावय के वोकर ‘राज निकाला’ के एक बछर पूरगे अब खंचित वो अपन सुवारी करा आही अउ असाढ़ के जउंहर बरसा कस वोकरो हिरदय म बरसही, वोला हरियाही।
वइसे मौसम विज्ञानी मन के मानन त मानसून केरल म हबर गे हवय जेन, अठवाही-पंदरही तक इहों हबर जाही। फेर दिन के दिन होवत वोकर ऊंच-नीच अउ आगू पाछू ल देखत विज्ञानी मन के गोठ ऊपर भरोसा करे के मन घलोक नइ होवय। काबर ते अइसने कई पइत एकर मन के झांसा म आके बपरा किसान मन खेत म धान के बिजहा ओनार देवत रिहीन हे, ए सोच के बादर ह ठउका बेरा म आही, बने रूमझुम ले बरसही, तहां ले सोन के खिली कस धरती के गरभ ले धान के अंकुरन हो जाही। फेर धरती के गरभ ले सोनहा खिली के अगोरा करत किसान तब अपन तरुवा ल धर लेवय, जब इहां बादर पहुंचे के पहिली खेत मन म चिरई-चिरगुन मन पहुंच जावयं अउ जम्मो ओनारे धान मन ल शीला कस बीन डारयं।
साल के साल अइसन होवत अनभरोसिल बादर के खेती तब किसान मन खुर्रा बोनी ल छोड़ के उतेरा अउ रोपा के विधि ल अपनाइन फेर अब इहू म तरुवा धरउल होगे हाबय। काबर ते दगा देवत बादर संग पानी के स्रोत मन घलोक दगा देवत हावयं। नंदिया अब दूए-चार हफ्ता म सोकसोका जाथे त तरिया के पेट भरे के पहिली वोला फोर के बियासी के गांव म बलिदान कर दिए जाथे। कुआं अउ बोरिंग मन दिन के दिन खाल्हे उतरत जावत हें, अउ सरकार हे के एमन ल भरे, बने गहीर करे के बलदा उल्टा इंकर पानी मनला विकास अउ औद्योगीकरण के नांव म जम्मो फेक्टरी मन के भोभस म भर देथे।
ये सबला देख सुनके आज के कोनो कालिदास ह असाढ़ के पहला बादर ल देख के मया के गीत कइसे लिख सकथे? वोकर मन म घर म बइठे बिरहीन सुवारी खातिर कइसे मया पलपला सकथे? कइसे वो कोनो बादर ल ‘सोरिहा’ बना के सुवारी तीर पठो सकथे? ये बात सही हे के अइसने करे बिन जिनगी के स्वांसा घलोक नई चल सकय। ए पाय के स्वांसा चलाय के घलोक कुछु न कुछु उदिम करेच बर लागही। हर खेत ल भरपूर पानी अउ मनखे ल जिनगानी देच बर लागही, अउ अइसन तभे हो सकथे जब बरसा के हर बूंद ल उपयोगी बनाए जाय, वोला बिरथा बोहा के समुंदर म समाये खातिर जाए ले रोके जाय, जगा-जगा स्टाप डेम, तरिया, बावली अउ डबरी-डबरा के निरमान करवाए जाय। संगे-संग बरसा के अनभरोसिल रूप ल सुधारे खातिर जंगल-झाड़ी अउ डोंगरी पहार के हरियई ल अउ घन करे जाय, जम्मो चातर जगा म नवा-नवा झबड़ी सिरजाए जाय। जभे अइसन होही, तभेच फेर कालिदास के कंठ ले मया के गीत फूटही, वो बादर ल सोरिहा बनाके अपन सुवारी तीर पठोही।
सुशील भोले
41191, डॉ. बघेल गली
संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर

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