हमर पूंजी व्यवस्था में चीनी सेंधमार

लिखइया
सरला शर्मा

आज हमर विदेशी मुद्रा भण्डार 278.6 अरब डालर है जेहर छय सात महीना के आयात बर पुरही। फेर सुरता करिन तो सन् 1991 मं एहर 60 करोड डालर तक गिर गये रहिस। तभो गुने बर परत हे आघूं अवइया गर्रा धूंका हर हमर का हाल करही? दूसर बात के कारखाना मन के कम होवत उत्पादन, घटत पूंजी निवेश, बाढ़त महंगाई अऊ संसार के बजार मां रूपिया के घटत कीमत ये सबो के सीधा असर आम आदमी उपर परत हे।

ए तरह के बिगड़त हालत मं घटत औद्योगिक उत्पादन के जब्बर कारन हमर देस के बाजार मां चीनी माल के खपत घलाय हर आय। ये चीनी माल बहुत सस्ता मं मिलथे काबर के चीन मं सस्ती मजदूरी हे त दूसर डहर उनकर कच्चा माल हर घटिया रहिथे। कारन चाहे जौन होवय हमर देस के पूंजी व्यवस्था मां एहर चीन के सेंधमारी आय। ’’बात निकली है तो दूर तलक जायेगी’’।

साफ्टवेयर, हार्डवेयर अउ इलेक्ट्रानिक के छेत्र मां चीन हर सदा दिन ले हमर बरोबरी करत आवत हे। संसो तब सुरू होइस जब चीन हर कले चुप आके हमर बजार मां अपन उत्पाद मन ला खपाना शुरू करिस ओहू हमर चीज के दाम ले आधा ले भी कम दाम मां।

आज कल तो तिहार बार के दिन आय त बजार जा के देखव ना राखी, गनेस, लक्ष्मी के फोटो मूरति ले लेके बिजली झालर घलाय चीन के बने मिलत हावय। त दूसर डहर रोजमर्रा के उपयोगी जिनिस कैंची, मोबाईल, खेलौना, जूता, कपड़ा से ले के दूध पावडर, चाकलेट असन खाई खजेना घलाय मिलत हे। धियान देहे लाइक बात ये हर आय के ये सबो जिनिस सहरे के बजार मां नही, गांव गवई के बजार मन मां घलाय बेचावत मिल जाथे। हमर देस के सीधवा सोझवा मनसे सस्ती के फेर मां परके बिसाथें फेर चार दिन के गये ले जिनिस पत्तर बिगड़ जाथे। ठगा जाथंे। त इहां तो चीनी मसीनी कलपुरजा मिलन नही ंके ओला सुधारे जा सकय, का करबे नठाये बिगड़े जिनिस ल फेकें बर परथे। बात अतके मां खतम नइ होवय। मनसे सस्ती के लोभ मं घेरी बेरी चीनी जिनिस बिसाथें। इहीं तो उन चाहत हंे के हम अपन पइसा दे के उनकर माल बिसाईन तभे तो हमर देस के पंूजी उन अपन देस ले जाये सकहीं। हमीं मन जब ठगाये बर तियार बैंठे हन त उन काबर नइ ठगहीं, दूध और दुहना दूनांे उंकरे आय।

आज ये हाल हो गे हे कि बजार मां 30 से 40ः जिनिस चीन के मिलत हावय। हमर देस के पूंजी पलायन ल रोकना जरूरी हो गये हे दूसर बात के हमर राजस्व मां भारी कमी होवत जात हे। हमर देस के तियार उत्पाद अउ छोटे छोटे उद्योग मन उपर एकर असर दिखे लग गये हे। बम्बई के भिवंडी अउ थाणे के 60ः उद्योग खतम होगिस। दुख के बात आय के इन मन घलाय चीनी जिनिस बिसा के बेचें बर सुरू कर दिहिन, फल ये होईस के लाखों मजदूर, कारीगर के रोजगार खतम होगिस, भूखमरी छा गिस। सियान महतारी बाप बर दवा दारू के खर्चा कइसे करे सकही मनसे, कहां ले लइकन ल पढ़ाये लिखाये सकही? अइसनहे भारत मां बेरोजगारी बाढ़त जावत हे तेमा ये चीनी जिनिस पत्तर मन दुरबल बर दू असाढ के दसा कर दिहिन हें।

सुरता करव ना संगवारी मन! अंगरेज मन घलाय तो बैपारी बन के आये रहिन। अपन देस मां तियार जिनिस पत्तर ल बेचें बर हमर बजार मा उतरिन। धीरे कुन ईस्ट इंडिया कंपनी बना डारिन। पहिली धन तेकर पाछू जन उपर अपन अधिकार जमाईन अउ हमर देस ला गुलाम बना डारिन। कतका झन के तन मन धन अरपन होइस तब जा के सुराज मिलिस। सिरिफ छैसठ साल मां हमन गुलामी के दुख ला भुला गयेन का? समै बदले हे हालत तो फेर उहीं होवत दिखत हे, काबर के अंगरेज के बलदा आज चीन बैपारी बन के आये हे, समै रहत चेतव … संगवारी मन! अंधरा के लाठी घेरी बेरी नइ हजावय जी।

गुनव ना. चीन के बजारवादी नीति आज के उपभोक्तावादी संस्कृति के सहायक तो आय। जेकर असर भारत के पूंजी बेवस्था अउ लोगन के तन मन उपर घलाय तो परत जावत हे।

चीनी खेलौना अउ आनी बानी जिनिस मन मां जौन रंग रोगन करे गये रहिथे तेमा सीसा के उपयोग घातक मात्रा के सीमा तक करे जाथे। अतके नहीं खाये पिये के जिनिस मां उन मन ’मेलामाइन’ नांव के रसायन संग अउ आनी बानी के रसायनिक मिलाथें। बहाना ये के प्रोटिन के मात्रा के बढोत्तरी करना हे। खवइया पियइया मन के पाचन तंत्र बिगडथे। सरीर मन कमजोर होथे। जादा दिन तक लगातार खावत रहे ले मनसे मां दिमागी कमजोरी घलाय आथे।

’मेला माइन’ रसायन कोइला मां पाये जाथे। सिंगापुर मां स्थानीय जांच पड़ताल के बाद उन मन चीन ले आये दूध पावडर, चाकलेट असन जिनिस मन उपर प्रतिबंध लगा दिहिन। अइसनहे संसार के कई ठन देस मन घलाय आजकल चीन ले अवइया खाये के जिनिस ला बिसाये बर मना कर देहे हें। गुनव तो हमन कब चेतबो?

चिटिक अपन डहर नजर डारिन त हमन पाबो के भारत हर परमाणु पनडुब्बी बनइया संसार के छठवां देस बन गये हे त फेर छोटे छोटे जिनिस पत्तर मन बर चीन डहर काबर देखिन? हमर भारत मां तकनीकी सिक्षा पा के लाखों लइकन हर साल निकलत हवयं, कल कारखाना घलाय के कोनो कमीं नहये, हमर उत्पाद के गुणवत्ता मां कोनो किसिम के कमी नइये। छोटकुन सूजी ले सुरू करके बड़े बड़े जहाज तक हमर इहां बनत हे, लघु उद्योग, घरेलू चीज के उत्पादन मां भी हम पिछुआये नइ हन। बात आय हमर भावना के कि हम स्वदेसी जिनिस के महत्ता ला समझन।

रहिस बात यातायात के त हमर भारत मां 42 लाख किलोमीटर के रोड नेटवर्क (सड़क के जाल) मजूत हे, कन्याकुमारी से कस्मीर तक के जिनिस ल बैपारी मन ला ले जा सकत हे। सुरता राखिन के संसार के दूसर बड़े रोड नेटवर्क हमरे इहां हवय फेर हमर उत्पाद मां लगे राजस्व के धन हमरे देस मां रहिही, हमरे विकास के काम आही।

थोरकुन धियान सरकार ला घलाय देहे बर परही, वो ये तरह के चीनी जिनिस पत्तर के आयात उप्पर प्रतिबंध लगाये जाना जरूरी समझे जावय, दूसर के जौन जिनिस पत्तर आवत हे तेकर उप्पर अतका राजस्व लगाये जावय के चीनी माल के किमत हमर घरेलू उत्पाद ले थोरको कम झन होवे पावय। अतके नहीं चोर बजारी करइयां मन ला कड़ा सजा के बेवस्था करे जावय।

चीनी माल के बहिष्कार बर सबले जरूरी हवय जनाधार बनाना, जन जागरण करना त एकर बर आम जनता के साझेदारी जरूरी हें, उपभोक्ता के मन मां राष्ट्रीयता के भावना जगाये बर परही। एकर सुरूआत हम अपन से ही करिन, हम परन करिन के न तो हम चीनी जिनिस बिसाबो ना बिसा के कोनो ला देबों, अउ न ही कोकरो करा लें भेंट मां लेबों। पहिली दिया घर मां बारे बर परथे घोड़साल मां दिया तो पाछू बरी जाहीं।

दूसर बात के सबले पहिली अउ सबले जादा जिनिस बिसाइया होथें जवान लइका मन काबर उही मन ला आनी बानी के फैसन के जिनिस के जरूरत जादा परथे त हमला चाही के स्कूल कालेज मां चीनी जिनिस के बहिस्कार बर भासन, समझाइस देहे जावय। गली, चौरस्ता, बजार मां घलाय लोगन ला समझाइस देहे जावय। दाई, दिदी, बहिनी, लोग लइकन मन ला समझाये बर परही के ’’सस्ती रोवय घेरी घेरी, मंहगी रोवय एक्के बेरी’’।

ए तरह जब सबो झन जुरमिल के के उदिम करबो तभे ये बहिस्कार हर सफल होही। सुरता करव ना संगवारी मन! आजादी के लड़ाई के समै बिदेसी जिनिस मन के बहिष्कार के बात ला, बिदेसी कपड़ा के होली जलाये अभी जादा दिन तो नई होये हे त उहीं तरह के भावना के संग एहू दारी बहिष्कार के योजना बनाये बर परहीं।

समाज सेवी संस्था मन आघू आवयं, बैनर पोस्टर बनावयं, आम आदमी ला ये बहिष्कार आन्दोलन मां भागीदारी बनावयं काबर के बिना जनाधार के कोनो योजना या आन्दोलन कभू सफल नइ हो सकय।

देस के कलाकार, रंगकरमी, साहित्यकार, मन आघू आवयं। अपन कला के मारफत लोगन ला संदेस देवयं। स्वदेसी के महत्ता ल उजागर करयं अउ चीनी जिनिस के अवगुन ला गनावयं। बात तभे बनही।

अब हमला ये गुनना जरूरी हो गये हवय के चीनी जिनिस हमर बजार अउ हमर पंूजी बेवस्था उप्पर अइसनहे कब्जा जमावत जाही त हमर देस के कल-कारखाना उद्योग धंधा बंद हो जाहीं। बेरोजगारी के मार झेलत मनसे के घर चूल्हा नई बरही, लाखों मनसे अपन लइकन ला पढ़ाये लिखाये नइ सकही। अपन सियान दाई ददा के देखभाल, सेवा सत्कार नई करे सकहीं। सुरसा के मुँह कस बाढ़त मंहगाई मां मनसे कइसे जी ही। काय खाही, काय पहिरही? जागव संगवारी मन! ये चीनी बैपारी हमरे बजार मां अपन जिनिस बंेच के पइसा कमाथे, उही पइसा ला अपन देस ले जा के हथियार बनाथे अउ हमरे उपर चढ़ाई करथे। सीमा मां तैनात हमर जांबाज सैनिक मन ला मारथे। हमर पूंजी हमर देस के तरक्की मां लगाय, ये नही के चीन के हथियार – औजार बम-गोली-बारूद बनाये मां लगय। गोस्वामी तुलसीदास लिखे हवयं ना

’’ का बरखा जब कृषि सुखाने
समय बीत पुनि का पछताने’’

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One comment

  • शकुन्तला शर्मा

    “यदि अपने घर से फुरसत हो आओ करें हिन्द की बात । अपने सुख-दुख से फुरसत हो आओ करें हिन्द की बात । लूट रहे हैं हमें विदेशी बिकता है उनका ही माल । देशी खाओ देशी पहनों आओ करें हिन्द की बात ।”

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