होली हे भइ होली हे




होली हे भई होली हे , बुरा न मानों होली हे ।
होली के नाम सुनते साठ मन में एक उमंग अऊ खुसी छा जाथे। काबर होली के तिहार ह घर में बइठ के मनाय के नोहे। ए तिहार ह पारा मोहल्ला अऊ गांव भरके मिलके मनाय के तिहार हरे।

कब मनाथे – होली के तिहार ल फागुन महीना के पुन्नी के दिन मनाय जाथे।
एकर पहिली बसंत पंचमी के दिन से होली के लकड़ी सकेले के सुरु कर देथे। लइका मन ह सुक्खा लकड़ी ल धीरे धीरे करके सकेलत रहिथे।

लकड़ी छेना चोराय के परंपरा– पहिली जमाना में लकड़ी छेना के दुकाल नइ रिहिसे त चोरा के होली में डारे के परंपरा रिहिसे।
हमन नान नान राहन त गांव में दूसर के घर या बियारा कोठार से चुपचाप छेना या लकड़ी ल चोरा के लानन अऊ होली में डार देवन । होली में डारे लकड़ी ल कोनों नइ निकाल सके। काबर ओहा होलिका ल समरपित हो जथे।
अब मंहगाई के जमाना में ए सब परंपरा ह नंदागे। अब तो होलीच के दिन लकड़ी , छेना ल लानथे अऊ होली जलाथे।

फाग गीत के परंपरा– होली के पंदरा दिन पहिली गांव के चौराहा मन में सब कोई सकलाके नंगाड़ा बजाथे अऊ फाग गीत गाथे। कई जगा फाग गीत अऊ राहेस नाचे के परतियोगिता भी होथे।

होली कइसे जलाथे – होली ल कोनों भी आदमी नइ जला देवे। एला महराज मन ह पूजा पाठ करके सुभ मुहुरुत देखके रात में जलाय जाथे। पहिली एकर बिधि बिधान से पूजा करे जाथे ओकर बाद चकमक पथरा से पोनी या पैरा में जलाके होली ल जलाय जाथे। ओकर बाद सब एक दूसर से गला मिलके बधाई अऊ सुभकामना देथे।

हुड़दंग करे के गलत परंपरा – होली एक पवित्र तिहार हरे। एहा बुराई से अच्छाई के जीत के तिहार हरे। फेर कतको सरारती लइका मन ह एला गलत ढंग से मनाथे। होली में हुड़दंग करके एकर रुप ल बिगाड़ देहे। कतको झन ह नसा पानी करके बहुत हुड़दंग करथे अऊ अंडबंड गारी बकत रहिथे। काकरो उपर केरवस, चीखला, गाड़ा के चीट अऊ गोबर ल घलो चुपर देथे। कोनों के मुड़ में अंडा ल फोर देथे त कोनों उपर केमिकल वाला रंग लगा देथे।
एकर से कतको झन ह लड़ई झगरा घलो हो जाथे।




वइसे धीरे धीरे ए परंपरा ह कम होवत जाथे फिर भी सुधारे के बहुत जरुरत हे।
होली ल परेम से एक दूसर के उपर रंग गुलाल लगाके अऊ गला मिलके मनाना चाहिए।

आसीरबाद ले के परंपरा – होली जलथे ताहन सब आदमी अपन अपन घर से पांच ठन छेना ,एक मूठा चांउर अऊ नरियर धरके होली जगा जाथे अऊ पूजा पाठ करके होलिका में समरपित करके आसीरबाद लेथे।
होली के राख ल एक दूसर के माथ में लगाथे अऊ सुभकामना देथे। कतको झन ह राख ल लान के अपन घर में छितथे ताकि बुरी नजर से बचे रहे।

होली के काहनी – एक झन हिरण्यकश्यप नाम के बहुतेच दुस्ट अऊ पापी राजा रिहिसे। वोहा भगवान ल न तो मानत रिहिसे न दूसर ल मानन देत रिहिसे। ओकर राज में कोनों भगवान के नाम नइ ले सकत रिहिसे। सबले बड़े मेंहा हरों काहे।
ओकर एक झन बेटा प्रहलाद ह भगवान के बहुत भक्त रिहिसे। ओहा हर समय भगवान के नाम ले। राजा ह कइ परकार से ओला समझाइस, फेर प्रहलाद ह मानबे नई करीस। राजा ह वोला पहाड़ से फेंकवा दीस, हाथी से दबवा दीस अऊ कई परकार के उपाय करीस तभो ले प्रहलाद ह मरबे नइ करीस । अंत में राजा ह अपन बहिनी होलिका से आगी में जलाय ल कहिथे। होलिका ल वरदान मिले रहिथे के वोहा आगी में कभू नइ जले। तब होलिका ह प्रहलाद ल गोदी में धरके आगी में बइठ गे । अपन सकती के गलत उपयोग करे के कारन होलिका आगी में जलगे अऊ प्रहलाद ह बांच के निकल गे।
ओकरे याद में ए तिहार ल मनाय जाथे।

महेन्द्र देवांगन “माटी”
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला – कबीरधाम (छ. ग)
पिन- 491559
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