Tuesday, October 7, 2008

लोरिकायन - लाईट एण्ड साउंड (जुगुर-जागर रपट) : संजीव तिवारी

27 सितम्बसर के दिन छत्तीसगढ के लोक दरसन ला जगर-मगर चमकावत क्षितिज रंग सिबिर के लाईट एण्ड साउंड के जोरदरहा परसतुती ‘लोरिकायन’ हा दुरूग मा जब होईस त बईगा पारा के मिनी स्टेडियम म छत्तीसगढ के मनखे मन के खलक उजर गे, घमघम ले माई पिल्ला सकला गे अउ हमर लोक गाथा – लोरिक चंदा के मंच परसतुति ‘लोरिकायन’ मा अपन तइहा, गांव-गंवई, अपन महर-महर करत लोकगीत के परमपरा ला भव्य रूप मा आखीं के आघू पा के गदगद होगे ।

छत्तीसगढ मा लोकगाथा के परमपरा गजब जुन्नां आय, अहीर के बेटा अउ राजा के कइना चंदा के मया-पिरीत ह घलो, तइहा जमाना के बिदरोह त आय । कथे निही -

भूख न देखय जूठा भात
मया न देखय जात कुजात

छत्तीसगढ के धीर–बीर यदुबंसी मन के लक्छ ला पाये के हठ, घीउ पियाये तेंदूसार के लउठी अउ ओखर फटकार, नेम-धरम अउ रहन-सहन ला लोकगाथा मा मिंझार के ‘लोरिकायन’ के रूप म परसतुत करे गे रहिस । ये कहिनी म जहां जीउ-परान दे के अपन मया के पत राखे के बात हे, उंहचे येमा बोली बचन खातिर मर मिटे के संदेस घलो हावय । लोरिक चंदा ला छत्तीसगढ मा कोनो बांस गीत मा गाथे त कोनों चंदैनी सैली मा, फेर ये कहिनी अपन ‘लाईट एण्‍ड साउंड’ सैली म साक्छात बडे मंच मा परगट होये ले हिरदे के भितर तक ले पइठगे ।

निर्देसक गोपाल शर्मा के बात येला देख के सिरतोन लागथे कि ‘ कहिनी के कांदा ह कल्पाना के फोरन बिन नई मिठावय ।‘ छत्तीसगढ के लोक संस्कृति के गियानी प्रेम साईमन के कहिनी मा क्षितिज रंग शिविर के फोरन अउ संगीतकार उत्तम तिवारी के संगीत संग परसतुत ये साग ह अतका मिठाइस कि देखइया मन नांच-नाच के अंगरी चांट-चांट के अघावत ले खाईन फेर नइ अघाइन ।

ये सुघ्घर परिकल्पलना ला साकार करइया क्षितिज रंग शिविर दुर्ग हा सन् 1977 ले अपन पहरो म कतकोन खंचवा-डिपरा, खोल्दावन अउ चिखला मा रेंगे हे । ये 31 बछर मा ये संस्था- कतकोन स्टेज नाटक अउ नुक्कड नाटक के मंचन, सेमिनार संग प्रसिक्छन सिबिर घलो आयोजित करे हे । राष्ट्रीय स्‍तर के मुकाबला मन मा घलो हाजिरी लगा के अडबड अकन इनाम मन ला अपन झांपी मा सकेले हावय ।

क्षितिज रंग शिविर के अंवतरिया, माई मुखिया अउ समरपित कलाकार मन के लगन मिहनत, उछाह संग पछीना गार के, खांध मा खांध जोर के संग देवदया संगवारी मन ह ये संस्था के नाव ला उंचहा ठउर तक ले अमराए के भरपूर जोम करें हें ।

छत्तीसगढ के लोकगाथा गाए के मनभावन परमपरा म चुरे-पके ‘लोरिक चंदा’ ह ये भुइया के कोरा मा, फुगडी खेलत समय के संगे-संग मया के महक बगरावत सबर दिन ले महकत रहय, हमर इही आसिरबाद हे ।

संजीव तिवारी

4 आपमन के गोठ (comments):

priya October 7, 2008 10:44 AM  

sanjeet g athu hindi mai likhtae o bahutai khui hoti..kuki meri samajh me bhi kuch aa jata.:(

दीपक October 7, 2008 4:58 PM  

"ये दे गावत हाबे चंदा लोरिक हा तोर "के सुरता देवादेव आप हा!!मेहनत अबिरथा न‍इ जाये भैय्या!!

कोई भी कोशीश कभी नाकाम हो सकती नही ॥
मंजीले ना भी मिले तो फ़ासले घट जायेंगे॥

योगेन्द्र मौदगिल October 7, 2008 7:22 PM  

इससे पूर्व की पोस्ट में दलित जी की दूसरी कुंडली बहुत अच्छी लगी
लोरिकायन की पोस्ट से काम नहीं चलेगा
३६गढ़ में आकर देखना पड़ेगा
खैर
मुझे २००४ की गीदम यात्रा स्मरण हो आई

समीर यादव October 8, 2008 1:24 PM  

कई ठन नाव अउ काम हवय छत्तीसगढ़ म जौन मन ला हमला आगू लाना हवय...एक सरलग डोरी के ये शुरुवाती कड़ी..बधाई हो संजीव भाई.

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