Saturday, December 13, 2008

दिसाहीनता - सुधा वर्मा

एक समय रहिस हे जब हर पढ़इया अपन गुरू के सम्मान करंय। रद्दा म रेंगत गुरूजी ह हर राहगीर सम्मान के नजर ले देखय। गांव के इसकूल म जब नवा गुरूजी जाथे। त गांव के खाली घर ओखर बर जोहथे। किराया के बात रहिबे नइ करय। गांव के हर मनखे ओला सहयोग देथे, ओखर सम्मान करथे। जुन्ना समय म गुरूकुल राहय। जिंहा बडे-बडे राजा -महाराजा के लइका मन राहंय अउ अपन गुरू के सेवा करंय। धीरे-धीरे समय बदलत गिस। सम्मान के भावना कम होवत गिस आज तो स्थिति मारपीट तक पहुंच गे हावय। असंतोस भावना के परिनाम आय। आज हमर ससंकिरती ह सिक्छा के छेत्र म दिखबे नइ करय।

गुरू के पैर छूना ह हांथ तक पहुंच गे, अब हांथ मिलाथें। धीरे-धीरे ये हाथ ह शाल अऊ सिर तक ओखर बाद पीठ तक पहुंच गे हावय। अब कोनो भी सिक्छक लइका ल सुधारे बर या ओखर गल्ती बर डांट नइ सकय। आज डांटही त रात तक ओकर ठोक-पिटाई हो जाथे। अपन आप ल एक नायक साबित करेबर लइकामन कुछ भी कर सकथें।

संस्कार घर ले आथे। आज के मां-बाप घर म टीवी के आगू म बइठे-बइठे एक सिक्छक के चिट्ठा-पिट्ठा खेलत रहिथे ओला गारी देथे। तब लइका ह तो ओला सिखबे करही। दूसर कारन हे सिक्छक स्वयं। सिक्छक के व्यवहार हर लइका ले अगल-अलग रहिथे। नम्बर देय म सिक्छक भेदभाव कर थे। लइकामन ल समझना छोड़के समझाना चालू कर देथे। लइकामन के मन उही मेर ले असंतोस चालू हो जथे। ओखर रूप आज के सिक्छक छेत्र दिखाई देथे। सम्मान पाना हे त सम्मान देना जरूरी हे। यदि पूर्व छात्र जेन अब माता-पिता हे तेन मन रद्दा ले भटक गे हावय त हमन ल आज ऊंखर लइका ल सही रद्दा देखाय के जरूरत हे। वातावरन म सुधार के जरूरत हे एखरबर सब जिम्मेदार हें।

-सुधा वर्मा

1 आपमन के गोठ (comments):

दीपक December 18, 2008 10:05 PM  

सुधा जी आप जेन काहत हव तेन ला माने बर परही फ़ेर एकर जादा जिम्मेदार गुरुजी च मन हे संझा के दारू भठ्ठी मा जाके देख लव आधा ले जादा गुरुजी मिलही !!

मेहर खुद पहिली गुरुजी रहे हव पाछु बरस घर गे रहे हव त मोर पढाए लईका मन हा रद्दा मा मिलगे अभी वोमन हर कालेज मा हाबे भरे रोड मा गोड धर के पांव परीन । ए सब मेहर अप बखान करे बर नई कहात हव मेहर बस अतका काहत हव परंपरा अऊ संस्कार अभी खतम नई होये हे हा अपन ईज्जत अपन हाथ मा हे जेन ला गुरुजी मन धीरे-धीरे गंवावत हाबे ....

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