Tuesday, June 16, 2009

छत्तीसगढिय़ा हांव मैं

छत्तीसगढिय़ा हांव मैं
सब ले बढिय़ा हांव मैं
इहां के पानी इहां के माटी
रहईयां इहां के इहां के भूईय्या
कहे सोन चिरईय्या हंव मैं
छत्तीसगढ़ के मोर भुईय्या ला धान कटोरा कईथे
सब्बों धरम के संगी साथी जुरमिल के बने रहिथे
लड़ई अऊ झगड़ा ले दूर रहिथें
हम सब झने मन एक हे कहिथें
अऊ कहिथे-छत्तीसगढिय़ां हंव मैं
सबले बढिय़ा हंव मैं
बस्तर के डोंगरी मन मा बड़ लोहाय लोहा भरे
देवभोग के डोंगरी तीर तीर मा हिरा लबालब गडे
सिसम अऊ सागौन के रूख के हरियर
चिरई मन ऐती ओती उडथे भर भर
अऊ कहिथए
छत्तीसगढय़ा हांव मैं
सब ले बडिय़ा हांव मैं
इहां के पानी इहां के माटी
रहईया इहां के इहां के भूईय्या
कहे सोन चिरईय्या हंन मैं छत्तीसगढिय़ा हांव मैं
सब ले बढिय़ा हांव मैं

1 आपमन के गोठ (comments):

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi June 16, 2009 7:59 PM  

बहुत सुंदर लोकगीत के लिए आभार। लोक भावना तो यही है जो इस गीत में अभिव्यक्त हुई है।

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