Friday, January 30, 2009

हाय रे मोर मंगरोहन कहिनी - डॉ. सत्यभामा आड़िल

बीस बछर होगे ये बड़े सहर मं रहत, फेर नौकर-चाकर मिले के अतेक परेसानी कभु नई होईस। रईपुर ह रजधानी का बनिस, काम-बूता के कमती नई। भाव बढ़गे काम करईया मन के। घर के काम बर घलो कोनो नई मिलय। कहूं मिलगे एकाध झन, त सिर ऊपर करके, जबान लड़ाके बराबरी मं बात करथें। उड़िया बस्ती अब्बड़ होगे। रईपुर सहर ह उड़ीसा राज ले सीधा-साधा जुड़े हे। सड़क, रेल, जंगल सबो डहार ले उड़िया मनखे मन आथे अऊ जाथें। सीधा जगन्नाथ भगवान करा पहुंच जथें। उड़ीसा ले बेपारी मन अऊ काम खोजईया, बूता करईया मन आथें। आदमी जात रिक्सा चला, औरत जात घर-घर बरतन मांजथें। काम-बूता करे ले पईसा मिलथे। पईसा ले चाउर-दार आथे। चाउर-दार ले पेट भरथे। पेट भरे ले जिनगी चलथे ये बात ला खूब समझथें उड़िया मन। जल्दी-जल्दी काम सीखथें अऊ चलता-पुरजा बन जथें। मनखे के जरूरत ह ओला हुसियार बना देथे।
छत्तीसगढ़ के राजधानी ये रईपुर। चारों खूंट गांव। गांव के मन घलो बूता खोजे बर आथें। गांव मं किसानी काम करके सहर कोत आथें। का आदमी, का औरत, का लईका। अब तो पूरा परिवार आके बसत जाथें। कोनो डेरी में दूध अऊ गाय-गरुआ के काम करथें, अऊ सड़क बनई म घलो आदमी, औरत काम करथें। भाव बढ़गे। पहिली दू सौ रुपिया मं घर के काम करयं बरतन चौका, झाड़ू-पोंछा। अब पांच सौ रुपिया मं करथें। हमला ओ मन जवाब देथें, जानो-मानो हम ओखर करा काम मांगथन।
कहिथें, ''सुनव मांजी, तुंहर तनखा बाढ़थे, महंगई बाढ़थे। हमर तनखा कईसे नई बाढ़ही। तुंहर गरज हे त काम करावव, नई ते हम दूसर घर काम म लग जाबो। काम के कमती नइए बिल्डिंग बनत जाथे। मोरे करा बात करेके टईम नइए।'' अऊ रेंगत बनथे कामवाली।
धन्न रे राजधानी। काली, सुखिया नांव के बाई अईस।
कहिस, ''एक हजार रुपिया महिना देबे त बता बूता करहूं। ए नोनी ल घलो संग मं लाने हंव। तुंहर गमला के फूल-पान मं पानी दे दिही। पाईप लगा देबे। तोर अटके-फटके छोटे-छोटे बूता कर दिही। जूता-चप्पल मं बरस मार देही, तुंहर सोफा मन ल झर्रा देही, धुर्रा माड़ जाथे न? मंय ह बड़े काम ल कर दुहूं। दूनों झन के बूता ल मिला के एक हजार रुपिया देबे।''
सुखिया ह गांव ले आए, फेर सहर के हवा लगे बाई लगिस। सोचेंव, जऊन आथे तऊन ह आठ सौ, बारा सौ अईसने मांगत रहिथें, चलव, इही ल लगा लेथंव सोच के केहेंव, ''ठीक हे, काली ले आ जबे सुखिया।'' सुखिया हां कहिके चल दिस। रात के सोंचेव। ओखर संग आए नोनी करा, का-का काम कराहूं? अऊ सुखिया करा का-का काम कराहूं?
बिहनिया चाय-पानी होगे। बेटा मन कॉलेज चल दिन। साहेब घलो ऑफिस चल दिस। नौ बजे के बाद सुखिया नोनी संग अईस। बाहिर मं चप्पल उतारिन दूनों झन। मोर केहे के पहिलीच अंगना के कोंटा मं माड़े पाईप ल नल मं फिट करके नोनी ल धरईस अऊ कहिस-''जा, सब गमला मं पानी दे, झाड़-झरोखा ल बने नहवा, तहां ले अंगना ल धो, बांस बाहिरी म घर के पानी ल बहारबे अऊ खोर ल घलो बहारबे।'' नोनी हव कहिके कूदत-नाचत पाईप लेके चल दिस।
सुखिया ह, बरतन ल बाहिर निकालिस अंगना मां पहिली पानी डार के भिगोईस। तहां ले मोर करा फूल बाहिरी मांगिस। ''कुरिया के ठन हे मांजी बता दे, कचरा कती फेंकहूं, इहू ल बता दे राह'' कहिके चारों कुरिया बाहरिस। सुपली मं कचरा भर के एक ठन कचरा बाल्टी मं डारिस। बाल्टी ल तिरिया के मड़ईस। पोंछा लगईस सबो कुरिया मं। देखत रहेंव कोना-काना सबो ल पोंछिस। तहाँ ले बरतन मांजे बर बईठिस। साबुन म रगड़-रगड़ के बरतन मांजिस-धोईस। कनिहा ले पोलिथिन निकालिस, ओमा छेना के राख लाने रहाय, तवा अऊ कड़ाही ल घस-घस के मांजिस चकाचक बरतन दिखे ले लागिस। मोर मन खुश होगे।'' दू कप चाय बनाएंव। काम-बूता खतम होगे। नोनी घलो अंगना-दुवार धो डरिस। बाहिर निकरके देखेंव। मन खुस होगे। जिनगी मं पहलिी बेर अईसन कामवाली पायेंव जऊन बिना टोका-टाकी के अपन घर जईसे काम करिस। दूनों झन बर दू कप चाय ढारेंव- ''सुखिया, नोनी आव चाय पी लव।'' सुखिया
कहिथे, ''कचरा फेंक के आवथंव मांजी।''
ओतके मं नोनी ह चहुंके, हांसत-हांसत कहिथे-''दाई मंय तो कचरा घलो फेंक के आ गेंव। बाल्टी ल धो के मड़ादेंव।''
''सिरतोन?''
''हाँ'' तारी बजाके नोनी हांसथे।
''हाय रे मोर मंगरोहन! आगू-आगू ले बूता करथस।'' सुखिया ओला पोटार के चूमिस।
मंय अईसन मयारुक सुघ्घर संसार पहिली बेर देखेंव अऊ जानेंव। दूनो झन चाय पिईन। मंय पूछेंव, ''मंगरोहन'' काला कईथें?'' ''जऊन आगू-आगू काम ल निपटा देथे। बाधा ल भगाथे।'' सुखिया मोला सुख देईस। मंय ओखर तनखा ला आज डेढ़ हजार कर देय हंव।- पांच बछर मं पांच सौ बढा देंव।
-डॉ. सत्यभामा आड़िल
शंकर नगर, रायपुर

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Wednesday, January 28, 2009

अंधरी के बेटा - विट्ठलराम साहू 'निश्छल'

एक झन राजा रिहिस। ओ हा अपन राज म बजार लगवाय। ओखर फरमान रिहिस कि जऊन जिनिस हा सांझ के होवत ले नई बेचाही तौन जिनिस ला राजा के खजाना ले पइसा दे राख लेय जाय। एक झन मूरति बनईया करा राक्छसिन के मूरति बांचगे ओला कोन्हों नई लीन। जान-बूझ के माछी कौन खाय? पइसा दे के राक्छसिन ला कोन ले ही? सांझ किन ओ मूरति ल राजा ल लेय बर परगे। राक्छसिन तो राक्छसिन ये। राक्छसिन हा राजा ला कहिथे, 'मोला पइसा डार के लेय हस, बने बात ए। फेर मैं जौंन कहूं तौन ला तोला माने बर परही।'
राजा किहिस, 'मानहूं, का बात ये बता।' त राक्छसिन कहिथे, 'तोर तीनों रानी के आंखी ल निकार के ओमन ला जंगल डाहार खेदार दे।' राजा बपुरा का करय? अपन तीनों रानी के आंखी ला निकाल के खेद देथे। छोटे रानी हा पेट में रहिथे। बिचारी ह कटाकट जंगल मां एक ठन पीपर रूख के तरि मां बइठे पीपर के फर मन ला बीन-बीन के खावय अऊ डबरा-खोंचका के पानी ल पिए। एक दिन ओखर एक ठन बेटा होईस। ओखर नाव राखिस बिजयपाल। ओखर बेटा हा दिन के दिन बाढ़हत गिस। एक दिन एक झन राजा हा उही सोज ले जावत राहाय। ओखर मेर ले तीर-कमान मांग लिस। अब ओ हा सिकार करे लगिस। सिकार मा जौंन मिलय तेन ला अपन दाई मन ला अऊ अपनो खावय। एक दिन ओ हा अपन दाई मन के अंधरी होय के किस्सा ला सुनिस। सुन के ओ राक्छसिन मेंर गिस। उहां जाके कहिथे, 'अब मैं हा इंहे रहूं।' राक्छसिन डर्रागे।
ओ किहिस, 'पहिली तैं मोर दाई मेर जा के ओखर सोर ले के आ तब राखहूं। राक्छसिन हा चाल चले रिहिस, ये टूरा हा ऊंहा जाही त मोर दाई उहां जाही त मोर दाई हा येला बचावय नहीं, खा डारही।' राक्छसिन के दाई के पता-ठिकाना ला पूछके बिजयपाल हा ऊहां पहुंचगे। ऊहां जा के ओ राक्छसिन ला ममादाई केहे लगिस अऊ ऊंहे रेहे लगिस। कुछ दिन बिते ले बिजयपाल हा पूछथे, 'कस ममादाई ये छै ठन आंखी हा टंगाय हे, तेन हा काखर ये?' राक्छसिन हा कहिथे, 'ये हा एक झन राजा के तीन झन रानी मन के आय बेटा। तोर दाई हा ये आंखी ला निकलवा के इंहे भेजे हावय।' ओखर ले फेर पूछिस, 'ये आंखी हा फेर कइसे लग जही ममादाई?' राक्छसिन किहिस, 'एक जघा मा रोज नांवा-नांवा धान के खेत हावय ऊंहा रोज धान बोथें अऊ रोज धान लुथें। ओ धान के चाउर के पसिया मा ये आंखी ला चटका देय ले आंखी ले दिख जथे।'
अब का पूछबे- बिजयपाल हा ओ आंखी मन ला धर के ले लानिस अऊ धान के खेत मां पहुंच गे। खेत के पांच बाली ला टोर के धर लीस अऊ घर आगे। चार बाली ला कूट के भात रांधिस। ओखर पसिया मां अपन तीनों झन महतारी मन के आंखी ला चटका दिस। एक ठन बाली ला बो दिस। जब धान हा पाक के तियार हो गिस त लू के कूट-छर के रोज भात रांध-रांध के ओ मन ला खवाए लगिस।
उंखर आंखी म दिखे लगिस। धीरे-धीरे ओखर खेती किसानी बाढ़ गे। नौकर-चाकर होगे। बड़े जनी घर घलो बना डारिस। एक दिन फेर अपन राक्छसिन ममादाई घर पहुंचिस। ओ हा राक्छसिन ममादाई घर एक ठन डंडा देखिस। डंडा के बारे मं पूछिस, त ममादाई बतईस, 'ये हा अइसन डंडा आय बेटा, जेखर हांत मां ये डंडा रही तौन हा कतको ढोर-ढांगर, अदमी ला अपन बस म कर सकत हे।'
बिजयपाल हा मऊका देख के ओ डंडा ला ले लानिस। घर आ के डंडा ला धर के बरदी के बरदी गाय, भईंस, बईला मन ला अपन घर ले लानिस। खेती-बारी, मजदूरी करईया अउ ढोर चरईया कतको आदमी मन ला डंडा के बल म ले लानिस। अब ओखर कारोबार जोरदार चले लगिस।
एक दिन एक झन राजा अईस। ओ हा अपन लड़की के बिहाव बिजयपाल से कर दिस। अपन राजपाठ तक ला दे दिस। बिजयपाल अब राजा बनगे। फेर सोचिस कि कहूं ओ राक्छसिन ला जनबा हो जही त मोला छोंड़य नहीं। तेखर ले उहू ल ठिकाना लगा देना चाही। ओ हा फेर राक्छसिन ममादाई करा पहुंचिस। दु ठन सेंदूर भरे के डबिया ला देख के पूछिस, 'कस ममादाई ये हा का के डबिया आय?'
राक्छसिन बतईस, 'बेटा एला झन छूबे। ये डबिया मां तोर दाई अऊ मोर जीव हे। डबिया ल खोलते साठ हम दूनों झन महतारी-बेटी मर जबो बेटा।' एक दिन बिजयपाल हा कलेचुप ओ डबिया मन ला धर के ले लानिस। जइसे ओला खोलिस ओ राक्छसिन महतारी-बेटी मन मर गें। अब बिजयपाल अपन बाप मेर पहुंचिस। अपन परचय दिस। बाप-बेटा एक-दूसर ला पोटार के मिलीन। बाप के राजपाठ ह घलो बिजयपाल ला मिलगे। अब का पूछबे? ओखर दिन सोन के अउ रात चांदी के होगे।
कहिनी उरकगे, मने-मन येखर अरथ समझव। अंधरी के बेटा सहिक तुंहरो भाग जागे।

-विट्ठलराम साहू 'निश्छल'
मौंवहारी भाठा
महासमुंद (छ.ग.)

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Monday, January 26, 2009

नान्हें कहिनी गुरुजी के सीख - राघवेन्द्र अग्रवाल

''बेटा तें ह किसानी म झिन पर गा, ऐमा गुजारा नि होवय, कछेरी म बाबू बन जा त रटाटोर पइसा पाबे अउ हमर हालत सुधर जाही। ओकर बाबू कथे-ददा! ते किसानी ल अपन ढंग ले करत रहे, में ह तो किसानीच्च करिहा। ते देखबे तो कइसे हमर दसा ह नि सुधरही तेला।
ए क दिन गुरूजी ह अपन कक्षा के लइकामन सोज पूछिस-''तुमन पढ़ के काय बनना चाहत हो? लइकामन कथें- गुरूजी में डाक्टर बनिहां। गुरूजी में मिस्त्री बनिहां। एक झिन लइका कथे-''गुरूजी मोर घर म किसानी हे मे ह किसानी करिहां।'' वोकर बात ल सुन के सबे लइका हांसे लागिन। कहिन- ''अरे जोजवा! किसानी करे बर का पढे बर लागथे अनपढ़ किसानी करथे। काय करबे तेंह पढ़-लिख के?'' ऊंकर बात ल सुन के गुरुजी कथे- सुनव लइका हो! पढ़ेबर सबे ला लागथे पढे-लिखे के परिनाम ह सफलता के रूप म मिलथे। सबे मनसे कुछु न कुछु बनना चाहथे। एकर खातिर एक ठन लक्ष्य बनाय बर लागथे। सबसे जादा सफल उही मनखें होथे जेन ह अपन जिनगी के लक्ष निरधारन कर ले हे अऊ वोला पायबर पोट्ठ मिहनत करे हे। पढ़े-लिखे ले मनसे के भीतर गियान आथे अउ अपन कारज ला कइसे करे जाय एकर इलम आथे। किसान भाई मन पढ़ के जादा अन्न उपजाय के बात ल बिचार करके वैज्ञानिक ढंग से खेती ल करही त उपज जादा होही। उपज जादा होही त पइसा जादा मिलही अऊ पइसा जादा मिलही त रहन-सहन अचहा होही अउ अपन लइकामन ला घला पढ़ाय लिखाय सकहीं। आज पइसा के अभाव म गांव म शिक्षा के कमी हे तेन पाय के जागरिति नइए, अउ दूसर के बुध म आ के अपन नुकसान कर डारथें। त किसानी करइय्या ल हांसना नि चाही काबर उंकरे भरोसा शहर वाले के जिनगी ह चलत हे पढे-लिखे मन के काम कइसना होथे एक ठन नानकन किस्सा अपन गांव के सुनावत हंव। धियान लगाके सुनव। हमर गांव म एक झन मंडल के नाव हे रसहा दस अक्कड़ के किसान ये फेर सगर दिन ररूहा के ररूहा। निस्तार के पुरती घला अन्न ह नइ होवय। वोकर एक झिन बाबू रहय ''गियानू''। ते ह पढ़ -लिख के बने हुसियार होगे। वोकर ददा ररूहा ह कथे- ''बेटा तें ह किसानी म झिन पर गा, ऐमा गुजारा नि होवय, कछेरी म बाबू बन जा त रटाटोर पइसा पाबे अउ हमर हालत ह सुधर जाही।'' वोकर बाबू कथे- ''ददा! तें किसानी ल अपन ढंग से करत रहे। में ह तो किसानीच्च करिहां। वे देखबे तो कइसे हमर दसा ह नि सुधरही तेला।'' येदे वो ह किसानी म लग गे जिहां दस अक्कड़ म पचास बोरा धान लेत रहय तिहां तीन सौ बोरा धान होय लगिस। अपन किसानी के जनावर मन ल पोट्ठ दाना-भूंसा खवावय, समय म खेती के काम ल करय। ओकर एक ठन बाना रहय ''खेतीराम आगू'' अपन पढ़ई के पूरा फायदा उठाइस अउ गांव भर ले आगू होगे। अउ घर भरगे। त- खूब पढ़व-लिखव अउ जउन जहां जाहा अपन काम ल मिहनत अउ लगन ले करिहा त जिनगी म सुखी तो रहिहौच्च, नावं घला कमाहू।

-राघवेन्द्र अग्रवाल खैरघटा वाले
बलौदाबाजार

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Saturday, January 24, 2009

गुरुबाचा कहिनी - किसान दीवान

एक दिन अपन ल संवासे नी सकिस सुखरू। घातेच किलोली करके भतीजा के बिहा में संघरना जरूरी हे, ओखर दई-बाप नइए, अइसे ओखी करके, छुट्टी मा गिस। कन्हैयालाल मानेजर नंगत सुलहारिस, सेधे के लईक उल्था देईस। जल्दी तरक्की देय के वादा करिस। फेर सुखऊ मानबे नी करिस अउ आज दू हफ्ता होगे। नउकरी खोजत किंजरत हे। नउकरी मिले त झन मिले, बीए डिग्री तो पूरा करनाच हे। दही बरा सपेट के पइसा पटईस अऊ चलिस संगी मन सन मिले बर। रसता म एक झन गुरुजी मिलिस बिसनाथ पटेल। देखतेच बलईस, पूछिस- सुने हंव तैं पेंटिग काम छोड़ देय काबर? ''हां गुरुजी, अऊ पढ़हू कहिके।'' ''डेरी गोड़ के चूरा, पीतल तोड़ा धमतरी के सदल में कुदाले घोड़ा''
सतजुगहा ददरिया के सुग्घर बोल सुरता करत, सुखऊराम हर मठपारा ले बिलईमाता कोत घोड़ा दौड़ाय के मजा लीस। संझाती बेरा में सकेला सदल हर बजरहा रोहों-पोहों म सनाय राहय। एक ठन ठेपर्री होटल म चाहा पीईस अऊ रेंग दीस गोकुलपुर होवत जालिमपुर के बसनाहा पारा कोत। सोंचे रिहिस हे अनंदी भइया घरे म होही। ओड़िया मन के बरहा अऊ बंगाली मन के बदक ओनहा-कोनहा ल खिंधोलत रिहिस, फेर अनंदी नई रिहिस घर म। सुखऊ चल दिस ओकर दफ्तर कोत। एक मन आगर मिलिन अऊ अनंदी ओला रात भर रुके बर किहिस, अनंदी भारतीय खाद्य गोदाम म चौकीदार राहय। सुखऊ, एको ठन नान-मुन काम खोजत राहय। बिलईगढ़ ले सुखऊ चिट्ठी भेजे रिहिस-भइया ये हरर-हरर किंजर के पोस्टर बनई तो चर दिनिया बुता हे। ऊहूं म ये गोहड़ी मोला पोसावत नई हे...।
रात कन उही दफ्तर के परछी मं सुते के तियारी होइस। अनंदी अऊ तीन इक चौकीदार छोकरा मन नंगत बेर ले ही-ही बक-बक करत रिहिन। फूहरे-फुहर बकंय घलो। पइसा के तंगई, महंगई अऊ दोगलई के किस्सा गोठियात संसो करत राहंय। सुखऊ सोचथे- बाप रे, चौकीदार ले अपीसर मन बर कतको भितरौंधी कमई के रद्दा हे तभो ले पइसा के तंगई रथे। तभे गोठ बात म एक झन कथे-
''अरे अनंदी भाऊ वो नांदगांव वाला केस सुने हवस?''
''हां यार'' अनंदी अपन आदम म ऊंचहा भाखा म किहिस। ''अबे ओकर कुछु नी होइस, सात चुंगड़ी गहूं अऊ पांच चुंगड़ी चउर रिहिसे।''
''सक्कर तो घला रिहिस का रे'' एक झन हा तिखारिस। गोठ-बात म राशन के हेराफेरी पकड़ा गिस। फेर कुछू सजा नी होइस। जोरहा दबाव म जांच रिपोर्ट देय गिस- सब घुना गेय रिहिस। ''खाथे जी सब खाथें साले'' लमगोड़वा चौकीदार कथे-''काहे मेजाल्टी होना चाही, फेर कोनो टेड़गा नी कर संकय।''
ये बात सबे ला सेध गेय रिहिस। एक झन कथे, ''अऊ का जी कुछू नी होय, कतको जगा तो चौकीदार मन मजा मारत हें। हमीमन जोजवा हन।''
आज काल इही संसो पेरत हे सब झन ला। अनियाव, दोगलई, घपला, दादागिरी नी कर सके, तेला सब झन अलगोजवा कथें। तेकरे सेती नीत-धरम वाला मन अपन ला छोटे समझे धर लिन हें।
बिहनियां, सुखऊ जल्दी तियार होइस। पहिली बस म घला भीड़ गंजाय राहय मन मढ़ाय बर वोहा एक ठन किताब निकालिस, ते कतको झन के आंखी ले लार चुही गे। दू झन तो किलोली करके पत्रिका मांगिन, मन मड़हईन। एक झन अऊ मांगीस, फेर सुखऊ नई दीस। मने मन कंझईस-अइसने नान-नान जिनिस ल जिहां-तिहां काबर मांगथें। सकत नई चले ततका सुवारथ काबर बढ़ाथैं? रइपुर बस टेसन हबरत ले, झांझ-घाम उलहा गेय राहय। सुखऊ रोको-पोको उतरिस अऊ रेलवही कोत रेंगिस। बस्ती टिकिटघर म रेलवे समय सारिणी के बाजू म परिवार नियोजन के तीन बच्छर जुन्ना पोस्टर दिखिस। ओमा फदफद्दा पान पुरके राहंय। सुरता आथे अइसने पान पुरकई तो ठंव-ठंव हे। कचरा अऊ बसउना के सब कोती राज हे। बस अऊ रेल टेसन म तो जगा-जगा थूकन कोटना (पीकदान) रखाय रथे। फेर जनता के राज हे न परजातंत्र। चरझनिया जगा होय तो कुछू जीनिस, सब ला मइलाय के हथियाय के बिगाड़े के अधिकार हे कोन हे कहइया..?
अपन सुवारथ म छंदाय मनखे मन, थोरकन कमा के अऊ बिन कमाय, जादा ले जादा पाय के, बगोड़े के तिकड़म मं बेंझाय हवैं। कुछू करे बिना, खतरिहा कमेलहा के खड़री ओढ़े के चलन कती ले, कइसे पसर गे? कोन जाने? गुनत-ओरखत बिसरू थोरिक बेर म महासमुन्द बस देख पारिस। छूटतेच रिहिस, हांत हलात दउड़िस, धरा रपटा चढिस। बेरा ढरकत महासमुन्द पहुंच गे। मन हरछिन्छा, उलहाय कस लागिस। पेट कुलबुलात रिहिस। चल बने कुछू खा लेंव, बाबूलाल होटल मां सेव-बुन्दी अऊ बालूसाही सबले जादा भाथे। गरमी बहुत हे, आज दही-बरा खा लेथों, सोंच के मंगईस-गपागप झाड़िस। सुरता म कानपुर के अलका पब्लिसीटी संग बिताय हाल-चाल तऊर गे... अइसे तो कोनों होटल मं जुरिया के खावन। फेर कभू-कभू सांझ कन अपन हांत जगन्नाथ वाला खाना-पीना चले। खाय के पहिली सब झन भांग घोट के, पेड़ा-बरफी संग खावंय। सुखऊ कुछू लिखा-पढ़ी करत राहय, पेड़ा-बरफी तो मिलबे करे।
भांग चढ़े, तभे खांवय, सुखऊ ल पहिली ले जोजिया के खवा देंवय। काबर के ओमन अड़बड़ बकबकाय। आंटा टेर्री करंय। एको घांव झंझट गहिरा जावय ते ''मारिच डारहूं रे'' धमकी चलावंय। सुखऊ भीतरे भीतर कपसत राहय। ऊंकर उर्रही भाखा म बपरा के पोटा सुखात राहय। कहूं कोनो बात ओकर कोत धंवाही, त काय करही? पल्ला भागही... भिरभिरा जाय सुखऊ के अंतस। वोहा बिन गतर के लवारिस कस हो जाय। कहूं एको दिन ये बइझड़ मन मार के फेंक देही त? सिहर जाय अइसन सोच के। वोला संसो पर जाय इंकर सन रहिके वहू घला उजड्ड अऊ बकराहा हो जाही।
एक दिन अपन ल संवासे नी सकिस सुखरू। घातेच किलोली करके भतीजा के बिहा में संघरना जरूरी हे, ओखर दई-बाप नीये, अइसे ओखी करके, छुट्टी मा गिस। कन्हैयालाल मानेजर नंगत सुलहारिस, सेधे के लई उल्था देईच। जल्दी तरक्की देय के वादा करिस। फेर सुखऊ मानबे नी करिस अउ आज दू हफ्ता होगे। नउकरी खोजत किंजरत हे। नउकरी मिले त झन मिले, बीए डिग्री तो पूरा करनाच हे। दही-बरा सपेट के पइसा पटईस अऊ चलिस संगी मन सन मिले बर। रस्ता म एक झन गुरुजी मिलिस बिसनाथ पटेल। देखतेच बलईस, पूछिस- ''सुने हंव तै पेंटिग काम छोड़ देय, काबर? ''
''हां गुरुजी, अऊ पढ़हू कहिके'' सीताराम कस सुखऊ कहिस। ''पढबे?'' गुरजी के मुहूं जानो-मानो भसियागे, मन तिरिमिरागे- ''काय करबे पढ़के? नेतागिरी? धुन बाबूगिरी?'' ''नीहीऽऽऽ'' तगड़ा छटारा खाय कस दंदर गे, अतेक गंसिया ताना सुनके अकलहा गीस सुखऊ। गुरुजी खचित जानथे। गणित-बिज्ञान म सबले हुसियार रेहे के सेती, सबे गुरुजी मन ओला। बाबू, पटवारी, कस उल्लुर नउकरी के जगा इंजीनियर बने के असीद अऊ हौसला देवंय। भीतरी ले सेधाय ताना म सुकुड़दुम राहय सुखऊ। त गुरुजी हर उमेलथे।''
''अरे लिख-पढ़ के आखिर उही नउकरी बर, जिही-तिही करा नाक रगड़बे ना... ककरो जेब भरबे, किस्मत ले मिली जाही ते डेढ़ दू सौ रुपिया म गुलामी करबेना? उहां खा-पी के ढाई सौ रुपिया मिलत रिहिस, का टूटा रिहिसे?'' गुरुजी थोरिक मयारू कस पुचकारिस- ''तैं तो बाबू, अपन कला के बढ़ोतरी म बाधा करत हवस।''
''गुरुजी, गुर-जी वो काहे ऊंकर रासा-बासा, अलकरहा रिहिसे, हाड़-मूड बुता राहय।''
''अरे त कोन मार के कोलिहा-कुकुर नीते मरी मसान ये। उहू मन मनखेच तांय?''
गुरुजी सारिस- ''इसकूल मं तै सबले लईकदार विद्यार्थी रेहे। पेंटिंग, गीत-संगीत, अभिनय, अऊ मुखिया गिरी म कोनो तोर पार नई पावंय। फेर जिए के आघू बड़हे के रद्दा मं तैं तो नीचट सोरलो दिखत हवस सुखऊ राम। ये जतेक संगी-साथी है न जतेक मोहलो-मोहलो करके गुन गावत रथें...बिगड़े हालत में गोठियाना घला गरु समझहीं।''
सुखऊ ल अपन गलती दिखे धरिस। काम-कमई मं ऊंच-नीच के सपेटा तो परथेच, वोहा जानत रिहिस, फेर बड़े डिगरी के कमाल जादा मन भाय रिहिसे। अब जौन होवय-निपटहूं अइसे सोंच के मुड़ी निहार के गेपगेपाय कस सुनत राहय। गुरुजी, चबुलात पान ल पुरकिस, सीजन सुरकिस अऊ ठांसिस- ''अरे बाबू जतेक ये उात खादीधारी देखथस न, जेमन सबले बानी वाला, ऊंचहा चाल -चलन अऊ सब गोसइंया कहलाथें। देस, समाज, के सेवा अऊ तरक्की के चोनहा बगराथे, ईमान-धरम गुनगियान के ठेकादारी करथें... उही मन रात के अंधियारी म रुपिया के पाछू पगलाय रथें। आज के मानगुन, नीत-नियाव, मया-दया सब ''रुपिया'' हे।''
''का किथस गुरुजी?'' सुखऊ अकबका के पूछिस। ''सोला आना सिरतम कथों भई'' गुरुजी अपन बात म अड़गे- ''ये जतेक ऊंचहा नेत-घात, दया-धरम, मनसे-मनसे म बराबरी ये सब किताब के गाहना-गुरिया आय। दूसर मन ला उम्हियाय बर काम आथे। जिए-खाय के, जिनगी बनाय के रद्दा मं इंकर पाछू धरही ते धारे-धार बोहाही... चतुरई अऊ छल फुसारी के जबाना हे जाने?''
बड़े भई कस पटेल गुरुजी के उल्था, थोरथार कन्हैया मानेजर के गोठ सन जुरे कस लागिस। वो तो केहे हावे- ''जब मन करही, चले आबे, पता लिखले...'' सुखऊ गंठिया लीस, मन मं अब आ गेंव त कुछू हो जाय डिग्री डिप्लोमा ले के रहूं। कमइया बर काम के अंकाल नइये। ढेरहा, ओथराहा अऊ पंगपंगहा मन नउकरी बर लुलवाथे। जीयई के मतलब नउकरी नी होय-जिनगी बहुत ऊपर होथे...। पटेल गुरुजी ला कुछू सुरता आगे घड़ी देखिस अऊ रेंग दीस।
सुखऊ बकखाय, ओला देखथे रहिगे।

-किसान दीवान
बागबाहरा, महासमुन्द (छ.ग.)

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Thursday, January 22, 2009

जोड़ी! नवलखा हार बनवा दे - विट्ठल राम साहू 'निश्छल'

''मोर चेहरा के उदासी ह परोसी मेंर घलो नइ दोबईस। मोला अतक पन उदास कभू नई देखे रिहीस होही। परोसी ल मैं अपन समसिया ल गोहरायेंव त कहिथे ''अरे, ओखर बर तैं संसो करत हस जी?'' पहिली ले काबर नई बतायेस, चल आजे चल न मैं तोला हजार पांच सौ म बढ़िया हार देवा देथंव। देवत रहिबे पईसा ल आगू-पाछू ले। फेर तोर गोसईन मेंर तोला नाटक करे बर परही।''

हासिय बियंग
बाल हठ तो जगत परसिध हई हे, फेर तिरिया हठ के आगू बड़े-बड़े तीसमारखां मनखे मन पानी भरथें। मोर सहीक ल कोन काहाय। ये घटना ल मैं पारा, मोहल्ला अऊ गांव भर म देखेंव अऊ समझेंव। त जानेंव कि तिरिया हठ के आगू सबो मनखे मन ल आत्मसमरपन करे बर परथेच। जीत तिरियाच मन के होथे। ओ समे के बात आय जब हमर देस के आरथिक दसा ह बिगड़ गेय रिहीस, त सरकार ह देस के सोन ल बिदेस म गाहना धरे रिहीस।
हमर घर टूरा के दाई ह जिद्द करिस कि मोला ओईसने सोनहा हार चाही, जइसे परोसिन ह पहिरे हे। मैं ओला मना-पथा डारेंव कि तैं अइसन हठ ल झन कर ओ। परोसिन ह जौन हार पहिरे हे तौन ह माहमूली हार नो हे ''नवलखाहार'' काला कहिथे? ओ हार ह थोक बहुत म नई बनय। अऊ फेर आज काल सोन ल सरकार ह बिदेस भेजत हे, तेखर सेती बड़ मांहगी होगे हे। अइसन समें म बड़े-बड़े लखपति मन हिम्मत नई करत हें जेवर-जत्था बनवाय के अऊ फेर मैं तो एक मासटर आदमी आंव। चार महिना के तनखा म घलो नई बनवा सकहूं। चाऊर-दार, तेल-नून, कामा लेबो। खाबो काला? परोसी मन के बात आने हे। ओला तनखा के अलादे ऊपर ले लिफाफा मिलथे। हमर ओखर बरोबरी कइसे कर सकथन? ''कांहां राजा भोज-कांहां गंगु तेली कहिथें।'' जम्मों माई लोगन मन के इही हाल ये। जिहां कांहीं नावां जीनिस देखिन कखरो घर, तहां बस ऊंखर बैमारी सुरू, जिद्दी करके पाछू पर जथें। जब तक ले ऊंखर फरमाइस ल पूरा नई करबे तब तकले घर के मनखे मन के खवई-सुतई हराम हो जथे। इसकूल ले आ के बइठे नई पांव, ओखर रमायेन सुरू हो जथे। मुंह ल कुहरा सहीक फुलो लेय रहिथे। न बने हांसे न गोठियाय। रोज दिन के ओखर नाटक ह मोर नाक म दम कर दिस। कहिथे- गाहना-गुठा पहिरे के इही तो दिन-बादर आय। जब जवानी म नई पहिराबे त का बुढ़ापा म पहिराबे? दुनिया का कही, या ये डोकरी के सऊंख ल तो देख याहा उम्मर म नांदिया बईला सहीक सम्हरे हे। बहू मन के सऊंख ल पूरा करना चाही। बुढ़ापा म जवानी के रंग चघावत हे। ओखर गोठ ह तो मोला सोरा आना लागिस। जवानी म सोरा सिंगार ह बने फभीत घलौ लागथे। जिनगी म उमंग आथे, फेर सोन के भाव ल सुन के पछिना निथर जथे।
ओखर अप्पढ़ होय के फायदा उठावत अभी हाल, बात ल टारे बर केहेंव- ''देख अभी तो सरकार ह सब सोन ला बिदेस म गाहना धर देय हे, जब छोंड़ा के आपिस ले लानही त भाव कमतिया जही उही बेखत ले के बनवा देहूं, कोन मार के अभी हमन बुढ़हागे हन तेन म। अभी सरी उम्मर बचे हे। ओह मोर बात ला मानगे।'' कहिथे- ''बने काहात हस, आज ले हमन सोन लेय बर पईसा सकेलबो। सोन के आवत ले हार के पुरती सकला जही।''
एक दिन मैं इसकूल ले घर आयेंव अऊ खुरसी म बइठ के बुट ल निकारत रेहेंव त गोसईन ह धकर-लकर अपन हांत ल अंचरा म पोंछत मोर आगू म ठाढ़ होगे, अऊ बड़ खुस होवत कहिथे- हमर देस के सोन ल बिदेस भेजे रिहीस न सरकार ह, तौंन ल आपस मंगा डारीस। मैं सुनेव त मोर पोटा ह सक्क ले होगे, मोर चेहरा के रंग उड़ियागे।
गोसईन ह मोर मुंह ल देख के कहिथे- कइसे, दुख के समाचार ल गोठिया परेंव का?
मैं सम्हलत केहेंव, न..... ही.... ये तो बने बात ये जी, हमर चीज हमर देस म आगे मैं ओखर मन ल ढांढस बंधायेंव। हार कइसे लेवाही कहिके संसों म रात भर अलथी-कल्थी मार-मार के रहिगेंव। नींदे नई अईस। मंगसा मन के भनभनई अऊ कुकुर मन के हांव-हांव करई म बिहान होगे।
''मोर चेहरा के उदासी ह परोसी मेंर घलो नइ दोबईस। मोला अतक पन उदास कभू नई देखे रिहीस होही। परोसी ल मैं अपन समसिया ल गोहरायेंव त कहिथे ''अरे, ओखर बर तैं संसो करत हस जी?'' पहिली ले काबर नई बतायेस, चल आजे चल न मैं तोला हजार पांच सौ म बढ़िया हार देवा देथंव। देवत रहिबे पईसा ल आगू पाछू ले। फिर तोर गोसईन मेंर तोला नाटक करे बर परही। कहि देबे मोर संगवारी मन उधारी म लेवईन हे कहिके।''
परोसी जइसने सीखोईस तइसने करेंव। गोसईन हार पहिर के बड़ खुस होईस अऊ कहिथे- अब महू किंदरहू बजार-हाट, मेला-मड़ई, परोसिन मन मोला बहुत चिढ़ाय हे। पहिर-पहिर के आगू-आगू म मटमटावंय। उही-उही गोठ ल घेरी-बेरी लानय लेगय, मोला जरोय बर। महूं अब बदला लेहूं त मोरजीव जुंडाही। मैं ओला चेतावत केहेंव- येला रोज-रोज झन पहिरबे, न पहिरे-पहिरे बाजार हाट, मेला-मड़ई जाबे। आज काल चोरहा मन पुदक के भाग जथें। कोनों बर बिहाव के मउका म भले पहिरे करबे। फेर लोगिन मन मानय त? तिरिया हठ के देखे तो भगवान हारे हे। ये दे पन्दरही बुलके नी पईस एक दिन बाजार म कते डाहार ले ओ चोरहा ह अईस अऊ गला के ला झटक के भाग गे। चोर-चोर काहतेच हे बजार म कांहा अछप होगे। रोवत-गात घर अईस। मैं सुनेंव त मोर मन थिरागे, चल सोन के झंझट ले मुक्ति मिलीस। अब कब्भू सोन पहिरे के नाव नई लेही कहिके। फेर दुसर दिन मोर खुसी म जोझा परगे पोसटमैन एक ठन लिफाफा दिस तेन म ओ नकली हार संग म एक ठन चिट्ठी मिलीस- लिखे राहाय सरम नई आवय, नकली सोना पहिराये रहे अपन बाई ल। गोसईन ह मोर कोती बर बड़ बिचित्र नजर ले देखत राहाय।
मैं सोचे लगेंव-मोला चुल्लू भर पानी म मर जाना चाही।

विट्ठल राम साहू 'निश्छल'
मौंवहारी भाठा महासमुन्द

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Tuesday, January 20, 2009

हमन कहां जात हन - सुधा वर्मा

रामकुमार साहू के कविता संग्रह के भूमिका लिखत रहेंव त ओमा एक लेख ''तईहा के ला बइहा लेगे'' ल पढ़त-पढ़त सोचेंव के ये लेख के जम्मों बात ल मैं ह अपन मड़ई म अलग-अलग रूप मा दे डरे हवं। फेर पढे क़े बाद उही सब बात ह दिल दिमाक मा आए ले धर लीस। गर्मी के मजा अउ अवइया बरसात के जोखा एके रहिस हे। अमली के बीजा हेरन, बोईर के मुठिया बनावन। मखना के खोइला करन। अम्मारी, पटवा, चना भाजी के सुक्सा ल बने सुखो के धरन। अब ये साग, चटनी मन देखे बर नइ मिलय। कहां गए वो सीलबट्टा के चटनी, लसुन मिरचा के चटनी अउ बासी। हंड़िया के भात अउ करसी के जूड़ पानी।
कांसा के थारी, लोटा म खाना देवई ह सगा के मान ल बढ़ावय। अब तो पूजा बर लोटा नई मिलय।
अब तो सनीचर के सनी ल धरे हन ''आ भइया इहें रह, झन जा'' कहिके स्टील ल पोटारे हन, त दु:ख तकलीफ तो होबे करही। आज कहां गे ठेठरी, खुरमी, चौंसेला? पाक प्रतियोगिता म दिखथे। चीला के जगह डोसा होगे। इडली, ढोकला अउ नरियर के चटनी, मूंगफल्ली के चटनी, लाली चटनी, हरियर चटनी आगे हे। आज के लइका लहसुन-मिरचा के चटनी ल काय जानही। ईमली के लाटा, बोईर के मुठिया ल कोनो जानय नहीं। मुठिया के नाव ले सुरता आगे दू साल पहिली मैं ह अपन भाई घर मन्सर (महाराष्ट्र) गे रहेंव। ओखर बंगला बहुत बड़े रहिस हे, आमा, जाम, बोईर के पेड़ बहुत रहिस हे। दू झन नौकर मन ल काम म लगा दिन के बोइर ला तोड़ के सुखोवव अउ कूट के पाऊडर बनावव। हमर राहत म पाऊडर बन गे अब नमक, मिरचा डार के हमन मुठिया बनायेन अउ संग म लेके घलो आयेन।
करीब पच्चीस साल के बाद मुठिया खाय बर मिलीस। सब राज्य ले जादा हमर छग के मन अपन खान-पान ल भुलागे हावंय। अइसे भी कहे जा सकथे के हमन ल अपन खान-पान ल बताये म सरम आथे। हमर चाैंसेला अउ फरा के पार्टी देंव, करीब चालीस झन महिला साहित्यकार मन खईन त चाटते रहिगें। हमर पाताल के चटनी ह कमती परगे। दू किलो टमाटर के चटनी ल सब चांट डरिन। चाैंसेला ल चावल के पूड़ी कहि देंव त सब चकित रहिगें।
हमर संस्कृति तो गांव म जीथे। अपन चीला, फरा, चौसेला अउ रसाज ल सान से खवावव अउ खावव। हमर चटनी मन ल देस म इसथान देवावव। ये काम हमर आय। आज पार्टी म उही-उही साग देखे बर मिलथे, एक बेर मसरी के बटकर तो खवा के देखव, आलू-भांटा के सुक्सा साग तो बना के परसव। हमर खाजा अउ, करी लाड़ू ल तो सजा के रखव। ये पार्टी अउ खान-पान म छत्तीसगढ़ के महक होही। ये पार्टी म खा के सब झूमहीं नहीं त कहिहू। हमर तसमई अउ रबड़ी संग जलेबी रख के सब के मुंह ल मीठा करव। हमन अपन कलेवा अपन, खान-पान ल आखरी सांस लेवत छोड़ के भागत हन। नहीं भई लहुट के अपन संस्कृति के जिनिस ल अपन कलेवा ल जियावव अउ पोट्ठ करके खड़ा कर दव। सब देखंय अउ खुस हो जांय।

-सुधा वर्मा

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Sunday, January 18, 2009

पढ़व, समझव अउ करव गियान के गोठ -राघवेन्द्र अग्रवाल

एक बखत के बात ये, संतखय्याम ह अपन एक झन चेला संग घनघोर जंगल के रद्दा ले जात रहिस हे। नमाज पढे क़े बेरा म दूनू गुरू-चेला नमाज पढ़े बर बइठिन तइसने उनला बघवा के गरजना सुने बर मिलिस अउ थोरेकच्च म देखिन के बघवा ह उंकरे डहर आवत हे। चेला ह डर के बारे एकठन रुख म चढ़गे जबके वोकर गुरू खय्याम ह धियान लगा के नमाज ल पढ़त रहय। बघवा वो करा आइस अउ चुपचाप चल दिस। बघवा के जाय बाद चेला ह रुख ले उतरिस अउ नमाज खतम होय के बाद म दूनू गुरु चेला फेर आगू रद्दा रेंगिन।
जात थोरेकेच्च बेर होय रहिस एक ठन मच्छर ह गुरु के गाल म काट दिस त वोला मारे बर गुरुजी ह अपन गाल म एक थपरा लगाइस। देखिस त चेला संक्खा करे लागिस अउ कथे-''गुरुजी छिमा करिहा मोर मन म एक ठन संक्खा हमा गे हे। अभीच्चे थोकन बेर पहिली जब बघवा तुंहर तिर आइस तब तुमन थोरकोच्च नि डेर्रायव अउ थोकन मच्छर काट दिस त घुस्सा गेव।''
मुसलमान संत खय्याम ह कथे-''तैं सिरतोन कहत हस। फेर तैं हर भुलावत हस जब बघवा ह आय रिहिस त में ह अपन खुदा के संग म रहेंव जबके मच्छर काटे के बेरा एक झन मनखे के संग। इही कारण ये के मोला बघवा आय के भनक तक नि लगिस।''

-राघवेन्द्र अग्रवाल
(खैरघटा)
बलौदाबाजार

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Friday, January 16, 2009

मोर सुआरी परान पियारी - विट्ठल राम साहू 'निश्चल'

''संसार के सब दाई-ददा हा बहू, बेटा, नाती -नतरा के सुख भोगे के सपना देखथे। ओ मन रात -दिन इही संसो म बुड़े रहिथे कि मोर औलाद ल कांही दु:ख-तकलीफ झन होवय। बने-बने कमावयं खावयं। बने ओनहा पहिरे। बने रद्दा म रेंगय। दुनिया म हमर नांव जगावंय। कहिके अपन मन भूख-पियास ल सहिके औलाद के मुंह मं चारा डारथें। औलाद कपूत निकल जथे तेन ल कहूं का करही। सियान मन गुनथें मरे के पहिली नाती-नतुरा के मुंह देख लेतेंव कहिके। मोर दाई ह घलों अइसने सपना देखय। दाई ल बहू के वरदान तो मिलगे। कोनों जनम म बने करतब करे रिहिस होही तेखर सेती ओला ये जनम म दहेजवाली बहू मिलगे।''
मोर परान पिआरी गोइसईन ह जब ले मोर घर म अपन पबरीत चरन ल मड़ईस, तब ले मोर घर के दरिद्री देंवता ह परागेय हे। पहिली रात-दिन कमावंव तभो ले कंगालीह छाएच राहाय। घर म एको दाना चऊर-दार नई राहाय। मुसुवा भुखन मरय। त का करय मोर कपड़ा-ओनहा, कथरी-गोदरी मन ल चुन डारय। घुस्सा म जब मैं मारे बर कुदावंव त परवा-छानही म चघ के कान अऊ मुंह ल मकटकावत मोला चिढ़ावंय।
अब तो आगू-आगू ले सरी जीनिस मन माढ़े रहिथे। ओला देख-देख के न मोला भूख लागय न पियास। लोगन के कहेना हे कि कोठी म एक दाना अढिया नई रेहे ले भूखे-भूख लागथे। कहिथे भाग मानी मन ल बने सुआरी मिलथे। सबो ल नई मिलय। सिरतोन मैं भागमानी आंव। ओ मन बने सुआरी कब्भू नई हो सकय जौंन मन अपन मईके ले जम्मों घर-गिरस्ती के जीनिस जइसे-टीवी, रेडिया, पलंग-सुपेती, सोफा, मिक्सी, फीरीज, कुलर, अलमारी, गद्दा-तकिया, बरतन-बासन नई लानय। ऐखर अलावा नगदी पईसा ला दुलहा डौका के ददा के अऊ खुद दुलहा के खीसा म डार देथे। तौने ससुर तो समझदार कहाथे। मोला तो मुंह मंगा दिस मोर ससुर जी हा। कहिस- 'चला बता बेटा तोला का होना कहिके- मैं हा नहीं, मोला कांही नई चाही कहेंव तभो ले कहिस नहीं-नहीं लजा झन का चाही? मैं कलेचुप मुड़ ल गडिया के मड़वा तरि बइठे राहांव। त कहिस- 'अरे तोर घुमें-घामे बर कोनों मोटर गाड़ी तो लगबे करही न कहिके अपन खीसा ले चार चक्का वाला गाड़ी के कुची ल मोर हात म धरादिस। मोर जम्मों लाग-परवार अऊ संगी-साथी मन मोर डाहार गुर्री-गुर्री देखे लागिन। मैं ऊंखर-गुर्री-गुर्री देखई म देखेंव ऊंखर आंखी ह काहात राहाय अरे जोजवा टूरा कुची ल झोंक नई लेवस। बिन मांगे मोती मिलय मांगे मिले न भीख जब अपन होके देवत हे त झोंक ले। आवत लछमी ल लात नई मारना चाही।'
मैं का करंव झोंक लेंव। हमर ससुर कहिस अऊ कभू पईसा-कउड़ी या कुछू भी जीनिस के जरूरत परही त बिगन लजाय मांग लेबे। मैं सुन के गदगद होगेंव। जब-जब मोर सुआरी अपन ददा घर जाथे तब-तब कांही कुछ लानबे करथे। कुल मिलाके मोर गोसइन ह संवहत लछमी ये। तेखरे सेती ओखर लाख बुरई ह माफी हे। ओखर आय ले मोर घर के ओखर जम्मों कांटा मन घर छोंड़ के अंते भाग गे। घर म अब शांतिच शांति हे। जब ओखर कांटा मन राहाय त आय दिन घर म हरहर-कटकट माते राहाय। मोर सुआरी ल ओमन फूटे आंखी नई भावय।
जब मैं ओ मन ल लहू-पछिना के कमई ल लान-लान के खवावत रेहेंव त बने काहांय। सुआरी के आय ले परागे अऊ गांव भर म ओखर चारी-चुगली करत रहिथे। जब देखों तब पटंतर देवत रहिथे। कहिथे- बहू के आये ले ये टूरा ह सुआरी के गुलाम बनगे, दाई-ददा, भाई-बहिनी ल पुछय नहीं। येला मुड़ढक्की बैमारी ह धर लेय हे। कभू तो पुछतिस खाये-पीये हौव ते नहीं, तुंहर देह-पांव बने हे ते नहीं, तुमन ल कांही दु:ख-पीरा तो नई हे कहिके। मनमाड़े दाईज (दहेज) पाये हे, मेंछरावत हे चंडाल ह। लखपति ससुरार ह कब तक ले तोर संग देही तेन ल जीयत रहिबो ते देख लेबो। घमंड होगेय हे- घमंड येखर सुआरी तो सोज मुंह गोठियावय नहीं। 'करेला उप्पर ले लीम चघा।'

काबर नई बखानहीं- 'बेटा च मन तो दाई-ददा के सहारा होंथे। उहू ल पराये घर ले आय बहू ह अपन मुठा म धर लेथे त दाई-ददा के छाती म छूरी तो चलबे करही। ऊंखर सरि सपना ह टूट जथे। का इही दिन बर दाई-ददा ह लईका ल बिआये हे, उनला पढ़ाथे-लिखाथें, लाईक बनाथें, अऊ जब लईका मन के पारी आथे दाई-ददा के सेवा करे के त अलगिया जथे।'
''संसार के सब दाई-ददा हा बहू बेटा, नाती -नतरा के सुख भोगे के सपना देखथें। ओ मन रात- दिन इही संसो म बुड़े रहिथे कि मोर औलाद ल कांही दुख तकलीफ झन होवय। बने-बने कमावय खावय। बने ओनहा पहिरे। बने रद्दा म रेंगय। दुनिया म हमर नांव जगावंय। कहिके अपन मन भूख पियास ल सहिके औलाद के मुंह म चारा डारथें। औलाद कपूत निकल जथे तेन ल कहूं का करही। सियान मन गुनथें मरे के पहिली नाती-नतुरा के मुंह देख लेतेंव कहिके। मोर दाई ह घलों अइसने सपना देखय। दाई ल बहु के वरदान तो मिलगे। ेकोनों जनम म बने करतब करे रिहिस होही तेखर सेती ओला ये जनम म दहेजवाली बहू मिलगे। ओ ह बहू नहीं संवहत देबी लछमी ये।''

सदा दिन घर म अंधियारी घपटे राहाय तौंन घर हा आज टिवलईट म जगमग-जगमग करत हे। मैं तो गुनथंव जब मोर बुढ़ापा आही त मैं एखर ऊपर एक ठन सोध ग्रंथ लिखिहौंव ताकि अवइया पीढ़ी ल ये बिसे म कांही गियान मिलय।

गोसईन मोला दाई के परम भगत जान के ओला बहुत दुख लागिस। अब ओ ह रोज बिगन कारन के कारन मुंह-कान ल तोमरा सहिक फूलों के बइठे रहिथे। कांही कहिबे ते चांय ले चिचिआय लगथे। मैं तो ओखर अंतस के बात ल जानथंव। महू कच्चा गोली नई खेले हांव। ओला खुस करे बर केऊ ठन उपाय जानथंव। दाई-ददा मन बिआये हे तेखर सेती लईका ऊपर ऊंखर पहिली हक बनथे। फेर सुआरी मन सात भांवर किंदरे रहिथे, तेखर सेती सात जनम के संगवारी समझ के गोसईया मन के बंधना म बंधाये रहिथे। जब ऊंखर मन होथे तब गोसइया मन ल अपन अंगरी म नचावत रहिथे।

गोसईन के गुलामी करई सब गोसईया मन के जनम सिध्द अधिकार होथे। जौन गोसईया मन गोसईन के गुलामी नई कर सकय ओ मन इनकलाबी हो के मारे जाथे। अऊ फेर गोसईन के गुलाम कोन नई हे? ऊंखर गुलामी करे म जौंन मंजा हे ओ हलुआ-पुड़ी म नई हे। इतिहास गवाही हे जौन जोन मन सुआरी के गुलामी करीन ओ शलाका पुरुस सूरूज सहिक आज ले चमकत हे। तंहुला मोर गोठ म बिसवास नई होही ते किरपा कर के आईना के आधु म ठाढ़ हो जावव।

-विट्ठल राम साहू 'निश्चल'
मौंवहारी भाठा
महासमुन्द

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Wednesday, January 14, 2009

तीजा के लुगरा - बन्धु राजेश्वर राव खरे

''सालपुर तीजहा लुगरा के गिरत दसा ल देखके एसो ओला नइ सहइस। लुगरा ल अपन तन म मन मार के लपेटे रिद्धहस फेर ओखर मन हर नंगत काच्चा होगे। ओखर ले नई रेहे गीस तब अपन भाई ल सुना दीस, मैं अभी पाठ के भाई होतेंव तब ये पुरखौती जहिजाद के दू बांटा होतीस। मैं अभी अंड़ जाहंव तब कान्हून घलों अभी ऐ जहिजाद के दू भाग कर देही। सालभर म तीजा के नाव लेके एक बेर बेटी, बहिनी के आना होथे। हमरो मान-सनमान के नेग रथे सवाल रथे। तीजा मान के अपन ससुराल लहुटबे तब पारा-परोस के माई लोगन मन मेल भेंट करे बर आथे अऊ पूछथें कि कइसना लुगरा देय हावंय तोर मइके के मन।''
कहिनी
दाई-ददा के जीयत भर ले राम्हिन के तीजा के रुआप अलगेच रिहिस। तीजा के बिहान दिन झम-झम ले लुगरा। दाई-ददा के आंखी मुंदइस तहां भाई भऊजाई के परभूता म राम्हिन के तीजा के रंग सालगनिया फिक्का होवत गीस। काबर कि राम्हिन के मईके म ओखर भाई के बाई के चलती राहय। राम्हिन हर एक मन म सोचय कि फटफिट अपन भाई ल सुना के मइके ले सबर दिन बर छुट्टी पटा लेतेंव। फेर ओखर दूसर मन हर ओला हरक देवय। राम्हिन तैं अइसन झनकर....। जीयत मरत के एक भाई अऊ एक बहिनी। सुख-दुख म संघरे के रद्दा ल झन टोर। इही बात हर राम्हिन ल संवासे बार लचार कर देवय।
एसो घला राम्हिन हर तीजा मनाय बर अपन मईके गे रिहीस। करू भात खाके उपास रिहिस। नावा लुगरा पहिर के संकर भगवान के पूजापाठ करके फरहार करिस। फेर सालपुर तीजहा लुगरा के गिरत दसा ल देखके एसो ओला नइ सहइस। लुगरा ल अपन तन म मन मार के लपेटे रिहिस फेर ओखर मन हर नंगत काच्चा होगे। ओखर ले नई रेहे गीस तब अपन भाई ल सुना दीस, मैं अभी पाठ के भाई होतेव तब ये पुरखौती जहिजाद के दू बांटा होतिस। मैं अभी अंड़ जाहंव तब कान्हून घलों अभी ऐ जहिजाद के दू भाग कर देही। सालभर म तीजा के नाव लेके एक बेर बेटी, बहिनी के आना होथे। हमरो मान सनमान के नेग रथे सवाल रथे। तीजा मान के अपन ससुराल लहुटबे तब पारा-परोस के माई लोगन मन मेल भेंट करे बर आथें अऊ पूछये कि कइसना लुगरा देय हावंय तोर मइके के मन। तब ये मार्किन लुगरा ल देखा के अपन अउ अपन मइके के नाक ल कटवाहूं...? मोर मइके हर गरीब होतिस तब बात भिने रहितिस। भांचा दान करे भुंइया ल घला तिहीं बोवत खास हावस। का दु अढ़ई सौ के लुगरा देहे के पुरता घला नइ हस?
अपन बहिनी के सब बात ल पलटू हर सहिगे रिहिस। फेर भांचा ल दान करे भुंइया वाला गोठ हर ओखर हिरदे म तीर सही भेदगे। येखर का जुवाप देवय। अपन बाई के कहना ल मानके ओ भुंइया ल बेच के अलगे जमीन बिसो के अपन बाई के नाव म रजिस्ट्री करवा डारे राहय। ओखर मन के चोर हर ये अपराध के सजा ले बुलके बर रद्दा खोजत राहय। इही बीच ओखर भांचा हर अपन दाई के ओरमे थोथना अपन ममा के चोरहा मन ल देख के ओला समझे बर थोरको देरी नइ लागिस। अपन दाई ल कथे-दाई भगवान के देहे हमर घर संतोष रूपी धन हे। अउ बहुतेच हावय। ममा घर के चीज बस म हमर घर के खरचा चलही अइसन बात नइये। आदमी ल चीज के नहीं दिल के बड़े होना चाही। चीज तो आथे अउ जाथे। कतकोन बड़े-बड़े राजाराठी के महल अटारी भठगे। आज ऊंखर न तो डीह बांचे हे, न ऊंखर डीह मं दीया बरइया बांचे हांवय। जेन राजा-महराजा मन निकता काम करीन ऊंखर नाव हर आज जग जाहिर हे। जेन मन अपन परजा ल अपन सुख खातिर सताइन तिंखर आज नाव लेवइया नइए।
अपन भांचा के मुंह ले ये सियानी गोठ ल सुनके ममा के अंतस के आंखी उघरगे। अपन भांचा ल कथे मैं आज अपन आप ल थूंक-चट्टा महसूस करत हावंव भांचा। तोला जेन भुंइया ल दान करे रेहेंव तेन ल बेच डारे हंव। थूंक के चाटना अच्छा बात नइ होय। तब भांचा कथे- एक बाप अउ एक बात कथें। जेखर जबान दस तेखर बाप दस कथें। जेखर एक बाप रथे तउने हर अपन जबान के पक्का रथे। बोलके नई बोले हौं कहना दोगलई आय अउ कोनो ल देके वापस लेना थूक चंटई। देरी ले सही फेर तैं अपन मन के चोर ल परगट करके अपन एक बाप के दरजा ल बचा डारेस ममा।
तब ममा अपन भांचा ल पूछथे- अपन मुंह अखरा बात ल पलटी मारना हर थूंक चटई कहाथे तब लिखा-पढी होय ल पलटी मारना का कहाही भांचा?
भांचा कथे- इही ल तो खखार के चंटई कथे ममा...जी।
दुनो ममा भांचा के सुलीनहा गोठ ल सुनके राम्हिन के हिरदे घला सुध होगे। अतेक बेरा पलटू के गोसाइन घला अपन मइके ले तीजा मनाके लहुटगे रिहिस। अपन मइके म मिले मान सनमान ले ओखरो आंखी दग-दग ले उघरगे रिहिस। अउ एक माईलोगन ल दुसर माईलोगन के सनमान करेके गियान ओला मिलगे रिहिस। अपन ननंद ल ऊंचहा लुगरा दे के खुसी-खुसी बिदा करिस।
-बन्धु राजेश्वर राव खरे
लक्ष्मण कुंज
अयोध्या नगर, शिवमंदिर के पास
महासमुन्द (छ.ग.)

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Monday, January 12, 2009

गांव-गंवई के बरनन- मिश्र के कविता में - सरला शर्मा

तेईस दिसंबर सन् उन्नीस सौ तीस म जाज्वल्यदेव के ऐतिहासिक नगरी जांजगीर के बाह्मनपारा म रहइया स्व. कन्हैयालाल मिश्र अऊ श्रीमती बहुरादेवी के घर अंजोर करइया बेटा जनमिस। महतारी-बाप के खुसी के ठिकाना नइ रहिस।
आघू चल के विद्याभूषण जी अपन नांव के मरजाद राखिस अऊ छत्तीसगढ़ के प्रसिध्द लोकप्रिय गीतकार बनिस जिनला आज हम विद्याभूषण मिश्र के नाव से चिन्हथन।
उन पहिली कविता 1946 मं बसन्त ऋतु पर लिखिन फेर कक्षा 11वीं म 1947 म सरस्वती वंदना लिखिन। अइसे लागथे वो दिन सरसती दाई संवागे आके उनकर मूंड़ म हाथ धरिन होही। तभे तो आज तलक मिश्र जी के मधुर गीत हमन पढ़थन, सुनथन।
हिन्दी के संगे संग छत्तीसगढ़ी गीत मन घलाय सुध-बुध भुलवार देहे म समरथ हावय।
'करूणांजलि' के भूमिका स्व. शेषनाथ शर्मा 'शील' लिखे रहिन त 'सती सावित्री' खण्ड काव्य के सस्वर पाठ सुनत हमन असन लइकन मन घलाय भाव विभोर हो जावन। एक बात कहे बिना नई रहे सकत हौं के मिश्र जी श्रेष्ठ कवि के संगे संग श्रेष्ठ कंठ घलाय आंय। मा सरसती उनकर कलम अऊ गला दूनों म बरोबर मिठास देहे हावय विभिन्न कवि सम्मेलन मन म मिश्र जी के सस्वर प्रस्तुत गीत-कविता मन श्रोता मन ल मंत्र मुग्ध कर देथे...।
'गीत माला पहिर ले रे गोरी गंवई तोर जय होवै....।' वो समै बढ़ लोकप्रिय होये रहिस त आकाशवाणी रायपुर के संगे संग जांजगीर, चांपा, कोरबा, भिलाई म सुने बर मिल जावत रहिस।
आकाशवाणी रायपुर ले मास गीत के रूप म जन-गण-मन में लहराए अऊ सुन्दर प्यारे गांव हमारे गीत मन ल स्थान मिले रहिस हावय।
जाज्वल्यदेव महोत्सव के मंच मं स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल द्वारा श्री रामभक्त हनुमान के लोकार्पण होए रहिस। वो दिन के सुरता आथे जब मंच म प्रतिष्ठित साहित्यकार मन के संगेसंग सुनइया मनखे के किचिर-किचिर मिश्र जीके सधे स्वर के गूंज म सुन्न पर गेय रहिस। अइसे लागत रहिस जाना पेड़ के पाना मन घलो ताली बजावत हांवय।
'किसी वियोगी की आंखों में अपने आंसू भर देने से मेरा सोया प्यार हृदय के वंशीवट में जग जाता है।' ऊनकर छत्तीसगढ़ी कविता म गांव-गंवई के सांगोपांग बरनन बड़ निक लागथे, प्रकृति के सिंगार करत वो गीत मन ल कभू भुलाय नई जाय सकय। त हमर छत्तीसगढ़ के खेती किसानी ल घलाय बरोबर ठौर मिले हैं उनकर रचना म देखव तो...।
'चला चली फांदी बियासी के नागर
कच्चा करौंदा के चटनी बने हे
सुग्घर सेंकाये अंगाकर....।'
कवि के हिरदे के भाव मन हसदो के धार कस झर-झर, कल-कल करत बोहावत हावय त प्रकृति के सुघराई कोती कवि के धियान पाठक मन ल बन पहार कोती लहुट के निहारे बर इसारा करत दिखथे।
'मऊरे हे आमा अऊ बहुरे हे सुख ह
मोरे सुवा! खेत-खार सब महमहाय।
भुइयां के अंचरा म अन्न भरे हे रे
मोर सुवा! सरसों के देह पिंऊराय।'
सुवागीत। छत्तीसगढ़ी के माटी म जनमे छत्तीसगढ़िया नोनी-लइका मन के अंतस के सुख-दु:ख, मया-पीरा मं भींजे लोकगीत आय त मिश्र जी असन भावुक कवि के मन ल सुवागीत हर कइसे नई छूही। धरती मइया के अंचरा के मोती आनी-बानी के फसल हर आय व किसान के जिनगानी के अधार घलाय आय बरिस भर के कमाई जब खेत म लहलहाए त ओकर रखवारी करे बर किसान घर दुआर छोड़ के खेत म कुंदरा छाथे...।
'घूमत हे रखवार खार मा रखवारी बर तोरे बमरी के रूख ठाढ़े हावै अपन हांथ ल जोरे। रात अंजोरी के अंचरा ले मोती ल टपकाय, अऊ कुंदरा के दिया झांक के चंदा ल तरसाय।' दू सरीर एक परान कहिथे त कवि के कहना हे नहीं भाई अपन जोड़ी-जांवर बिन जिनगी के महाभारत लड़े नई जा सकै...
जनम अकारथ हो जाथे... एक नवा विचार के दरसन ये गीत म देखव... 'तोर अंजोर म उमर सुन्दरी

अपन सोहाग सजाथे।
तोर खुसी के मेंहदी ओहर
अपने हाथ रचाथे।
जुग-जुग ले तैं मोर बने हस जांवर जोड़ी साथी।
तोर बिना मैं माटी...।'

हिन्दी कविता संकलन मन म 'मन का वृंदावन जलता है।' कवि के जीवन दर्शन के संगे संग प्रेम ल नवा परिभाषा देवइया कृति आय...। एमा कवि के गीत मन सुन्दर भाव-भाषा ले सजे हांवय त साहित्यकार के अंतरमन के गंभीर संवेदना मन ल गहना असन पहिर के साहित्य के अंगना म उतरे हांवय...।
मिश्र जी के गीत, कविता मन छन्द प्रधान, गेय श्रुतिमधुर भासा अऊ रस अलंकार के भण्डार आय। विद्याभूषण मिश्र हमर छत्तीसगढ़ भूषण आय ऐमा कोनो दू मत नइए... जुग जुग जियै कवि अऊ उनकर कविता।
ये उम्मर म देंह ढलान कती जाथे... जेहर प्रकृति के अमोध नियम आय। तभो मिश्र जी कविता सम्मेलन, गोष्ठी मन मं अभियो जाथें अऊ अपन मधुर कंठ से श्रोता मन ल मोहे सकथें एहर सरसती दाई के बड़ किरपा आय...।
राम अधीर जी संकल्प रथ पत्रिका के एक अंक जनवरी, फरवरी 2005 ल ललित गीत कवि पं. विद्याभूषण मिश्र एकाग्र छाप के साहित्य जगत ल दुर्लभ भेंट देहे हांवय...।
भगवान से बिनती हे कि विद्याभूषण मिश्र के गीत छत्तीसगढ़ म गूंजत रहय उनकर कविता माटी के सिंगार करत रहय...।

-सरला शर्मा
भिलाई

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